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नया हरियाणा

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

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हरियाणा में क्या कांग्रेस के बुरे दिन आ गए हैं?

आखिर हरियाणा में कांग्रेस बैकफूट पर क्यों खेल रही हैं.

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17 अप्रैल 2019



मनोज ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार

कांग्रेस डर क्यों रही है। क्या विरोध करने की हिम्मत नहीं है। किससे डर रही है। क्यों डर रहेे हैं इसके नेता? कुरुक्षेत्र से नवीन जिंदल भाग रहे हैं। करनाल में उम्मीदवार नहीं है। यहीं हाल सोनीपत का है। हो क्या रहा है यह? 
मुझे लगता है कांग्रेस परजीवी पार्टी है। कम से कम मौजूदा हालात में तो यहीं कह सकते हैं। जो सिर्फ सत्ता के लिए हैं। उनकी एक ही कोशिश है। सत्ता। लेकिन अब सत्ता इनके हाथ से खिसक गई। कांग्रेस एक बार सत्ता से बाहर जाती। दूसरी बार आ जाती थी। क्योंकि तब कोई उन्हें इस तरह से काउंटर नहीं करता था। तब कांग्रेस के सामने कोई मजबूत विरोधी नहीं था। भाजपा ने यह कमी पूरी कर दी है। कांग्रेस भाजपा के सामने टिक नहीं पा रही है। एक वक्त था कांग्रेस का टिकट पाने के लिए उम्मीदवार पूरी ताकत लगा दिया करते थे। आज उस कांग्रेस के पास उम्मीदवार नहीं है। कम से कम मौजूदा परिपेक्ष में तो यहीं माना जा रहा है।

क्यों कांग्रेस के बुरे दिन आए

कांग्रेस को बाहर से नहीं अपने नेताओं से खतरा है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दस साल के कार्यकाल मे कांग्रेस रसातल में चली गई। अब इनके नेता पार्टी के लिए नहीं अपने लिए लड़ रहे हैं। जाहिर है फिर यहीं हाल होगा। पार्टी गुटों में बंटी है। इनके नेताओं का जनता के प्रति कम और अपने प्रति ज्यादा जवाबदेही है। अशोक तंवर, कुलदीप बिश्नोई, भूपेंद्र सिंह हुड्डा यहीं तीन चार लोग है जो कांग्रेस के मंच पर खुद को स्थापित करने में लगे हैं। जबकि इनकी जनता के साथ कोई कनेक्टिवटी नहीं है।

आम आदमी की पार्टी नहीं कांग्रेस

आम आदमी कांग्रेस में है ही नहीं। कांग्रेस के साथ जो कार्यकर्ता है, वह किसी विचार के लिए नहीं है। वह इसलिए है कि यदि पार्टी सत्ता में आई तो उनके हिस्से में भी कुछ मलाई आ सकती है। जनता के मुद्​दे न इनके नेता उठाते न कार्यकर्ता। गेहूं में किसानों का दिक्कत है, एक भी कांग्रेसी सामने नहीं आ रहा है। करनाल में आइटीआइ में जो हुआ, एक कांग्रेसी ने एक प्रेस नोट जारी नहीं किया। फसल बीमा योजना में किसानों की जेब कट रही है। कोई बोल नहीं रहा है।

और गुट के नेता को छींक भी लग जाए तो दर्जन भर प्रेस नोट बांट देते हैं कांग्रेसी 
इधर यदि इनके गुट के मुखिया को छींक भी लग जाए तो उसके समर्थक दर्जन भर से ज्यादा प्रेस नोट बांट देंगे। वह चाहे तंवर हो, हुड्डा हो या फिर कुलदीप बिश्नोई। तो ऐसे में साफ है, जब नेता ही कमजोर होगा तो कार्यकर्ता करेगा क्या? वह अपने गुट के नेता की जी हजूरी ही करेगा। कांग्रेस में यहीं हो रहा है। इसलिए कांग्रेस की यह स्थिति है।

मनोज ठाकुर वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं.

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