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नया हरियाणा

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

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हरियाणा में विपक्ष जनता के मन को टटोलने में हुआ पूरी तरह फेल!

विपक्ष मीडिया और सोशल मीडिया के भरोसे बैठा रहा.

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25 जून 2019



नया हरियाणा

हरियाणा में करीब एक साल पहले तक राजनीतिक विश्लेषकों, पत्रकारों व विपक्षी नेताओं आदि का मानना था कि बीजेपी अपना जनाधार खो चुकी है. दूसरे शब्दों में वो ये कहते थे कि मोदी का जादू जनता के सिर से उतर गया है और मनोहर सरकार हर मोर्चें पर पूरी तरह नाकाम सरकार साबित हुई है. बीजेपी के कार्यकर्ताओं की नाराजगी को खूब तूल दिया जा रहा था. इसी प्रचार के प्रभाव में आकर सोनीपत से सांसद रमेश कौशिक व भिवानी से सांसद धर्मबीर सिंह ने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने तक की बात कह दी थी और साथ में हरियाणा के मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले गुड़गांव से राव इंद्रजीत सिंह के भी बीजेपी छोड़ने की चर्चाएं चलने लगी थी. इसके साथ-साथ बीजेपी के बड़े मंत्रियों के हारने या सीट बदलने की चर्चाएं मीडिया व सोशल मीडिया में छाई रहती थी. इस प्रचार का इतना बोलबाला था कि मुख्यमंत्री करनाल से चुनाव नहीं लड़ेंगे, यह भी खूब प्रचारित किया जाता था. खैर कुल मिलाकर इस तरह के प्रचारों का लब्बोलुआब यही था कि बीजेपी चारों खाने चित्त होगी.
 इन तमाम आक्रामक प्रचारों के बीच बीजेपी का ग्राफ चुपचाप बढ़ता हुआ महसूस हो रहा था. जिसकी लगातार अनदेखी की जा रही थी. कुछ ने अनदेखी जानबूझकर एजेंड़े के तहत की तो, तो कुछ नासमझी में करते रहे. दरअसल हरियाणा की जनता के बदलते मन को पढ़ने में पुराने विश्लेषक नाकाम रहें, क्योंकि वो पारंपरिक तौर पर चली आ रही पद्धतियों से ही राजनीतिक आकलन करते रहे या अपनी सद्-ईच्छा को अपने विश्लेषण में ‘इन-बिल्ट’ करते रहे. इसी कारण परिणाम विश्लेषकों के दिए निष्कर्षों से बिल्कुल अलग निकले.
पूरा विपक्ष जहां मनोहर लाल पर यह आरोप लगा रहा था कि मुख्यमंत्री अनुभवहीन हैं. वहीं आमजन में उनके बाबत दो बातें लगातार सुनने को मिल रही थी कि मनोहर लाल शरीफ और ईमानदार हैं. दरअसल इन दोनों विशेषणों के पीछे दो नैरेटिव मुख्य रूप से काम कर रहे थे. जिनका सीधा संबंध ओपी चौटाला की सरकार और भूपेंद्र हुड्डा की सरकार रही हैं. ओपी चौटाला सरकार की छवि  गुंडागर्दी वाली बनी हुई थी, तो हुड्डा सरकार की छवि भ्रष्ट सरकार की बनी हुई थी. राजनीति में निर्मित्त इन छवियों का बड़ा रोल होता है. भले ही इन छवियों के निर्माण में यर्थाथ, कल्पना व दुष्प्रचार आदि का योगदान होता है. इन दो अतियों के बीच मनोहर सरकार की ढुलमुल व लचीली  सरकार जनता को रास आने लगी थी. मनोहर सरकार हर मौके पर नरमाई दिखाती रही और विपक्ष हर बार आक्रामक होकर वार करता रहा. ये नरमाई मनोहर सरकार के प्रति सहानुभूति भी क्रिएट करने लगी. नौकरियों के बड़े धमाके को अगर अलग कर दिया जाए तो मनोहर सरकार के छोटे-छोटे कदम जनता के बीच धीरे-धीरे असर करते हुए साफ दिख रहे थे और एक ईमानदार सरकार का टैग मनोहर सरकार पर लगता जा रहा था.
भले ही सरकारी तंत्र पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हुआ हो पर जनता के बीच ये मैसेज खूब चला हुआ है कि मनोहर लाल ईमानदार हैं. उनकी खुद की छवि ईमानदार नेता की है. जबकि ओपी चौटाला व भूपेंद्र हुड्डा दोनों की छवि भ्रष्ट नेता की बनी हुई है. खासकर भूपेंद्र हुड्डा की छवि तो भ्रष्ट नेता की ही बनी हुई है. ओपी चौटाला जेबीटी भर्ती घोटाले में 10 साल की सजा काट रहे हैं. पूर्व सीएम हुड्डा पर दर्जनों भ्रष्टाचार के केस चल रहे हैं. मनोहर लाल की व्यक्तिगत ईमानदारी को ईमानदारी से दी नौकरियों ने पूरी सरकार की ईमानदारी में बदल दिया. ईमानदारी से दी गई नौकरियों ने बीजेपी का ग्राफ सबसे ज्यादा गांवों में बढ़ाया और हरियाणा के हर छोर तक इसकी गूंज अब साफ सुनाई दे रही है. लोकसभा चुनावों में दो एम फैक्टर खूब काम रहे हैं- पहला मोदी और दूसरा मैरिट पर दी गई नौकरियां. मैरिट पर दी गई नौकरियों ने आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के लिए मजबूत नींव रख दी. तभी 60 से लेकर 80 सीट जीतने की संभावनाएं बनती हुई साफ दिख रही हैं. वर्तमान समय में बीजेपी की तरफ एक तरफा माहौल बना हुआ है. इस माहौल को बनाने के लिए बीजेपी ने कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई और न ही प्रचार के जरिए पूर्व सीएम की तरह नंबर वन हरियाणा जैसी कोई टैग लाइन चलाई. बीजेपी के काम करने के तरीके ही उसकी छवि निर्मित्त करते रहे.
राजनीति में सभी दल अपनी पार्टी की छवि के निर्माण के लिए अलग-अलग माध्यमों का प्रयोग करते रहे हैं. सत्तादल जहां अपने कामकाज के अलावा मीडिया मैनेजमेंट के माध्यम से खुद का प्रचार करता है. वहीं मनोहर सरकार कछुए की चाल से व्यवस्था परिवर्तन की तरफ बढ़ती हुई दिख रही है और बिना किसी भेदभाव के सरकार के काम करने का तरीका जनता को पसंद आ रहा है. जबकि पिछली सरकारों के अनुभव इतने कड़वे थे कि पूर्व सीएम हुड्डा ने अपने विरोधी कांग्रेसियों के क्षेत्र तक में विकास नहीं होने दिया था. हरियाणा में पूरा विपक्ष जहां मनोहर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए मीडिया व सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता रहा, वहीं मनोहर सरकार अपनी कार्यशैली की वजह से जनता के बीच अपनी खास जगह बनाने में सफल रही. 
पिछले कुछ साल में एक अलग तरह का ट्रेंड देखने को मिल रहा है कि मीडिया समूह खुद को विपक्ष घोषित करने लगे हैं और विपक्षी पार्टियां इन मीडिया समूहों की पीछलग्गू बनकर रह गई हैं. मीडिया एक जनमाध्यम हो सकता है, परंतु विपक्ष तो पूरी तरह मीडिया के भरोसे ही अपने राज आने के इंतजार में लगा हुआ है. इसी कारण वर्तमान समय में विपक्ष का पूरी तरह सफाया हो गया है. कुछ विश्लेषक बीजेपी की जीत में जाट-गैर जाट की राजनीति को मूलमंत्र मानते हैं. जबकि लोकसभा चुनाव में दोनों जाट नेताओं को टिकट मिली थी और दोनों हिसार से बृजेंद्र सिंह और भिवानी से धर्मबीर सिंह भारी मतों से जीत कर आये हैं. जाट-गैर जाट का मुद्दा अगर थोड़ा बहुत कहीं वर्किंग भी है तो उसे भी बीजेपी को परोसकर देने वाला विपक्ष ही है.
इनेलो और हुड्डा समर्थकों ने जाट आरक्षण आंदोलन की आड़ में बीजेपी सरकार पर दबाव बनाने की भरसक कोशिशें की और हालत यहां तक पहुंचा दी थी कि जाटों को ही बीजेपी के विपक्ष के तौर पर खड़ा कर दिया. दूसरी तरफ बीजेपी पर ही ये आरोप मढ़ दिए गए कि वो जाट-गैर जाट की राजनीति कर रही है. जबकि ये सारा खेल आरक्षण आंदोलन की आड़ में खुद विपक्ष ने खड़ा करना शुरू किया था. जिसकी कीमत आज कांग्रेस, इनेलो, लोसुपा और जेजेपी आदि सभी दल चुका रहे हैं. इस खेल में बीजेपी भी शामिल रही है, परंतु जनता के पास बड़े खलनायक और छोटे खलनायक में से किसी एक को तो चुनना ही था, सो जनता ने बीजेपी को चुना. राजनीति एक स्तर पर जोड़ती है तो दूसरे स्तर पर तोड़ती भी है. इसी जोड़-तोड़ के कारण राजनीति में सिनेमा की तरह रोमांच बना रहता है. 
कहां तो विश्लेषक कहते थे कि हरियाणा में मोदी का जादू खत्म हो गया है. कहां अब हरियाणा में मनोहर लाल का जादू अलग से सिर चढ़कर बोल रहा है.


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