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नया हरियाणा

सोमवार , 20 अगस्त 2018

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ताऊ देवीलाल : भारत और हरियाणा की राजनीति के महानायक

ताऊ देवीलाल परिवारवाद की राजनीति का विरोध करते रहे और परिवार इस राह पर ही निकल पड़ा.

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6 अप्रैल 2018

नया हरियाणा

25 सितंबर, 1914 को सिरसा में जन्मे भारतीय राजनीति के इस दबंग ताऊ का निधन छह अप्रैल, 2001 को हुआ, उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में यमुना नदी के तट पर चौधरी चरण सिंह की समाधि किसान घाट के पास संघर्ष स्थल पर हुआ था. वैसे जाट समुदाय के इन दो नेताओं ने नरेंद्र मोदी के आगमन से बहुत पहले कांग्रेस मुक्त भारत का ना केवल सपना देखा था बल्कि काफ़ी हद तक धरातल पर उतारने में कामयाब रहे थे. देवीलाल के पिता का नाम चौधरी लेखराम  और माता श्रीमती शुंगा देवी है. आपकी पत्नी का नाम श्रीमती हरखी देवी है.
ताऊ देवीलाल के लिए अनेक विशेषणों का प्रयोग होता रहा है. जिनमें प्रमुख विशेषण हैं -भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री एवं भारतीय राजनीति के पुरोधा, किसानों के मसीहा, महान् स्वतंत्रता सेनानी, हरियाणा के जन्मदाता, राष्ट्रीय राजनीति के भीष्म-पितामह, करोड़ों भारतीयों के जननायक थे। आज भी चौधरी देवी लाल का महज नाम-मात्र लेने से ही, हज़ारों की संख्या में बुजुर्ग एवं नौजवान उद्वेलित हो उठते हैं। उन्होंने आजीवन किसान, मुजारों, मज़दूरों, ग़रीब एवं सर्वहारा वर्ग के लोगों के लिए लड़ाई लड़ी और कभी भी पराजित नहीं हुए। आज उनका क़द भारतीय राजनीति में बहुत ऊंचा है। उन्हें लोग भारतीय राजनीति के अपराजित नायक के रूप में जानते हैं। उन्होंने भारतीय राजनीतिज्ञों के सामने अपना जो चरित्र रखा वह वर्तमान दौर में बहुत प्रासंगिक है।

पारिवारिक विरासत

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ताऊ देवीलाल परिवारवाद की राजनीति का विरोध करते रहे और परिवार इस राह पर ही निकल पड़ा.
चौधरी देवी लाल ने अपने स्कूल की दसवीं की पढ़ाई छोड़कर सन् 1929 से ही राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। चौ. देवीलाल ने सन् 1929 में लाहौर में हुए कांग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशन में एक सच्चे स्वयं सेवक के रूप में भाग लिया और फिर सन् 1930 में आर्य समाज ने नेता स्वामी केशवानन्द द्वारा बनाई गई नमक की पुड़िया ख़रीदी, जिसके फलस्वरूप देशी नमक की पुड़िया ख़रीदने पर चौ. देवीलाल को हाईस्कूल से निकाल दिया गया। इसी घटना से प्रभाविक होकर देवी लाल जी स्वाधीनता संघर्ष में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देवी लाल जी ने देश और प्रदेश में चलाए गए सभी जन-आन्दोलनों एवं स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसके लिए इनको कई बार जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं।

चौ. देवीलाल में बचपन से ही संघर्ष का मादा कूट-कूट भरा हुआ था। परिणामत: बचपन में उन्होंने जहाँ अपने स्कूली जीवन में मुजारों के बच्चों के साथ रहकर नायक की भूमिका निभाई। इसके साथ ही महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, भगत सिंह के जीवन से प्रेरित होकर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर राष्ट्रीय सोच का परिचय दिया। 1962 से 1966 तक हरियाणा को पंजाब से अलग राज्य बनवाने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने सन् 1977 से 1979 तथा 1987 से 1989 तक हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जनकल्याणकारी नीतियों के माध्यम से पूरे देश को एक नई राह दिखाई। इन्हीं नीतियों को बाद में अन्य राज्यों व केन्द्र ने भी अपनाया। इसी प्रकार केन्द्र में प्रधानमंत्री के पद को ठुकरा कर भारतीय राजनीतिक इतिहास में त्याग का नया आयाम स्थापित किया। वे ताउम्र देश एवं जनता की सेवा करते रहे और किसानों के मसीहा के रूप में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
संयुक्त पंजाब के समय वर्तमान हरियाणा जो उस समय पंजाब का ही हिस्सा था, विकास के मामले में भारी भेदभाव हो रहा था। उन्होंने इस भेदभाव को न सिर्फ पार्टी मंच पर निरंतर उठाया बल्कि विधानसभा में भी आंकड़ों सहित यह बात रखीं और हरियाणा को अलग राज्य बनाने के लिए संघर्ष किया। जिसके परिणामस्वरूप 1 नवम्बर, 1966 को अलग हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया और प्रदेश के निर्माण के लिए संघर्ष करने वाले चौधरी देवीलाल को हरियाणा निर्माता के तौर पर जाना जाने लगा।
चौधरी देवी लाल अक्सर कहा करते थे कि भारत के विकास का रास्ता खेतों से होकर गुज़रता है, जब तक ग़रीब किसान, मज़दूर इस देश में सम्पन्न नहीं होगा, तब तक इस देश की उन्नति के कोई मायने नहीं हैं। इसलिए वो अक्सर यह दोहराया करते थे- हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, हर तन पे कपड़ा, हर सिर पे मकान, हर पेट में रोटी, बाकी बात खोटी।
अपने इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए चौ. देवीलाल जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे। उनकी सोच थी कि सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं, अपितु जन सेवा के लिए होती है। चौ. देवीलाल के संघर्षमय जीवन की तस्वीर आज भारतीय जन-मानस के पटल पर साफ़ दिखाई देती है। भारतीय राजनीति के इतिहास में चौ. देवीलाल जैसे संघर्षशील नेता का मादा किसी अन्य राजनीतिक नेता में दिखलाई नहीं पड़ता। वर्तमान समय में जन मानस के पटल पर चौ. देवीलाल के संघर्षमय जीवन की जो तस्वीर अंकित है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत का काम करती रहेगी। चौ. देवीलाल आज हमारे मध्य नहीं हैं, लेकिन उनका बुजुर्गाना अंदाज, मीठी झिड़कियां सही रास्ते की विचारधारा की सीख के रूप में जो कुछ वो देकर गए हैं, वह सदैव हमारे बीच रहेगा। चौ. देवीलाल अपने स्वभावनुसार पूरे ठाठ के साथ, झुझारूपन एवं अनोखी दबंग अस्मिता के साथ जीये। आज अपनी मिट्टी से जुड़े तन-मन के दिलो-दिमाग पर राज करने वाले देवीलाल जैसे जननायक ढूंढने से भी नहीं मिल सकते। जनहित के कार्यों के रूप में स्व. देवीलाल जन-जन के अंत: पटल पर जो कुछ अंकित कर गए हैं, वो लम्बे समय तक उनकी याद जो ताजा कराता रहेगा। जन-मानस बर्बस स्मरण करता रहेगा कि हरियाणा की पुण्य भूमि ने ऐसे नर- केसरी को जन्म दिया था, जिसने अपने त्याग, संघर्ष और जुझारूपन से परिवार के मुखिया ताऊ के दर्जे को, राष्ट्रीय ताऊ के सम्मानजनक एवं श्रद्धापूर्ण पद के रूप में अलंकृत किया।
रामबहादुर राय कहते हैं, "एक दौर तो ऐसा भी रहा कि देवीलाल अपने सामने किसी को कुछ समझते नहीं थे. केवल चंद्रशेखर का लिहाज करते थे. लेकिन उनकी अपनी छवि को ज़्यादा नुकसान ओम प्रकाश चौटाला के करप्शन से हुआ. चौटाला उनके नाम का इस्तेमाल करने लगे थे और सबकुछ जानते हुए भी देवीलाल चुप रहे."

केसी यादव कहते हैं, "देवीलाल की दबंग छवि इसलिए भी बन गई थी क्योंकि वे अपने दौर में इकलौते ऐसे नेता थे जो स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा ले चुके थे, दूसरे भी उनका लिहाज करते रहे. 22 साल के संघर्ष के बाद विधायक बने लेकिन उनके परिवार के लोगों को संघर्ष नहीं करना पड़ा, ऐसे में परिवार के लोगों के पांव फिसलते गए."
पहली दिसंबर, 1989 को आम चुनाव के बाद नतीजे आने के बाद संयुक्त मोर्चा संसदीय दल की बैठक हुई और उस बैठक में विश्वनाथ सिंह के प्रस्ताव और प्रस्ताव पर चंद्रशेखर के समर्थन से चौधरी देवीलाल को संसदीय दल का नेता मान लिया गया था.

देवीलाल धन्यवाद देने के लिए खड़े ज़रूर हुए लेकिन सहज भाव से उन्होंने कहा, "मैं सबसे बुजुर्ग हूं, मुझे सब ताऊ कहते हैं, मुझे ताऊ बने रहना ही पसंद है और मैं ये पद विश्वनाथ प्रताप को सौंपता हूं."

इस वाकये के बारे राज्य सभा के सांसद और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश बताते हैं, "विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का काम अकेले और अकेले देवीलाल का था. क्योंकि जब चुनाव परिणाम आ गया था तो चंद्रशेखर ने कहा कि वे संसदीय दल का नेता बनने के लिए चुनाव लड़ेंगे. ऐसे में विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपनी जीत का भरोसा नहीं रहा, उन्होंने देवीलाल के सामने चुनाव लड़ने से ही इनकार कर दिया."
 


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