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नया हरियाणा

शनिवार, 20 जुलाई 2019

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कांग्रेस के हलक में पूरी तरह फंस चुके हैं हुड्डा!

पिछले दिनों में हुड्डा की हाईकमान में पकड़ ढीली हुई है और रणदीप सुरजेवाला की पकड़ पार्टी में आज हरियाणा के दूसरे नेताओं से ज्यादा है

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24 जून 2019



नया हरियाणा


हरियाणा की राजनीति में जींद उपचुनाव को कई कारणों से लंबे समय तक याद किया जाएगा. राजनीतिक लिहाज से यह एक ऐतिहासिक चुनाव भी था. ऐतिहासिक कई संदर्भों में कह सकते हैं जैसे जननायक जनता पार्टी की तरफ से पहला चुनाव लड़ा गया और दुष्यंत चौटाला ने अपने भाई दिग्विजय चौटाला को मैदान में उतारा. भाई को मैदान में उतारने पर भले ही उन पर परिवारवाद का आरोप लगा हो परंतु यहां अपनी संपूर्ण शक्ति लगाना जेजेपी की मजबूरी भी थी. एक तरफ उसे खुद को इनेलो से बेहतर साबित करना था, तो दूसरी तरफ उसे यहां जीत की सबसे ज्यादा उम्मीद थी. जाट बहुल होने के कारण राजनीतिक विश्लेषक व पत्रकार आदि सभी जेजेपी की जीत की चर्चाएं कर रहे थे. अरविंद केजरीवाल के समर्थन के बाद तो उम्मीद कई गुना बढ़ गई थी. 
 कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय नेता रणदीप सुरजेवाला को मैदान में उतार कर इस उपचुनाव को एकदम से राष्ट्रीय सुर्खियों के चुनाव में बदल दिया. उनके मैदान में उतरते ही पूरी बीजेपी हरकत में आ गई. उसने अपने पूरे संसाधन इस चुनाव में झोंक दिए. दूसरी तरफ कांग्रेस में इसका असर यह हुआ कि जींद के स्थानीय नेताओं को यह अपना अपमान लगा. इसके अलावा कांग्रेस के दूसरे दिग्गज नेताओं को सुरजेवाला रूपी कांटा निकालने का सुनहरा मौका मिल गया. हालांकि कांटा निकालने वाला नैरेटिव शिक्षामंत्री रामबिलास शर्मा ने पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा के संदर्भ में दिया था. कांग्रेसी नेताओं की जगजाहिर लड़ाई के कारण यह नैरेटिव जनता के बीच सच की तरह फैल गया.
 नैरेटिव की खासियत होती है कि जब तक वह अमूर्त रूप में होते हैं तब तक केवल बौद्धिक चर्चाओं के माध्यम से अपना विस्तार करते हैं. यह एक लंबी प्रक्रिया है. परंतु पॉपुलर विमर्श में जब यही नैरेटिव मूर्त रूप में आता है तो पहले की तुलना में ज्यादा असरदार और घातक सिद्ध होता है. पारंपरिक मीडिया के दौर में इसे मैनेज करना आसान होता था परंतु सोशल मीडिया के दौर में यह पहले की तुलना में ज्यादा जल्दी से फैलता है. इस मामले में भी यही हुआ. राजनीति में ऐसी तस्वीरें मनोरंजन के रूप में फैलती हैं, परंतु अपने डिसकोर्स को मुकाम तक पहुंचा देती हैं. जिसे वर्तमान समय के राजनीतिक विश्लेषक समझ नहीं पाते और न ही विश्लेषित करते हैं.
यह बात जगजाहिर है कि पिछले दिनों में हुड्डा की हाईकमान में पकड़ ढीली हुई है और रणदीप सुरजेवाला की पकड़ पार्टी में आज हरियाणा के दूसरे नेताओं से ज्यादा है. दूसरी तरफ यह कहा जा रहा था कि नगर निगम चुनाव में बाकी सभी नेताओं को हार का सामना करना पड़ा था, बस अकेले रणदीप बचे थे, जिन्हें अब जींद उपचुनाव में आगे करके बदला लिया जा रहा है. राजनीति में नैरेटिव ऐसे ही बनते-बिगड़ते रहते हैं और पब्लिक में जब इन बातों पर डिसकोर्स होता है तो उसमें मनोरंजन की महीन परत छिपी होती है. जिसके कारण आमजन की राजनीति में दिलचस्पी बढ़ती है. जिसे हरयाणवी में राजनीति के चासड़ू कहा जाता है. चुनाव के समय इन डिसकोर्स में कुछ ऐजेंडे मिल जाने से चुनाव कंपेन चौक-चौराहों से आगे घर के आंगनों में परवेश कर जाते हैं. जातिगत समीकरणों वाले खेल नेताओं के ऑफिसों से निकलकर आम चर्चाओं के बहसों का हिस्सा बन जाते हैं. जिसके कारण चुनाव में विकास के मुद्दे और हलके के कामकाज से आगे निकलकर (सही मायनों पिछड़कर) जातिगत आधार को ठोस रूप में बदल देते हैं.
दरअसल जींद में कांग्रेस की हार की पटकथा अपने दस साल के शासन में पूर्व सीएम हुड्डा ने अपने हाथों से लिख दी थी. उस दस साल में हुड्डा ने वीरेंद्र सिंह की चौधर की अकड़ निकालने के लिए सारे हथकंडे अपनाए. जींद के कांग्रेसी नेता मांगेराम गुप्ता हो या जुलाना से परमिंद्र ढुल दोनों की घोर उपेक्षा की. इस उपेक्षा का परिणाम यह निकला कि  जींद जिले में कांग्रेस धीरे-धीरे खत्म होने लगी. जींद जिले को यह अहसास करा दिया गया कि सत्ता में आपकी भागीदारी नहीं है. पूर्व सीएम हुड्डा द्वारा दूसरों के लिए खोदे गए गड्ढे में एक दिन उन्हें ही गिरना पड़ेगा, तब सत्ता के नशे में चूर हुड्डा का ये अहसास नहीं था. सोनीपत लोकसभा चुनाव में हुड्डा को इसकी कीमत चुकानी पड़ी.
दरअसल पूर्व सीएम हुड्डा ने अपने दस साल के शासन में कांग्रेस की विविधता को खत्म करते हुए उसे हुड्डा वाली कांग्रेस में बदल दिया. शासन करने का ढंग बहुत कुछ इनेलो से मिलता जुलता होने के कारण इसे मीठी इनेलो कह सकते हैं. इनेलो में जो कड़वापन था, उसे मीठेपन(ठग) में बदल दिया. सोनीपत लोकसभा चुनाव में एक बुजुर्ग अंतिल ने कहा था कि यो हुड्डा लैक्सन के टैम तो जाट बण ज्या सै फेर जीते पाछै बाणिया बण ज्या सै. ओपी चौटाला के जेल जाने के बाद हुड्डा को भ्रम हो गया था कि मुझे सत्ता से अब कोई नहीं हटा सकता. क्योंकि इन्होंने सोनीपत व रोहतक की सीटों पर अपनी पैठ बनाकर खुद को कांग्रेस के भीतर बाहुबलि बना लिया था. खुद को कांग्रेस के पहले और अंतिम विकल्प के तौर पर पोट्रेट करने के लिए इन्होंने जितने हथकंडे अपनाए जा सकते थे, उतने अपनाए. कुल मिलाकर इन सबकी कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ रही है. अब हालात ये हैं कि कांग्रेस के लिए हुड्डा अब न तो निगले बन रहा है और न उगले. कांग्रेस के हलक में हुड्डा पूरी तरह फंस चुके हैं.
कांग्रेस के पास जींद उपचुनाव में पार्टी के भीतर एकता दिखाने का सुनहरा अवसर था और जींद में मृत हो चुकी कांग्रेस को जीवित करने का भी मौका था. कांग्रेस चाहती तो अपने स्थानीय नेताओं को मौका देती और पूरी एकजुटता के साथ चुनाव लड़ती. भले ही हार जाती परंतु राजनीति में एक साथ दिखने का दिखावा सबसे जरूरी होता है. जिसमें बीजेपी अब तक पूरी तरह सफल दिख रही है. वो अपनी पार्टी के भीतर के मतभेदों को पब्लिक स्पेस में कम से कम आने देती है या आए हुए को मैनेज कर लेती है. जबकि कांग्रेसी नेता अपने नेताओं के खिलाफ जुबान खोलने का कोई मौका नहीं छोड़ते. हरियाणा में कांग्रेस पार्टी कहीं नजर नहीं आती बल्कि ऐसा लगता है कि निर्दलीय नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है, जो खुद की चिंताओं  से बाहर नहीं निकलते, पार्टी हित का विचार कहां से आएगा.


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