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नया हरियाणा

रविवार, 22 सितंबर 2019

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2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस छू नहीं पाएगी दहाई का आंकड़ा!

हरियाणा में विधानसभा चुनावों के करीब 100 दिन बचे हैं.

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21 जून 2019



नया हरियाणा

हरियाणा में विधानसभा चुनावों के करीब 100 दिन बचे हैं. सभी पार्टियों ने अपने-अपने तरीके से चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों में हरियाणा लोकसभा की सभी 10 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज करके यह संदेश दिया है कि विधानसभा चुनावों में उसे किसी भी पार्टी की तरफ से कोई चुनौती मिलने वाली नहीं है. यह संदेश इस कारण भी ज्यादा स्पष्ट दिख रहा है क्योंकि 9 लोकसभाओं पर बड़े मार्जन से बीजेपी ने जीत दर्ज की है और  कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गजों को करारी हार का सामना करना पड़ा है.

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद जब हरियाणा में पहली बार बहुमत से बीजेपी की सरकार बनी थी तो कांग्रेस व अन्य दलों का कहना था कि बीजेपी मोदी लहर में जीत गई है. हरियाणा में करीब 5 साल के शासन में मनोहर लाल की सरकार ने अपनी कार्यशैली से जनता के दिल में एक खास जगह बनाई है, जिसकी अनदेखी विपक्ष लगातार करता जा रहा है. 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद भी विपक्ष ये कह रहा है कि लोकसभा की 10 सीट बीजेपी को मोदी नामक सुनामी में मिली हैं. जबकि हरियाणा में हुए मेयर के चुनावों व जींद उपचुनाव ने साफ संकेत दे दिए थे कि जिस बीजेपी को हरियाणा में शहरी पार्टी कहा जाता था, उसने ग्रामीण इलाकों में भी अपनी पैठ बना ली है. बीजेपी की कार्यशैली के साथ-साथ ईमानदारी से दी गई नौकरियों ने हरियाणा में बीजेपी का ग्राफ हर जगह बढ़ा दिया है. मेवात जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र में भी बीजेपी का वोट बैंक करीब 40 प्रतिशत बढ़ा है.

इस करारी हार के बाद कांग्रेस में जहां आत्ममंथन और एकता की जरूरत है, वहीं कांग्रेस हरियाणा में अब भी आपसी लड़ाई में उलझी हुई है, जबकि बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ दिख रहा है, तब भी बीजेपी अपनी इस जीत को विराट रूप देने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है और रणनीति के स्तर पर भी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की घेराबंदी करती हुई साफ दिख रही है. ओपी चौटाला के परिवार में विभाजन के बाद इनेलो व जेजेपी दो पार्टी बनने से दोनों ही पार्टियां सत्ता की लड़ाई से पूरी तरह बाहर हो गई हैं. इनेलो खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है, क्योंकि इनके ज्यादातर नेता जेजेपी या बीजेपी में शामिल हो गए हैं या होने वाले हैं. दूसरी तरफ जेजेपी अभी पार्टी के संगठन को मजबूत नहीं कर पाई है और न ही किसी खास विजन को जनता के सामने रख पाई है. फिलहाल जेजेपी इनेलो से अलग छवि निर्मित करने में ही उलझी हुई है.

हरियाणा में कांग्रेस अलग-अलग धड़ों में बंटी हुई है. कांग्रेस हाईकमान कांग्रेस के भीतर एकता स्थापित करने में पूरी तरह नाकाम हुआ है. जिसके परिणामस्वरूप पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा, रणदीप सुरजेवाला, किरण चौधरी, कुलदीप बिश्नोई, कुमारी शैलजा व अशोक तंवर आदि खेमों में बंटी कांग्रेस आपसी भीतरघात व कांटे निकालने की संस्कृति से उभर नहीं पाई है. इसी कमी का फायदा उठाते हुए बीजेपी ने आने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के खिलाफ घेराबंदी मजबूत कर दी है.

अशोक तंवरकुमारी शैलजा दोनों ही विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. पूर्व सीएम हुड्डा इस बार बरोदा विधानसभा से चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, जबकि बीजेपी ने उनके खिलाफ चुनाव में दीपा नागपाल मलिक को मैदान में उतारने की तैयारी की है. किलोई हलके से दीपेंद्र हुड्डा मैदान में होंगे, वहीं बीजेपी ने इनेलो के नेता सतीश नांदल को यहां से मैदान में उतारने की तैयारी की हुई है. अशोक अरोड़ा के इनेलो प्रदेश अध्यक्ष पद से दिए गए इस्तीफे के स्वीकार करने के बाद ओपी चौटाला ने सतीश नांदल को प्रदेश अध्यक्ष बनने का न्यौता दिया था, परंतु उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया. सतीश नांदल कहीं न कहीं बीजेपी की टिकट पर खुद की जीत की संभावनाओं को भांप गए थे. सतीश नांदल किलोई हलके में अपनी एक विशिष्ट छवि रखते हैं, जिसका उन्हें आने वाले चुनाव में फायदा मिल सकता है. जिस तरह लोकसभा चुनावों में दोनों बाप-बेटे अपने क्षेत्र तक सीमित रह गए थे, ठीक यही काम आने वाले विधानसभा चुनावों में होने वाला है. जिसके कारण इनके प्रभाव वाले विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी अपनी जीत की संभावनाओं को बढ़ा लेगी.

कांग्रेस में नेशनल स्तर के नेता रणदीप सुरजेवाला कैथल विधानसभा से चुनाव लड़ते हैं, इस बार यहां से इनकी मुश्किलें बढ़ाने के लिए बीजेपी ने इनेलो नेता कैलाश भगत को बीजेपी में शामिल कर लिया है और उन्हें यहां से चुनाव की तैयारी शुरू भी कर दी है. 2019 के लोकसभा चुनावों में कैथल हलके से बीजेपी ने जीत दर्ज की है. इस जीत ने बीजेपी के कार्यकर्ताओं व पार्टी दोनों के हौंसले बढ़ा दिए हैं. आदमपुर से कुलदीप बिश्नोई के खिलाफ बीजेपी ने कांग्रेस के सतींद्र सिंह को मैदान में उतारने की रणनीति बनाई है. इस लोकसभा चुनावों में कुलदीप बिश्नोई के बेटे भव्य बिश्नोई को आदमपुर से हार का सामना करना पड़ा था. लगभग इसी तरह के हालात तोशाम हलके से किरण चौधरी के बने हुए हैं. वहां से लोकसभा में बीजेपी ने जीत दर्ज की है. कांग्रेस के इन दिग्गज नेताओं की घेराबंदी के लिए बीजेपी ने ठोस रणनीति अपनाई है. वहीं कांग्रेस नेता हरियाणा के बदले राजनीतिक हालात को समझने में चूक कर रहे हैं और अभी भी अध्यक्ष पद के लिए लड़ते हुए दिख रहे हैं. कांग्रेस के भीतर नेताओं की ये लड़ाई साफ करती है कि हरियाणा में कांग्रेस पार्टी न होकर कुछ नेताओं की बपौती बनकर रह गई है. जिसके कारण पार्टी के भीतर का संगठन पूरी तरह बिखर गया है. बिखरा हुआ संगठन कभी जीत नहीं दिला सकता, जबकि बीजेपी पूरी तरह संगठित होकर काम करती हुई दिखती है.

कांग्रेसी नेता यूं ही लड़ते-झगड़ते रहे तो हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस दहाई का आंकड़ा मुश्किल से पकड़ पाएगी और कांग्रेस के स्वघोषित दिग्गज नेताओं की करारी हार हो जाए तो कोई हैरानी वाली बात नहीं होगी.


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