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नया हरियाणा

सोमवार , 19 अगस्त 2019

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रोहतक लोकसभा में दीपेंद्र हुड्डा की हार बन रहे हैं समीकरण!

रोहतक लोकसभा में अरविंद शर्मा फिलहाल आगे चल रहे हैं.

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29 अप्रैल 2019



नया हरियाणा

हरियाणा की राजनीति में 2019 के लोकसभा चुनावों में कई राजनीतिक परिवारों जैसे देवीलाल परिवार के दुष्यंत चौटाला, दिग्विजय चौटाला व अर्जुन चौटाला, हुड्डा परिवार में भूपेंद्र सिंह हुड्डा व दीपेंद्र हुड्डा, बंसीलाल परिवार की श्रुति चौधरी, भजनलाल परिवार के भव्य बिश्नोई, बीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेंद्र सिंह, राव परिवार के रावइंद्रजीत सिंह, कैप्टन अजय यादव, कुमारी शैलजा आदि की साख दांव पर लगी हुई है. जिनमें सबसे ज्यादा चर्चित सीटों में सोनीपत, हिसार और रोहतक लोकसभा बनी हुई हैं.

सोनीपत से भूपेंद्र हुड्डा व दिग्विजय चौटाला मैदान में हैं. हिसार से दुष्यंत चौटाला, भव्य बिश्नोई व बृजेंद्र सिंह तीनों राजनीतिक परिवारों की साख दांव पर लगी हुई है. गुरुग्राम से रावइंद्रजीत व कैप्टन अजय यादव मैदान में हैं.  रोहतक से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के बेटे और तीन बार से सांसद दीपेंद्र हुड्डा चुनाव लड़ रहे हैं. बीजेपी ने यहां से पूर्व सांसद अरविंद शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा हुआ है. पिछली तीन बार की तुलना में इस बार का चुनाव दीपेंद्र हुड्डा के लिए सबसे कठिन चुनाव बन गया है, क्योंकि पिछली बार जब वो सांसद बने उस समय उनके पिता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान थे. जबकि इस बार हरियाणा में बीजेपी की सरकार है. कुछ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक दीपेंद्र हुड्डा की जीत मानकर चल रहे हैं. तो कुछ का मानना है कि मुकाबला कांटे का है, कुछ भी कहना मुश्किल है.


व्यापक स्तर पर अगर हरियाणा के लोकसभा चुनाव को देखें तो कांग्रेस के दिग्गज नेता परिवारवाद और व्यक्तिवाद के भरोसे अपनी साख बचाने के लिए जूझते हुए दिख रहे हैं. उन्हें अपनी पार्टी की विचारधारा, नेतृत्व और संगठन तीनों स्तरों पर मात मिल रही है. वहीं भाजपा के नेता अपनी पार्टी की विचारधारा, मोदी के नेतृत्व और संगठन तीनों को ज्यादा भुना रही है और अपने पूर्व सांसदों की कमजोरियों को इन सभी से ढकने का प्रयास कर रही है. हरियाणा में कांग्रेसी नेताओं की आपसी फूट लोकसभा चुनाव में साफ दिख रही हैं. सभी बड़े नेता अपने-अपने मोर्चों पर अपने खास लोगों के दम पर चुनाव लड़ रहे हैं. जबकि बीजेपी में इस तरह की फूट किसी लोकसभा में देखने को नहीं मिल रही है.
लोकसभा चुनाव में नौकरियों में ईमानदारी भी बन रहा है मुद्दा 
हरियाणा के लोकसभा चुनाव में मनोहर सरकार द्वारा ईमानदारी से दी गई नौकरियों की वजह से राज्य सरकार की एक ईमानदार छवि बन रही है, वहीं दूसरी तरफ हुड्डा सरकार पर अपने चहेतों को नौकरी देने के आरोप लग रहे हैं. राजनीति में नैरेटिव( आख्यान) का बड़ा खेल होता है. ये नैरेटिव किसी का भी खेल बनाते भी हैं और बिगाड़ते भी हैं. वर्तमान समय में ये ईमानदार बनाम भ्रष्ट वाला नैरेटिव कांग्रेसी नेताओं और खासकर भूपेंद्र हुड्डा व दीपेंद्र हुड्डा के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है. इसकी आंच हरियाणा की 10 लोकसभा चुनावों पर साफ दिख रही है. राष्ट्रवाद के मामले में मोदी के नेतृत्व को हरियाणा की बहुसंख्यक आबादी वैसे ही स्वीकार कर रही है. केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की मनोहर सरकार के प्रति आमजन का रवैया काफी हद तक सकारात्मक दिख रहा है, नाराजगी अगर कहीं-कहीं है तो वो प्रत्याशी के स्तर पर ज्यादा दिख रही है. 
 कांग्रेसी नेताओं के प्रचार का मुख्य औजार है चौधर 
 भाजपा जहां अपनी विचारधारा और कार्यशैली को अपने प्रचार का अहम् हिस्सा बना रही हैं, वहीं कांग्रेस के नेता अपने चौधर का राग अलाप रहे हैं. जो मूलतः परिवारवाद, क्षेत्रवाद और व्यक्तिवाद का जीता जागता रूप है. मनोहर सरकार ने हरियाणा की राजनीति के केंद्र में नौकरियां को विमर्श का केंद्र बनाया हुआ है, तो कांग्रेसी नेता नेता चौधर के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं. बीजेपी खुद को परिवारवाद, क्षेत्रवाद और व्यक्तिवाद से मुक्त होकर प्रोजेक्ट कर रही है. बीजेपी इस संदेश को जमीन तक पहुंचाने में काफी हद तक सफल होती हुई भी दिख रही हैं. कांग्रेसी नेता चौधर तक सिमटकर रह गए हैं. वर्तमान समय में श्रुति चौधरी भिवानी-महेंद्रगढ़ में यही नारा दे रही हैं कि मैं यहां चौधर वापिस लाऊंगी. दूसरी तरफ भूपेंद्र हुड्डा रोहतक और सोनीपत दोनों लोकसभाओं में यही कह रहे हैं कि चौधर वापिस लानी है. कुलदीप बिश्नोई अपने बेटे भव्य बिश्नोई के माध्यम से चौधर को हिसार में लाने के सपने देख और दिखा रहे हैं. चौधर के रूप में नेता एक तरफ जहां सत्ता सुख के सपने देखते हैं, वहीं उनके कार्यकर्ता व नजदीकी चौधर को अपने काम करवाने व नौकरी लेने के रूप में देखते हैं. व्यापक स्तर पर समूह के मनोवैज्ञान के तौर पर ये एक खास अहसास (फिलिंग) भी देती है. यह अहसास जिसमें जातिवाद और क्षेत्रवाद दोनों  का कॉकटेल बनकर मदहोश करती है.
दंगों की आंच में झुलसते दीपेंद्र हुड्डा
 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुए दंगे भी हुड्डा परिवार का पीछा कर रहे हैं. बीजेपी के नेता बार-बार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में इन दंगों को लाकर भूपेंद्र हुड्डा व दीपेंद्र हुड्डा की मुश्किलें लगातार बढ़ा रहे हैं. दीपेंद्र हुड्डा की एक पुरानी विवादित बयान वाली वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है. ये बयान भी बैक फायर मारता हुआ दिख रहा है. 

दीपेंद्र हुड्डा की हार के बन रहे हैं समीकरण

 


चुनाव प्रबंधन और पार्टी संगठन
चुनाव प्रबंधन और पार्टी संगठन के तौर पर हरियाणा के राजनीतिक दलों का विश्लेषण किया जाए तो साफ नजर आता है कि वर्तमान समय में बीजेपी और जेजेपी दोनों चुनाव प्रबंधन और पार्टी संगठन के मामले में जमीनी स्तर पर खूब मेहनत कर रहे हैं. जबकि कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर के नेतृत्व में संगठन को ठोस ढांचा देने में पूरी तरह विफल रहे हैं. दूसरी तरफ पार्टी के भीतर अलग-अलग खेमे होने के कारण पार्टी लगातार आंतरिक संघर्षों से जूझ रही है. ऐसे में चुनाव प्रबंधन के मामले में भूपेंद्र हुड्डा दूसरे नेताओं से कहीं आगे रहते हैं परंतु पार्टी संगठन के तौर पर वो पूरी पिछड़ते हुए साफ दिखते हैं. दरअसल उन्होंने अपने कार्यकाल में कांग्रेस को पूरी तरह हुड्डामय कर दिया था. जिसका खामियाजा उन्हें और उनके बेटे को इन लोकसभा चुनावों में साफ दिख रहा है. सोशल मीडिया में जिस तरह जींद उपचुनाव के दौरान ये बात सबसे ज्यादा चल रही थी कि रणदीप सुरजेवाला को वहां चुनाव लड़वाकर कांटा निकाला गया था, उसी तरह की चर्चाएं अब भूपेंद्र हुड्डा और दीपेंद्र हुड्डा बाबत चल रही हैं कि रणदीप सुरजेवाला ने एक बार में ही ‘दो कांटे’ निकाल दिए. राजनीति में इस तरह के नैरेटिव आमजन के माइंड में ज्यादा जल्दी प्रवेश करती हैं और राजनीतिक समीकरणों को बनाने और बिगाड़ने में अहम् रोल निभाती हैं.
तमाम विश्लेषणों के आधार पर यही लग रहा है कि परिवारवाद और व्यक्तिवाद के सहारे खड़े नेताओं के लिए वर्तमान लोकसभा चुनाव किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है, तमाम विरूद्ध जाती हुई परिस्थितियों में से अगर वो जीत कर निकलते हैं तो ये जीत उन्हें नए आयाम देंगी.


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