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नया हरियाणा

सोमवार , 17 जून 2019

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क्यों हार हजम नहीं होती राजनीतिक घरानों को ?

हरियाणा की बात करें तो 2019 का लोकसभा चुनाव ऐसे लोगों को सख्त सबक सिखाकर गया है।

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25 मई 2019



प्रदीप डबास, वरिष्ठ पत्रकार

लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में हार और जीत संभव होती है। यहां सत्ता में लाने वाली भी जनता होती है और उखाड़ फेंकने वाली भी जनता, लेकिन नेताओं को ये बात समझने में देर लगती है। ऐसा शायद भारत में ही होता है कि जनता के वोट से चुने जाने वाला शायद खुद को उसी जनता का भगवान समझने लगता है जिसने उसे सिर माथे पर बैठाया। लोग जब किसी के हक में अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं तो उस नेता को समझ लेना चाहिए उससे उम्मीदें कितनी हैं। उस नेता ने जितना पसीना लोगों का भरोसा जीतने में बहाया होगा उससे कहीं ज्यादा अगले पांच साल तक अपने मतदाताओं की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए बहाना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कम ही होता है। जनता उन्हें यदि नकार देती है तो अपनी गिरेबां में झांकने की बजाए ये नेता उल्हाना भी उन्हीं मतदाताओं को देते हैं।

 

आप चाहे कितने भी बड़े राजनीतिक परिवार से हों लोकतंत्र में लोगों के बीच रहना जरूरी है। हरियाणा की बात करें तो 2019 का लोकसभा चुनाव ऐसे लोगों को सख्त सबक सिखाकर गया है। हरियाणा का इतिहास रहा है कि यहां राजनीति घरानों से चलती रही है। यहां नेता बनते कम हैं और लीडरशिप विरासत में ज्यादा मिलती रही है। ये विरासत जब छिनती दिखती है तो दर्द होता है और इस पीड़ा के लिए जिम्मेदार बता दिया जाता है मतदाता को।

इसका एक उदाहरण हिसार में देखने को मिला। पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई उसी हिसार को अपना मानने से मुकर गए जिसने उन्हें संसद तक पहुंचाया था। कुलदीप बिश्नोई उसी हिसार को कहते सुने गए कि ये तो हमारा कभी था ही नहीं जिस हिसार को कभी ये कहां जाता था कि हिसार ने प्रदेश को मुख्यमंत्री दिया। वे कह रहे हैं कि उनके बेटे को वोट न देकर मतदाताओं ने अपना वोट खराब किया है। ये राजनीतिक अपरिपक्वता की निशानी है जो कुलदीप बिश्नोई समय समय पर दिखाते भी रहे हैं।

मतदान हर किसी का व्यक्तिगत अधिकार है। अपना मत किसे देना है ये व्यक्ति खुद तय करता है। यहां जरूरत होती है अपनी कमियों का सुधारने की न कि लोगों को कोसने की। अपना दर्द बयां करते हुए वह अपने पिता के करवाए हुए काम याद दिला रहे थे। यही तो मुख्य बात जो इन नेताओं को समझनी होगी कि विरासत का दामन छोड़कर लोगों की भावनाओं को समझने का काम करें। उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करें।

जब काम किए जाते हैं तो लोग सम्मान भी पूरा देते हैं, लेकिन जब ये समझ लिया जाए कि यह सम्मान उनकी बापौती बन गया है सबक सिखाना जरूरी होता है। आखिर क्यों लोग इन नेताओं के उल्हाने सुने। कैसे कुलदीप बिश्नोई ने बोल दिया कि लोगों ने अपना वोट खराब किया है। ये अपमान है उन मातदाताओं का जिन्होंने अपने अधिकार का प्रयोग किया है।

वैसे हरियाणा कांग्रेस में विरासत की राजनीति की परंपरा लगातार चली आ रही थी। बंसीलाल, भजनलाल, देवीलाल और भूपेंद्र सिंह हुड्डा। ये कुछ ऐसे परिवार समझने जाने लगे थे कि यहां बच्चे का जन्म सांसद और विधायक बनने और बनवाने के लिए होता है। 2019 में ये परंपरा टूटी है। जींद उपचुनाव इसकी पहली नजीर बना। कांग्रेस के दिग्गज रणदीप सिंह सुरजेवाला और चौटाला परिवार की दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों को लोगों ने विधानसभा भेजने से इंकार कर दिया। ये संकेत था कि प्रदेश की जनता के मन में क्या चल रहा है फिर क्यों ये नेता जनता को अपने मुताबिक चलाने की कोशिश करते रहे। किसी इलाके को अपना गढ़ मान लेना भूल कहलाती है और फिर भूल के परिणाम तो हमेशा विपरीत ही होते हैं।

इन राजनीतिक घरानों के लोग सत्ता में बने रहना अपना अधिकार समझ लेते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण क्षेत्रीय दलों के गठन से लिया जा सकता है। हरियाणा निर्माण के अगले वर्ष ही प्रदेश में क्षेत्रीय दल का गठन हो गया था और उस दल के मुखिया सूबे के मुख्यमंत्री भी बने थे। इसे सत्ता हासिल करने की कुंजी भी समझा जाने लगा। देवीलाल ने अपनी राजनीति पार्टी का गठन किया और मुख्यमंत्री भी बने। इसके बाद बंसीलाल जब कांग्रेस में हासिए पर आए तो उन्होंने ने हरियाणा विकास पार्टी बना ली जो उन्हें एक बार फिर से मुख्यमंत्री के पद तक ले गई। भजनलाल 2005 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद घुटन महसूस करने लगे थे क्योंकि उन्हें लगता था कि चौटाला के जाने के बाद मुख्यमंत्री तो वे ही बनेंगे लेकिन यहां कब्जा हो गया रोहतक के एक कांग्रेसी घराने का....तो भजनलाल ने हरियाणा जनहित कांग्रेस बना ली।

 

यहां ये बात भी गौर करने लायक है कि जब खुद के दल भी डूबते दिखे तो चाहे सबसे पहले बनी पार्टी हो या बंसी लाल और भजन के राजनीतिक दल सभी वापस कांग्रेस में विलय हो गए। मतलब यहां लड़ाई विचारधाराओं की नहीं थी बल्कि संघर्ष सत्ता के लिए था। जनता ये सब समझ जाती है। इंडियन नेशनल लोकदल पिछले दिनों टूट गया और एक नई पार्टी जननायक जनता पार्टी के नाम से बनी। अब चौटाला परिवार से प्रदेश में दो पार्टियां हैं और हैरानी की बात ये है कि दोनों ही पार्टियों के मुखिया ये कहते हैं कि वे चौधरी देवीलाल की नीतियों पर चल रहे हैं। सवाल ये है कि अगर नीतियां एक हैं विचारधारा समान है तो फिर अलग होने की नौबत क्यों आई। जनता ये सवाल पूछती है और जवाब नहीं मिलने पर नकार देती है। मतलब ये है कि मतदाता अपना नेता चुनता है जो काम करे, अपने दावों पर खरा उतर सके, अवसरवादिता या विरासत ढोने से यदि मतदाता इंकार करता है उन्हें कोसना दुर्भाग्यपूर्ण है।

 

 


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