Hindi Online Test Privacy Policy | About Us | Contact

नया हरियाणा

शनिवार, 20 जुलाई 2019

पहला पन्‍ना सर्वे लोकप्रिय 90 विधान सभा हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप English

मुश्किल समय की मार से क्या पार निकल पाएंगे दो युवा नेता!

दोनों ही परिवारवाद की राजनीति की उपज हैं.

Bhupinder Hooda, Dipendra Hooda, Dushyant Chautala, OP Chautala, Ajay Chautala, Youth Leader, Haryana politics, KHi Halqa, Rohtak Lok Sabha, Hisar Assembly, naya haryana, नया हरियाणा

27 जून 2019



नया हरियाणा

हरियाणा 
हरियाणा की राजनीति खासकर विपक्ष की राजनीति अपने वर्तमान समय में संक्रमण काल से गुजर रही है. जिस गति से विपक्षी पार्टियों के नेता बीजेपी में शामिल हो रहे हैं, उससे साफ पता चल रहा है कि आने वाले विधानसभा में विपक्ष की अब तक की सबसे बुरी दुर्गति होने वाली है. जो दयनीय हालत केंद्र में विपक्ष की है, उससे भी बुरी हालत हरियाणा में होती हुई दिख रही है. ऐसे में क्या भाजपा अपने 75+ के मिशन को भी पार कर जाएगी? हालात तो कुछ-कुछ ऐसे ही बनते हुए दिख रहे हैं.
 वर्तमान परिस्थितियों में भले ही विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ दिख रहा है, परंतु धीरे-धीरे सभी पार्टियों की पोजिशनिंग स्पष्ट होती हुई दिख रही है. राजनीति के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इनेलो तो लगभग पूरी खत्म हो जाएगी और कांग्रेस नाममात्र की बचती हुई दिख रही है, वहीं जेजेपी धीरे-धीरे अपना स्थायित्व कायम करने की ओर बढ़ रही है. खासकर उसी ग्रामीण हिस्सों में जहां इनेलो का वर्चस्व था. ऐसे में सवाल यह बनता है कि आखिर दुष्यंत चौटाला ने अलग पार्टी बनाकर हासिल क्या किया? सिवाय इनेलो को कमजोर करने के. जबकि लोकतंत्र के लिए विपक्ष का जीवंत रहना बेहद जरूरी है.
हरियाणा में सोशल मीडिया पर कांग्रेस की कमान रोहतक के पूर्व सांसद दीपेंद्र हुड्डा को सौंपे जाने की मुहिम चलाई चलाई जा रही है. इस मुहिम के दो सीधे अर्थ ये निकलते हुए दिख रहे हैं कि हुड्डा खेमा ये मान चुका है कि पूर्व सीएम हुड्डा के युग का अंत हो चुका है और हाईकमान के भीतर उनकी पकड़ ढीली हो गई है. दूसरी तरफ उन पर चल रहे भ्रष्टाचार केस व रोहतक में हुई आगजनी व लूटपाट में उनके नजदीकियों के नाम आने से उनके नाम पर दांव खेलना हुड्डा खेमे के लिए भारी पड़ सकता है. 
2005 में भूपेंद्र हुड्डा ने हरियाणा की राजनीति में चौधर शब्द का सार्वजनिक इस्तेमाल पहली बार किया था. इनेलो के नेता आपणा राज ल्याणा है का नारा देते थे. जबकि भूपेंद्र हुड्डा ने ‘रोहतक या देशवाली बेल्ट में चौधर लानी है’ का नारा दिया था. सत्ता हासिल करने का उनका यह अभियान सफल भी हो गया था, यह सामंती तरीका तब तो जरूर काम कर गया था. परंतु 2019 के रोहतक लोकसभा और सोनीपत लोकसभा से बाप-बेटे ने चुनाव लड़ते हुए फिर से चौधर लाने का अभियान चलाया था. जो पूरी तरह फ्लॉप रहा.
एक तरफ भूपेंद्र हुड्डा कांग्रेस के लिए अमर बेल बन गए हैं तो दूसरी तरफ अपने बेटे रूपी छोटे पौधे के लिए वो बरगद बन गए हैं. बरगद बढ़िया छांव जरूर देता है परंतु अपने नीचे वो किसी को पनपने या विकसित नहीं होने देता. भूपेंद्र हुड्डा की राजनीति का मूल सार यही रहा है. यही कारण है कि दीपेंद्र हुड्डा राजनीति में रणनीति बनाने और निर्णय लेने के मामले में अभी तक ‘कुपोषण’ के शिकार लग रहे हैं. उनका राजनीतिक-मानसिक विकास हुआ प्रतीत नहीं होता. जिस कारण उनके भविष्य की राह मुश्किल होती हुई लग रही है.
स्वतंत्रता सेनानी रणबीर सिंह हुड्डा की राजनीति की तीसरी पीढ़ी के नेता हैं दीपेंद्र हुड्डा. रणबीर सिंह के बड़े बेटे कैप्टन प्रताप सिंह ने 1972 में किलोई हलके से चुनाव लड़ा और वो हार गए. रणबीर हुड्डा 1967 में हार गए व 1968 के मध्यावधि चुनाव में जीत गए 1977 में किलोई रणबीर सिंह हुड्डा खुद चुनाव हार गए. 1982 में भूपेंद्र हुड्डा ने चुनाव लड़ा और हार गए. इसके बाद 1987 में फिर किस्मत आजमाई और हार का सामना करना पड़ा. 1968 में मिली जीत के बाद हुड्डा परिवार को इस सीट पर 32 साल बाद 2000 में जीत का मुंह देखना नसीब हुआ. किलोई से यह जीत भी उन्हें रोहतक लोकसभा में 3 बार ताऊ देवीलाल को हराने के बाद हाथ लगी थी. जब भूपेंद्र हुड्डा सांसद बनकर दिल्ली पहुंचे और हरियाणा में भजनलाल मुख्यमंत्री बने. उन्होंने किलोई के विधायक कृष्णमूर्ति हुड्डा को ज्यादा अहमियत देते थे. उन दिनों भी आज के दौर की तरह अकसर हुड्डा कहा करते थे कि चंड़ीगढ़ का रास्ता दिल्ली होकर जाता है और उन्होंने 2005 में भजनलाल को पछाड़कर खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी कब्जा ली थी. क्योंकि वो जानते थे कि हरियाणा की कमान किसके हाथ में होगी, यह दिल्ली ही तय करती है. इस अतीत से यही पता चलता है कि हुड्डा परिवार ने जिन संघर्षों में खुद को इस मुकाम तक पहुंचाया है, उन संघर्षों से दीपेंद्र हुड्डा अभी रू-ब-रू नहीं हुए हैं. उनके संघर्षों का दौर अभी शुरू हुआ है और खुदानाखास्ता उनके पिता पर चल रहे केसों में उन्हें सजा हो जाती है तो दीपेंद्र हुड्डा के भविष्य की राह मुश्किलों से भरती चली जाएगी.
सोशल मीडिया के दौर में हरियाणा के दो युवा नेता काफी चर्चाओं में रहते हैं. दीपेंद्र हुड्डा व दुष्यंत चौटाला. हालांकि दोनों ही परिवारवाद की राजनीति की उपज हैं. फिर भी दोनों के व्यक्तित्व में काफी अंतर साफ नजर आते हैं.
दुष्यंत चौटाला दुस्साहस के प्रतीक हैं तो दीपेंद्र छुईमुई किस्म के नेता हैं. अब यह बात अलग है कि दुष्साहस के पीछे विजन छुपा हुआ है या अति आत्मविश्वास. दुष्यंत चौटाला का ये दुस्साहस उन्हें किस ओर लेकर जाएगा, यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है. दीपेंद्र हुड्डा ने 15 साल लोकसभा सांसद होते हुए शायद ही कभी प्रेस कान्फ्रेंस करने की हिम्मत दिखाई है. जबकि दुष्यंत चौटाला समय के साथ मीडिया से रूबरू होते रहे हैं. दीपेंद्र हुड्डा के पिता पर केस चल रहे हैं और दुष्यंत चौटाला के पिता भ्रष्टाचार के केस में जेल में हैं, तब भी दुष्यंत इस दबाव को मीडिया में उजागर नहीं होने देते. यही विशिष्टता उन्हें दीपेंद्र से कई कदम आगे ले जाती है. 2019 के लोकसभा चुनाव में हार भले ही दोनों सांसदों की हो गई है. पर इस हार में दीपेंद्र हुड्डा जहां बिखरते हुए दिख रहे हैं, वही दुष्यंत चौटाला में इस हार के बाद निखरते जाने की पूरी संभावनाएं नज़र आ रही हैं.
दो युवा नेताओं के विज़न और रणनीति में यह फर्क साफ दिखता है कि दुष्यंत चौटाला गिर कर खड़े होना सीख रहे हैं, जबकि दीपेंद्र हुड्डा आज भी अपने पिता के भरोसे राजनीतिक संजीवनी ले रहे हैं. दरअसल नेताओं की औलादें जितनी फोकी-फोकी खाकर पली होती हैं, उनका मुश्किल समय में उतनी ही जल्दी बिखरने की संभावना भी बनी रहती है. केदारनाथ सिंह की कविता है- समय की मार में बाकी जहां झरे हैं, हम आज भी हरे की हरे हैं. यही पैमाना तय करता है कि आपके भीतर कितनी जिजीविषा है. क्योंकि समय की मार में बहुत कम ही हरे रह पाते हैं.
 


बाकी समाचार