Hindi Online Test Privacy Policy | About Us | Contact

नया हरियाणा

सोमवार , 17 जून 2019

पहला पन्‍ना English सर्वे लोकप्रिय हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप

क्या अब कांग्रेस में गांधी युग का अंत जरूरी ?

परिवारवाद या वंशवाद कांग्रेस के लिए दीमक की तरह हो चुका है।

rahul gandhi in congress, rahul gandhu yug in congress, congess ki haar ka karan hai rahul gandhi, naya haryana, नया हरियाणा

27 मई 2019



प्रदीप डबास

दिसंबर 2017 में जब राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जा रहा था तो उस वक्त देश की ज्यादातर जनता के बीच राहुल की जो छवि थी उसे सभी भली प्रकार जानते हैं। 2014 की हार और फिर लगातार तीन साल हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना। कांग्रेस को क्या लग रहा था कि चुनाव से सिर्फ साल- डेढ़ पहले फील्ड में उतरेंगे और मोर्चा मार लेंगे, गलतफहमियों का नतीजा यही होता है कि हार की जिम्मेदारी ली जाए और इस्तीफा दिया जाए। राहुल गांधी इस बात को समझ ही नहीं पाए हैं कि राजनीति पार्ट टाइम हो ही नहीं सकती। देश की सबसे पुरानी पार्टी की अगर ये दुर्दशा हुई है तो इसके लिए सिर्फ राहुल गांधी को ही जिम्मेदारी लेनी चाहिए और उनका इस्तीफा स्वीकार भी होना चाहिए। पूरी कांग्रेस पार्टी को 2019 के चुनावों में उनसे उम्मीदें थीं लेकिन राहुल गांधी तो खुद अपनी खानदानी सीट तक नहीं बचा पाए। इस देश में अब तक 14 प्रधानमंत्री बने हैं, जिनमें से आठ बार अमेठी लोकसभा सीट से निर्वाचित होकर संसद में पहुंचे थे। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी तक सभी। मतलब जिस निर्वाचन क्षेत्र के लोगों से आप इतना समर्थन पा रहे थे उन्हें ही अपनी बातों से सहमत नहीं कर सके तो आपके नेतृत्व पर सवालीया निशान लगने ही चाहिए।

परिवारवाद या वंशवाद कांग्रेस के लिए दीमक की तरह हो चुका है। ये सवा सौ साल पुरानी पार्टी को भीतर से खोखला कर चुका है। राहुल को जब अध्यक्ष पद सौंपा जा रहा था तो उसकी जो टीम दिखाई दे रही थी उनमें तमाम वो चेहरे थे जो उनके पिता राजीव गांधी या चाचा संजय गांधी के लिए भी काम करते थे। जो नए चेहरे राहुल गांधी के साथ दिखते हैं वो भी कोई संघर्ष करके बने नेता तो नहीं हैं। तमाम अपने पिता की ड्राइंगरूम वाली कांग्रेस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनमें चाहे माधोराव सींधिया के बेटे हों या राजेश पायलेट के बेटे या शमशेर सिंह सुरजेवाला के लाल। पुरानों में अंबिका सोनी और आनंद शर्मा जैसे नामों कैसे भुला सकते हैं जो शायद ही लोगों के बीच दिखाई देते हैं लेकिन कांग्रेस के फैसलों में इन्हें पूरी तरजीह मिलती है। कहने का मतलब ये है कि राहुल के पास कांग्रेस में अपनी कोई टीम ही नहीं है सब विरासत में मिले हुए लोग हैं, जिनमें से हर कोई कांग्रेस को अपनी बापौती समझता है। सवाल ये उठता है कि राहुल गांधी ने अपने अध्यक्ष बनने के बाद क्या संगठन में बदलाव का कोई प्रयास किया। जवाब नहीं के अलावा कुछ नहीं है।

2019 की हार ने राहुल गांधी को एक पस्त नेता के तौर पर पेश किया है। गांधी परिवार के मुख्य उत्तराधिकारी की इस तरह की छवि बनना खुद कांग्रेस पार्टी के लिए बेहद घातक साबित हो सकती है। इस छवि के साथ राहुल गांधी संसद में तो बैठेंगे लेकिन इस बार वायनाड से सांसद के रूम में। ये जीत उनके लिए उस समय हार के समान होगी जब सामने सत्ता पक्ष के पंक्तियों में स्मृति ईरानी दिखाई देंगी।

ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस में गांधी युग का अंत अब आ चुका है या कांग्रेस को कुछ वक्त के लिए गांधी परिवार की छतरी के नीचे से निकलकर अपने फैसले खुद लेने चाहिए। मतलब कांग्रेस में ऊपर से लेकर नीचे तक संगठनात्म स्तर पर हर संभव बदलाव। ये अब जरूरी लगने लगा है क्योंकि 17 राज्यों में अगर पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई तो इसका मतलब गांधी परिवार को समझ लेना चाहिए। चुनाव से ठीक पहले तो प्रियंका मैजिक भी चलाने की कोशिश की गई, लेकिन भाई-बहन की जोड़ी पांच साल सत्ता में रह चुकी बीजेपी सरकार के खिलाफ हवा बनाना तो दूर खुद उसकी आंधी में उड़ गए।

हां इतना जरूर कहा जा सकता है कि राहुल गांधी इन डेढ़ दो साल के भीतर जनता के बीच अपनी छवि को थोड़ा सुधारने में जरूर कामयाब रहे हैं। पिछले कुछ समय से उनका आत्मविश्वास बढ़ हुआ दिखा जिसकी वजह से मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें भी बन गईं, लेकिन यहां सवाल ये भी उठ रहा है कि ये तीन राज्य जीतने के बाद कहीं राहुल गांधी का ये आत्मविश्वास अति उत्साह में तो नहीं बदल गया था। उन्हें लगने लगा कि जनता ने मन बना लिया कि कांग्रेस ही एक बेहतर विकल्प हो सकती है। इस तरह की गलतफहमी सिर्फ अतिआत्मविश्वास के कारण ही हो सकती है, कहीं इस वजह से राहुल गांधी ने राज्यों के बड़े नेताओं के बीच चल रही फूट को खत्म करने की कोशिश तक नहीं की और न ही राज्यों में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को दुरुस्त करने की जहमत तक उठाई गई। कई राज्यों में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के अलावा लंबे समय से किसी नेता के पास शायद किसी कोई पद ही नहीं है। ऐसे में 17 राज्यों में अगर पार्टी की सीटें शून्य रहती हैं तो फिर इसमें हैरानी क्यों जताई जा रही है।  

जब संगठन ही मजबूत नहीं होगा या उसका कोई ढांचा ही नहीं होगा तो राज्यों में जो दूसरे बड़े नेता होंगे जिनकी सीधी पहुंच राहुल गांधी तक होगी वो अध्यक्ष की बात क्यों सुनेंगे। यहीं हो रहा था पिछले कई साल से कांग्रेस में और इसे सुधारा नहीं गया।

2019 में मदी की आंधी में उड़ी कांग्रेस के लिए अब अपने जीते हुए राज्यों में सरकार बचाने का संकट भी खड़ा हो गया है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान में क्या कुछ महीने पहले बनी कांग्रेस की सरकार बची रह पाएगी अगर नहीं तो भी ये राहुल गांधी के नेतृत्व पर ही सवाल होगा। इसके अलावा कुछ ही महीने बाद हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में चुनाव होने हैं। हरियाणा में कांग्रेस अंदूरनी कलह की इस कदर शिकार है कि अब तो ऐसा लगता है कि यहां के नेता खुद जीतने की बजाए प्रदेश में पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं को घर बैठाने की जुगत में ज्यादा रहते हैं। ऐसे में अक्टूबर के चुनाव तक कोई करिशमा होगा ये मुमकिन नहीं लग रहा है।

कहा ये जा सकता है कि भले ही राहुल गांधी ने अपनी व्यक्तिगत छवि में कुछ सुधार किया हो लेकिन पार्टी स्तर पर उनके प्रयास लोगों को सहमती तक नहीं पहुंचा सके। राजनीतिक दूरदर्शिता की कमी भी इस दौरान कांग्रेस में साफ दिखाई दी। देश के इतिहास में शायद ये पहली बार हुआ था कि विपक्ष के घोषणापत्र को सत्ता पक्ष ने अपना चुनावी मुद्दा बनाया हो। अभी तक तो सत्ताधारी दल के घोषणापत्र को लेकर सवाल खड़े होते हुए देखे और सुने थे, कांग्रेस ने बीजेपी को ये मौका भी दे दिया। कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में किए गए वादों को भी लोगों तक पहुंचाने और समझाने में पूरी तरह नाकामयाब रही। खुद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी न्याय योजना को उस तरह नहीं बता पा रहे थे जैसी जरूरत थी। ये फर्क है अमित शाह, नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के नेताओं के बीच। बीजेपी के बड़े नेता यदि कुछ करते हैं तो उसे इस अंदाज में पेश किया जाता है कि उसका जिक्र लोगों की जुबान पर आ जाता है लेकिन कांग्रेस के नेता ऐसा कर पाने में नाकामयाब दिखाई देते हैं।

परिवारवाद को लेकर भी देश की जनता के बीच सवाल उठने लगे हैं कि क्या देश की सत्ता का केंद्र एक ही परिवार के आसपास रहेगा। मतलब देश अब परिवारवाद की राजनीति से पीछा छुड़वाना चाहता है ऐसे में कांग्रेस के लिए जरूरी हो गया है कि पार्टी की कमान गांधी परिवार की बजाए ऐसे हाथों में सौंपी जाए जिन्हें संगठन चलाने का अनुभव हो और जो पार्टी के भीतर सालों से बैठे मठाधीशों की परवाह न करे।

 


बाकी समाचार