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नया हरियाणा

सोमवार , 18 जून 2018

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सांग शिरोमणि मांगेराम : हरियाणवी संस्कृति की सांस्कृतिक धरोहर

पंडित मांगे राम जी को जन्मदिवस पर समस्त हरियाणावासियों की तरफ से नमन!

Sang Shiromani Mangheram, Cultural Heritage of Haryana Culture, naya haryana, नया हरियाणा

5 अप्रैल 2018

डॉ. नवीन रमण

पंडित मांगे राम जी का हरियाणा के लोक साहित्य में काफी ऊंचा स्थान है। उन्होंने हरियाणा के लोक जीवन को अपनी रागनी और सांगो के द्वारा बहुत कुछ दिया है। पंडित मांगे राम जी का जन्म 5 अप्रैल,1905 में गांव सिसाणा में हुआ था। इनके माता पिता श्री अमर सिंह व धर्मो देवी ने जन्म के कुछ साल बाद उनके नाना उदमी राम को गोद दे दिया था, क्योंकि उनके नाना उदमी राम जी के कोई संतान नहीं थी। इनके पांच भाई व दो बहने थी। इनकी शादी छोटी उम्र में रामेति देवी के साथ 1919 ईo में खरहर गांव में हुई, जिससे एक पुत्र व दो पुत्रियां हुई वह पुत्र 9 माह की आयु में गुजर गया। इस कारण इन की दूसरी शादी केड़ी मदनपुर गांव में पिस्तादेवी के साथ सन 1947 में कर दी गई। उनकी पहली पत्नी की इच्छा व पुत्र की चाहत में दूसरा विवाह संपन्न हुआ और इनकी दूसरी पत्नी से पांच पुत्र और तीन पुत्रियाँ हुई।
पंडित मांगेराम उस जमाने के मुताबिक प्रारंभिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाएं। आपको गाने व बजाने का शौक बचपन से ही था और आप अपने जीवन यापन के लिए खेती बाड़ी पर निर्भर थे। उन्हें घूमने फिरने का बहुत शौक था और इसी शौक के चलते उन्होंने अपना एक निजी वाहन खरीद रखा था जिससे आप हरियाणा व उसके आस पास के राज्यों में भ्रमण करते थे। इसी निजी वाहन के माध्यम से उनकी दोस्ती उस समय के मशहूर सांगी पंडित लख्मीचंद से हुई और इसी दोस्ती के फलस्वरूप पंडित मांगे राम ने पंडित लख्मीचंद को अपना गुरु मान लिया और उनके बेड़े में शामिल हो गए। परंतु पंडित मांगेराम किन्हीं कारणों से अपने गुरु पंडित लख्मीचंद के साथ केवल छह माह साथ रहे। इसके बाद उन्होंने अपना अलग बेड़ा बनाकर सांग करना शुरु कर दिया। उन्होंने हरियाणा में लोक संस्कृति को एक नई राह दिखाई और हमेशा अपनी बनाई हुई रचनाओं को ही रागनी के माध्यम से गाया। इन्हीं रागनियों व रचनाओं के माध्यम से वह आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। अपने शब्दों के माध्यम से उन्होंने हरियाणा के अनेक गांव में स्कूल निर्माण, मंदिर, जोहड़, गौशाला तथा अनेक जनहित के कार्य सांग व रागनियों के माध्यम से पूर्ण करवाएं। जिस कारण उनको आज भी समाज में एक ऊंचा स्थान व आदर के साथ याद किया जाता है।
पंडित जी का परिवार भी राजनीति में अपना खास स्थान रखता था। उनके भाई श्री रामचंद्र शर्मा राज्यसभा सांसद व हरियाणा कांग्रेस के महासचिव रहे। अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए उन्होंने 16 नवंबर, 1967 को गढ़ मुक्तेश्वर के मेले में गंगा जी पर अपना शरीर त्याग दिया था। जिसका संकेत उन्होंने 7 वर्ष पहले ही अपनी रागनियों  के माध्यम से बता दिया था:-

" एक दिन तेरे बीच गंगे मांगेराम आने वाला
मिल ज्यागा तेरे रेत में, कित टोवैगा संसार "।
आपने 42 सांगो की रचना की जो विभिन्न विषयों पर केंद्रित थे। उन्होंने सामाजिक, वीरता से भरपूर देशभक्ति ऐतिहासिक व पौराणिक सांगो की रचनाएं की। इसके साथ-साथ उन्होंने अनेकों फुटकर रागनियों की भी रचना की और उन्हें गाया। लोकगीत एवं सांग संस्कृति हरियाणा की विशेष पहचान है तथा इस संस्कृति को समृद्ध बनाने में लोककवि मांगेराम का भी योगदान रहा है।  सांगी लख्मीचंद के शिष्य मांगेराम ने सांग-कला को आकाश की बुलंदियों तक पहुंचाने में विशेष योगदान दिया है जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।
 


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