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नया हरियाणा

बुधवार, 18 सितंबर 2019

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51 साल में 30 चुनाव लड़ चुके भजनलाल परिवार का इस बार गढ़ ढहने का खतरा

2019 के लोकसभा चुनाव में आदमपुर से व अपने बूथ से पहली बार हारा है भजनलाल परिवार.

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3 जुलाई 2019



नया हरियाणा

हरियाणा की राजनीति मनोहर लाल से पूर्व तीन लालों के ईर्द-गिर्द घूमती हुई दिखती थी, जिनमें भजनलाल, देवीलाल और बंसीलाल। आज हम भजनलाल के गढ़ कहे जाने वाले आदमपुर के इतिहास और वर्तमान का विश्लेषण करेंगे। हरियाणा और देश की राजनीति में भजनलाल का नाम जोड़-तोड़ की राजनीति से गहरे जुड़ा हुआ है।  कुछ लोगों का मानना है कि वो एक अच्छे वक्ता नहीं थे और न ही आम लोगों के बीच उनकी देवीलाल जितनी प्रसिद्धि थी। लेकिन कहते हैं कि भजनलाल के पास वो तीसरी आंख थी जिससे वो किसी से मिलकर ये जान लेते थे कि उसे सरकारी नौकरी चाहिए या कोई प्लॉट। 
आदमपुर विधानसभा सीट भजनलाल परिवार की पारंपरिक सीट मानी जाती है। इस सीट पर भजनलाल परिवार का दबदबा रहा है और यह सीट राजस्थानी जीवन शैली से मेल खाती है। हरियाणा के किसी और हलके पर किसी परिवार का एकछत्र राज इस तरह का नहीं रहा है। इस सीट पर 1967 में हुए पहले चुनाव को छोड़कर बाकी सभी चुनाव में भजनलाल परिवार ने जीत दर्ज की है। यहां से भजनलाल 9 बार, कुलदीप बिश्नोई तीन बार और भजन लाल की धर्म पत्नी जसमा देवी व रेणुका बिश्नोई एक-एक बार विधायक बने हैं। यानी 2014 चुनाव समेत आदमपुर ने भजनलाल परिवार से कुल 14 बार विधायक बनाए हैं।
आदमपुर से चौधरी भजनलाल 1968, 1972,1977, 1982, 1991, 1996, 2000, 2005 और 2008 में विधायक बने। भजन लाल पहली बार 29 जून 1979 से 22 जनवरी 1980 में जनता पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री बने। वे 208 दिन के लिए इस पद पर विराजमान रहे। दूसरी बार 22 जनवरी 1980 से 5 जुलाई 1985 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री के पद पर रहे। दूसरी बार 1992 दिन के लिए रहे थे। तीसरी बार 23 जुलाई 1991 से 9 मई 1996 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री रहे। तीसरी बार 1752 दिन के लिए मुख्यमंत्री रहे। तीनों बार में कुल मिलाकर भजनलाल 3952 दिन मुख्यमंत्री के पद पर विराजमान रहे।
1977 में जनता पार्टी और 2008 में हजका पार्टी से भजनलाल चुनाव जीते। बाकी सभी चुनावों में कांग्रेस की टिकट पर ही लड़े और जीते। भजनलाल परिवार इस सीट पर बेताज बादशाह रहा है। 1987 में चौधरी देवीलाल की आंधी के बीच जब कांग्रेस के मात्र 5 विधायक चुने गए थे। तब उनमें से भजन लाल की पत्नी जसमा देवी विधायक बनी थी। आदमपुर  सीट पर एक बार भजन लाल के सामने चौधरी देवीलाल भी चुनाव लड़ने आए थे। 1972 में देवीलाल ने एक साथ आदमपुर में भजनलाल और तोशाम में बंसीलाल के सामने चुनाव लड़े थे। तब भजनलाल ने उन्हें करीब 10000 वोटों से हराया था, जबकि बंसीलाल के हाथों उनकी हार करीब 20 हजार वोटों की रही थी।
आदमपुर भजनलाल परिवार का गढ़ माना जाता रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में हिसार लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे भव्य बिश्नोई तीसरे नंबर पर रहे और उन्हें आदमपुर से करीब 20 हजार वोटों से हार हुई। इस हार के कारण 2019 के विधानसभा चुनाव में गढ़ टूटने की चर्चाएं राजनीतिक हलकों में चल रही हैं। इसी तरह की चर्चाएं किरण चौधरी आदि कांग्रेसी नेताओं को लेकर भी राजनीति के गलियारों में चल रही हैं।
2014 में हांसी विधानसभा से जनता ने जिन उम्मीदों के साथ रेणुका बिश्नोई को जीत दर्ज करवाई थी, वो उन पर खरी नहीं उतरी। इसीलिए उनके खिलाफ हांसी में विरोध का माहौल बनता हुआ दिख रहा है।  हल्के को समय न देने के कारण जनता उनके खिलाफ खुलकर बोल रही हैं और लोकसभा चुनाव में भव्य बिश्नोई को यहां से हार का मुंह देखना पड़ा था। इसी तरह के स्वर आदमपुर में भी सुनने को मिल रहे हैं। आखिर भजनलाल के नाम पर जनता कब तक वोट देती रहेगी, वो भी तब जब आप जनता के बीच रहना पसंद नहीं करते हैं। दूसरा लंबे अर्से से आप कह रहे हैं कि जल्द ही मुझे कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान मिलने वाली है।  
कुलदीप बिश्नोई की पत्नी रेणुका बिश्नोई ने हांसी से पहले 2011 में आदमपुर विधानसभा से उपचुनाव जीता था। उसके बाद 2014 में हांसी से विधानसभा में जीत दर्ज की थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के बृजेंद्र सिंह को हांसी की जनता ने करीब 50 हजार की लीड दिलाई है। इस लीड के कारण भी हांसी से हार का संभावनाएं प्रबल हो रही हैं, जबकि भजनलाल परिवार से रेणुका बिश्नोई ही ऐसी नेता हैं, जिन्होंने अभी तक हार का सामना नहीं किया है। आदमपुर के बाद हांसी विधानसभा सीट को भजनलाल परिवार का गढ़ माना जाता है। हैरानी की बात यह है कि जिस आदमपुर गढ़ से चौधरी भजन लाल के पोते को 23227 वोटों से हार का सामना करना पड़ा है। 52 साल बाद पहली बार इस अभेदय किले में किसी ने सेंधमारी की है. जिसने किले की दीवारों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। बात यहीं पर नहीं रूकी बल्कि आदमपुर मंडी से भव्य बिश्नोई अपने बूथ से भी हार गए।
राजनीति का पीएचडी कहे जाने वाले चौधरी भजनलाल को मिली अपनी पहली व आखिरी हार करनाल लोकसभा सीट से मिली। ब्राह्मणों का गढ़ कही जाने वाली करनाल सीट पर 2 पूर्व मुख्यमंत्रियों ने भी अपनी जीत का झंडा लहराया था। प्रथम मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा 1977 में यहां चुनाव जीते और 1998 में चौधरी भजनलाल ने यहाँ से जीत दर्ज की। भजनलाल को राजनीति का पीएचडी कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में कोई चुनाव नहीं हारा रहा था। चौधरी भजनलाल ने करनाल को पेरिस बनाने का जो दावा किया था, वह सांसद बनने के बाद करनाल को समय नहीं दे पाए। परिणामस्वरुप अपने जीवन की पहली और आखरी बनी हार उन्हें 1999 में करनाल से ही मिली। इस हार ने उनके अजेय रथ को रोका।
भजनलाल परिवार 1968 से 2019 तक के 51 वर्षों में 30 चुनाव लड़ चुका है और मात्र 5 चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। परिवार के 6 सदस्यों में से रेणुका बिश्नोई के अतिरिक्त शेष 5 सदस्य एक-एक बार चुनावी हार का मजा चख चुके हैं, जिनमें से कुलदीप बिश्नोई के बेटे भव्य बिश्नोई की ताजी-ताजी हार हुई है। आदमपुर के अलावा हांसी से विधायक रेणुका बिश्नोई पर भी हार के बादल मंडरा रहे हैं।


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