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नया हरियाणा

बुधवार, 18 सितंबर 2019

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बीजेपी के लिए गड्ढ़े खोदते-खोदते विपक्ष खुद गड्ढ़े में गिर गया

2019 में विपक्ष का बुरा हाल होना तय लग रहा है.

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4 जुलाई 2019



नया हरियाणा

2014 में बीजेपी ने हरियाणा में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई. जिसे विपक्ष ने ये कहकर अपनी कमी छुपाने की कोशिश की, कि ये तो मोदी लहर में सरकार बन गई. जबकि हरियाणा में बीजेपी के लिए उपजाऊ जमीन 10 साल राज करने वाले कांग्रेसी सीएम भूपेन्द्र हुड्डा ने खुद तैयार की थी. जो कांग्रेस अपनी विविधता के लिए जानी जाती थी, उसे हुड्डा ने पूरी तरह अपने कब्जे में लेकर ‘बंधुआ’ बना लिया था, जो अब ‘ब्लैकमेलिंग’ के स्तर पर पहुंच गई है. चंडीगढ़ कहने भर को राजधानी रह गई थी, जबकि पूरी सरकार व राजनीति का केंद्र रोहतक बन गया था. सबसे बड़े व एकमात्र विपक्षी दल इनेलो के ओपी चौटाला व अजय चौटाला को जेल होने के बाद हुड्डा को न तो विपक्ष से खतरा था और न ही कांग्रेस के भीतर से. हुड्डा कांग्रेस के भीतर के बड़े नेताओं और अपने समर्थकों के बीच ये संदेश देने में सफल रहे थे कि हरियाणा में अब हुड्डाराज का कोई विकल्प नहीं है, वही एकछत्र राज करेंगे. इसी मानसिकता के कारण उन्होंने सीएलयू का खुला ‘खेल’ खेला, ‘सरकार का डर’ दिखाकर किसानों की जमीनें छीनी गई, नौकरियों को ‘रेवड़ियों’ की तरह बांटा गया तथा भेदभावपूर्ण नीतियों का खुला प्रदर्शन किया. इसके अलावा पूर्व सीएम हुड्डा पर एक आरोप यह भी लगा कि उन्होंने चंडीगढ़ में एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि वे जाट पहले हैं, सीएम बाद में. इन परिस्थितियों में नए विकल्प के तौर पर जनता ने बीजेपी को समर्थन दिया. बीजेपी ने बड़ी ‘चतुराई’ से इस विकल्पहीनता की स्थिति में खुद की पार्टी को बहुस्तरीय विकल्प के तौर प्रस्तुत किया.
बीजेपी की सरकार बनते ही हुड्डा खेमे व समर्थकों ने जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े नेताओं के माध्यम से जाट आरक्षण आंदोलन को पुर्नजीवित किया. जो आंदोलन लंबे समय से शांति प्रिय ढंग से चला आ रहा था, उसे आक्रामक रूख दिया गया. दूसरी तरफ से कुरुक्षेत्र से बीजेपी के सांसद राजकुमार सैनी ने जाट समाज के खिलाफ विवादित बयान देने शुरू कर दिए. बीजेपी सरकार पर ये आरोप भी लगे कि उसने सांसद को समय रहते चुप नहीं करवाया. जाट समाज में बढ़ते आक्रोश को ‘कैश’ करने के लिए आंदोलन को उग्र रूप दिया गया. उग्र रूप देने के लिए सोशल मीडिया पर चौधरी छोटूराम के चेहरे की आड़ लेकर यूनियनिस्ट मिशन के नाम से एक मुहिम चलाई गई. जिसका मकसद था जाट समाज को बीजेपी सरकार के खिलाफ खड़ा करना और उनका मूल एजेंडा था हुड्डा के पक्ष में माहौल बनाना. इसके लिए उन्होंने आर्य समाज को भी निशाना बनाना शुरू किया. यह एक तरह की अलगाववादी राजनीति थी, जो कांग्रेस पहले मुस्लिम समाज पर आजमा चुकी थी, ठीक वहीं नैरेटिव और प्रक्रिया यहां जाटों पर लागू करके उन्हें अलगाववादी बनाने की तरफ धकेला जाने लगा. इसके लिए जाट आरक्षण आंदोलन आदि को माध्यम बनाया गया. हालात बिगड़े. बिगड़े हालात संभालने में बीजेपी नाकाम रही. समय के साथ फेक नैरेटिव धराशाई हुए. समाज के सभी तबकों को पता चला कि इस गंदे खेल के पीछे कांग्रेसियों का ‘हाथ’ है, समाज का भाईचारा और विश्वास दोबारा पटरी पर लौटने लगा. जिसे लोकसभा चुनावों में मिले बीजेपी को विशाल बहुमत से समझा जा सकता है.
लोकसभा चुनावों में बीजेपी को मिले विराट बहुमत ने साबित किया कि समाज के सभी तबके बीजेपी के साथ हैं, जो फेक नैरेटिव गढ़े गए थे, वो चारों खाने चित्त हो चुके हैं. अपनी हार से तिलमिलाए विपक्ष ने सबक सीखने के बजाय चुनाव के बाद प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया पर अब दो नए फेक नैरेटिव गढ़ने शुरू किए हैं. प्रिंट मीडिया के माध्यम से यह फैलाया जा रहा है कि बीजेपी दो बड़े जाट मंत्रियों की टिकट काट सकती है, क्योंकि उनके विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी हार गई है. दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर ये फैलाया जा रहा है कि बीजेपी का बहुमत आने पर इन दो बड़े जाट नेताओं में से किसी को सीएम बनाएगी. इन दो विरोधी फेक नैरेटिव के पीछे की मंशा साफ बताती है कि विपक्षी दलों ने पिछली हार से सबक लेने के बजाय समाज को तोड़ने वाली अलगाववादी राजनीति छोड़ी नहीं है. बल्कि अब नए ढंग से वो फिर से अलगाववादी राजनीति की नींव पर सत्ता का महल खड़ा करना चाहते हैं. ‘टिकट कट सकती है’ के नैरेटिव से वो जाट समाज में ये झूठा संदेश देना चाहते हैं कि बीजेपी जाट विरोधी पार्टी है, जबकि जाट सीएम बनेंगे के जरिए वो बीजेपी की एक खास किस्म की छवि बनाना चाहते हैं. विपक्ष के द्वारा इस तरह के समाज को तोड़ने वाले ‘ओच्छे औजार’ अपनाने से साफ पता चलता है कि उनके पास कोई ठोस जमीनी मुद्दे नहीं हैं. इस तरह के कारनामों से साफ है कि विपक्ष के पास फिलहाल कोई विज़न नहीं है. जिसके कारण वह इस तरह के हथकंडे अपनाने पर मजबूर है. जबकि विपक्ष को जमीनी धरातल पर काम करने के अलावा जनता की नब्ज को समझने की जरूरत है. मजबूत लोकतंत्र के लिए इसकी सख्त दरकार है, क्योंकि किसी पार्टी का विराट बहुमत सत्ता को तानाशाह बनाता है. लोकसभा परिणाम से सबक लेकर नियत और रणनीति में बदलाव की जरूरत विपक्ष को ज्यादा थी, पर यहां भी बीजेपी ने उन्हें मात देकर खुद में बदलाव करना जरूरी समझा. 
लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा में बीजेपी बदली हुई साफ दिख रही है, उसने दूसरे दलों के अन्य नेताओं के साथ-साथ जाट नेताओं को बड़ी संख्या में शामिल करके यह साफ संदेश दिया है कि वह समाज के सभी तबकों को साथ लेकर चलना चाहती है. विपक्ष के रचे जाट-गैर जाट के फेक एजेंडे को धराशाई करते हुए उसने अलगावावादी राजनीति के रास्ते को बंद करने के लिए जरूरी कदम उठाएं हैं. जिसके कारण विपक्ष में बौखलाहट का बढ़ना लाजिमी है. इस कारण भी प्रिंट व सोशल मीडिया में इस तरह के प्रायोजित एजेंडे चलवाए जा रहे हैं. जबकि बीजेपी अपनी नीतियों व विकास के एजेंडे पर चुनाव लड़ना चाहती है और विपक्ष वहीं जात-पात के पुराने राजनीतिक खेल में उलझा हुआ है. इन बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों को समझने में राजनीति के ‘पंडित’ व राजनीतिक दलों के सलाहकार पूरी तरह असफल हो रहे हैं. बीजेपी के लिए गड्ढ़े खोदते-खोदते विपक्ष खुद उस गड्ढ़े में गिर गया है. मनोहर सरकार को फंसाते-फंसाते खुद के बिछाए जाल में फंस गया विपक्ष.


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