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जिसकी मुट्ठी मे इंटरनेट उसी के हाथों मे वर्ल्ड एकोनोमी होगी

कैम्ब्रिज एनलिटीका और फेसबुक का गठजोड़ किस तरह डाटा प्रोफाइल करता था उसकी बेसिक अंडरस्टैंडिंग के लिए मेरी ये ढाई साल पुरानी पोस्ट जब नेट न्यूट्रलिटी पर भारत में चर्चा छिड़ी हुई थी

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29 मार्च 2018

शरद श्रीवास्तव

कैम्ब्रिज एनलिटीका और फेसबुक का गठजोड़ किस तरह डाटा प्रोफाइल करता था उसकी बेसिक अंडरस्टैंडिंग के लिए मेरी ये ढाई साल पुरानी पोस्ट जब नेट न्यूट्रलिटी पर भारत में चर्चा छिड़ी हुई थी
फेसबुक और गूगल से पहले माइक्रोसॉफ़्ट सबसे बड़ी कंपनी मानी जाती थी। आपरेटिंग सिस्टम मे विंडोज का मार्केट शेयर सबसे ज्यादा हुआ करता था। और अपनी इस पोजीशन का माइक्रो सॉफ्ट ने बहुत फायदा उठाया। बेहिसाब पैसा था उसके पास। उसने अपने मुक़ाबले किसी और कमर्शियल ऑपरेटिंग सिस्टम को सामने नहीं आने दिया। सिर्फ लिनक्स ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम है जो उसके मुक़ाबले है और फ्री है। एप्पल का शेयर भी काफी कम है।

माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने वेब ब्राउज़र इंटरनेट एक्सप्लोरर को जबर्दस्ती हर पीसी मे डाला। कंपीटिटर वेब ब्राउज़र को खतम करने की हर संभव कोशिश की। म्यूजिक के लिए विंडोज मीडिया प्लेयर को लांच किया और फ्री मीडिया प्लेयर्स को भी मार्केट से हटाने की पूरी कोशिश की।

अमेरिका और यूरोप दोनों जगह माइक्रोसॉफ़्ट पर सरकारों ने मुक़द्दमे किए, उसकी अनफ़ेयर ट्रेड प्रैक्टिस पर रोक लगाई गयी और भारी जुर्माने किए गए।
क्या भारत मे हम फेस बुक पर ऐसे किसी मुक़द्दमे की सोच भी सकते हैं। फेसबुक भारत मे रजिस्टर्ड कंपनी नहीं है। वो न कोई टैक्स देती है उस मुनाफे पर जो उसे भारत मे किए गए विज्ञापन से होता है, न ही उस पर कोई भी मुक़द्दमा किया जा सकता है।

पिछले कुछ दिनों मे फेसबुक ने अपने फ्री बेसिक्स प्लेटफॉर्म के प्रचार के लिए करीब 100 करोड़ रुपए विज्ञापनो पर खर्च किए हैं। आखिर वो इतनी मेहनत और पैसा क्यों फूँक रहा है? फेस बुक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है, उसके इस दान पुण्य पर, फ्री इंटरनेट पर, विज्ञापनो पर, उसके शेयर होल्डर नाराज क्यों नहीं हैं। उसके शेयर के भाव गिर क्यों नहीं रहे?

आखिर फेस बुक को फायदा कैसे होगा। इसी जवाब मे फ्री बेसिक्स के समर्थन और विरोध की गुत्थी छुपी है।

फेस बुक और गूगल जैसी कंपनियों को असली कमाई विज्ञापन से होती है। लेकिन विज्ञापन से कमाई तो अखबारो को भी होती है, टीवी चैनल को भी होती है। फिर फेस बुक और गूगल कैसे अलग हैं?

फेस बुक और गूगल दोनों आपकी हर हरकत को मॉनिटर करते हैं। हम हमेशा फेसबुक या गूगल क्रोम पर अपने आपको लॉगिन रखते हैं ताकि बार बार अपना नाम और पास वर्ड टाइप करने के झंझट से बचे रह सकें। और हम जो भी वेबसाइट विजिट करते हैं, विज्ञापन देखते हैं, आर्टिकल पढ़ते हैं, कुछ भी करते हैं, वो रिकार्ड होता है, हमारा डाटा प्रोफाइल बनता है, लगातार अपडेट होता है। हमारी रुचि , हमारी जरूरत सब रिकार्ड होता है।

कल को कोई कंपनी अपने होटल के प्रचार के लिए फेसबुक के पास पहुंचेगी तो फेसबुक के पास उस होटल के लिए एक्यूरेट डाटा होगा की किन किन लोगों को उसका विज्ञापन दिखाना है। और इसी डाटा की कीमत है।

क्लाउड कम्प्यूटिंग के बाद जो अगला बड़ा नाम आ रहा है वो है बिग डाटा एनालिसिस। करोड़ो लोगों के डाटा को एनालिसिस करके जरूरी इन्फॉर्मेशन निकालना।

केजरीवाल साहब ने दिल्ली मे फ्री वाई फाई देने का वादा किया था। गूगल और माइक्रोसॉफ़्ट करीब 500 रेलवे स्टेशन पर फ्री वाई फाई देने वाले हैं। एयर पोर्ट पर वाई फाई फ्री है। ट्रेनों मे फ्री इंटरनेट देने का इंतजाम भी हो रहा है।
फेसबुक फिर ऐसा कौन सा अनोखा काम करने वाला है जिसके लिए उसे करोड़ो रुपए दान पुण्य करने होंगे। इसी देश मे करोड़ो लोगों तक पहले मोबाइल और अब स्मार्ट फोन पहुंचा। किसी ने ने नहीं कहा की फ्री काल की सुविधा दो। फिर इंटरनेट फ्री करने की मांग क्यों?

क्योंकि जिसकी मुट्ठी मे इंटरनेट उसी के हाथों मे वर्ल्ड एकोनोमी होगी। फ्री बेसिक्स से करोड़ो लोग इंटरनेट से नहीं फेस बुक से जुड़ेंगे। उनका सभी डाटा फेसबुक के पास होगा। कुछ करोड़ खर्च करके, रिलायंस को देकर, फेसबुक उसी डाटा से कंपनियों के विज्ञापन से अरबों कमा रहा होगा। और यही एकमात्र प्रॉफ़िट नहीं है।

अभी हम इंटरनेट पर फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, उबर, ओला, बड़ी और छोटी हजारो कंपनी देखते हैं। और ये कंपनी मोबाइल एप्प के जरिये हमारे फोन मे भी हैं। हजारो ऐसी एप्प और बन रही हैं। फ्री बेसिक्स मे वही एप्प होंगी जो फेसबुक के स्पेक्स के हिसाब से बनी होंगी। चुनिन्दा।

इंटरनेट पर कंपीटीशन की वजह से ये एप्प कीमत कम करती हैं। और जहां कंपीटीशन न हो?

तो फेस बुक ने तो अपने प्रॉफ़िट का जुगाड़ कर लिया है। अमेरिका और यूरोप ने फेसबुक को अपने यहाँ फ्री इंटरनेट का झांसा देने नहीं दिया। बल्कि ऐसी कंपनियों के ऊपर जुर्माना लगाया जो कंपीटीशन को खतम करती थीं। हमारे देश मे ऐसा नहीं होता। यहाँ खुद ही सावधान रहना होता है।

क्या आप सावधान हैं, थे?

मुझे जवाब मालूम है। नहीं हैं, न थे। कुछ साल पहले तमाम न्यूज़ पेपर और टीवी समाचार चैनल बड़े उद्योग पतियों ने खरीद लिए। सभी शांत रहे किसी को क्या फर्क पड़ता है। किसी का क्या गया?

अब सभी टीवी चैनल और अखबार को गाली देते हैं। कोसते हैं, बिकाऊ, भांड कहते हैं।

तैयार रहिए इंटरनेट को भी ऐसे ही नामो से पुकारने के लिए। एक बड़ी कंपनी पर भरोसा करके इंटरनेट उसके हवाले करने को तैयार हैं।

जिनके लिए अपनी स्वतन्त्रता की कीमत नहीं वो गुलाम ही रहते हैं। यूं ही नहीं अंग्रेज़ो ने 200 साल शासन किया हम पर।

साइन कीजिये अपील पर फ्री बेसिक्स ज़िदाबाद कहिए।


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