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नया हरियाणा

गुरूवार, 24 मई 2018

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महिला दिवस विशेष : श्रीमति बिशम्बरी देवी ‘नम्बरदारनी’

महिला दिवस पर पढ़िए एक रियल जिंदगी की जुझारू महिला के संघर्ष की कहानी.

Women's Day special, Shrimati Bishambari Devi 'Nambardani', naya haryana, नया हरियाणा

8 मार्च 2018

डॉ. अजित

सबसे मुश्किल काम होता है खुद के किसी परिजन के विषय में निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक रुप से संतुलित होकर लिखना, मगर मैं खुद की दादी ( जिन्हें सम्बोधन में मैं मां ही कहता हूं) के विषय में लिखते हुए किचिंत भी दुविधा में नही हूं. जिसकी एक बड़ी वजह यह है कि वो मेरे लिए महज़ मेरी दादी (मां) नहीं हैं, बल्कि एक आदर्श मातृछवि भी हैं. इसलिए जीवनपर्यंत संघर्षरत रही ऐसी लौह महिला के विषय में लिखकर मै खुद को न केवल गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं, बल्कि उन पर लिखना अपना एक नैतिक कर्तव्य भी समझता हूं। मेरे मन मे यदि कोई दुविधा है तो केवल इतनी है कि उनके विशद जीवन को एक लेख में समेट पाना तमाम शब्द सामर्थ्य के बावजूद भी बेहद मुश्किल काम है. उनका जीवन स्वतंत्र रूप से एक जीवनी लेखन का विषय है.
गांव के पुरुष प्रधान समाज़ और जन-धन-बल के जीवन में जिस प्रकार से उन्होनें संघर्षपूर्ण जीवन को अपने आत्मबल से जीया है, वह न केवल अनुकरणीय है, बल्कि व्यापक अर्थों में चरम विपरीत परिस्थितियों में ऐसा जीवन जीना अकल्पनीय भी है.
मात्र छब्बीस साल की उम्र में मां विधवा हो गई थी. मेरे बाबा जी का मात्र 28 वर्ष की उम्र में टायफायड बुखार की वजह से आकस्मिक निधन हो गया था. चूंकि बाबा जी अकेले थे और गांव के बड़े ज़मींदार घर में उनके जाने के बाद एकदम से सन्नाटा पसर गया था. लगभग साढे तीन सौ बीघा जमीन और घर पर वारिस के नाम कोई व्यक्ति न बचा था. गांव में कोई कुटम्ब कुनबा भी नहीं था. ऐसें मे बाबा जी के निधन से जो रिक्तता आई थी, उसको भर पाना असम्भव कार्य था. गांव के समाजशास्त्रीय ढांचे में यह स्थिति बेहद जटिल किस्म की थी. इतनी बडी सम्पत्ति की देखरेख के लिए कोई पुरुष परिवार में नहीं था. अमूमन तब यही अनुमान लगाया जा रहा था कि मेरी मां यहां की जमीन को औने-पौने दामों में बेच कर अपने मायके रहने चली जाएगी.

इस बेहद प्रतिकूल और आशाविहीन परिस्थिति में मां के इस निर्णय ने बुझती उम्मीदों को एक नई रोशनी दी. जब उन्होनें तय किया वो कहीं नहीं जाएंगी और यही गांव में रहेंगी. यहां बताता चलूं जिस वक्त बाबा जी का निधन हुआ मेरे पिताजी दादी (मां) के गर्भ में थे. अतिशय चरम तनाव और अनिश्चिता के दौर में भी मां ने महज छब्बीस साल की उम्र में उस साहस का परिचय दिया, जिसकी कल्पना आज भी सम्भव नहीं हो पाती है.
गांव की चौधरी परम्परा में पुरुषविहीन परिवार में इतनी बडी सम्पत्ति खेती-बाड़ी का संरक्षण कोई आसान काम नहीं था. उनका यह निर्णय कुछ पक्षों के लिए नागवार गुजरने जैसा था, क्योंकि अमूमन यह मान लिया गया था कि अब यह परिवार बर्बाद हो गया है. मगर मां ने अपनी हिम्मत, आत्मबल और सूझ-बूझ से एक पुरुष प्रधान समाज में अपने परिवार को वो आधार प्रदान किया. जिसकी वजह से आज भी मां न केवल गांव में बल्कि पूरे क्षेत्र में बेहद सम्मानीय हैं. शायद ही आसपास का कोई गांव ऐसा होगा, जो लम्बरदारनी ( नम्बरदारनी) को न जानता होगा.
पिताजी के जन्म के बाद एक आशा का संचार हुआ कि परिवार में एक पुरुष वारिस पैदा हो गया है, परंतु गांव की कुछ शक्तियों के लिए यह बहुत पाच्य किस्म खबर नहीं थी. पिताजी किशोरावस्था तक जाते-जाते कुसंग का शिकार हो गए ( एक एजेंडे के तहत यह सब किया गया था, फिलहाल वह उल्लेखनीय नहीं है). पिताजी मदिरा व्यसनी हो गए जिसके फलस्वरुप उनकी भूमिका अपना वह आकार न ले सकी. जिस उम्मीद से परिवार उनकी तरफ देख रहा था. कालांतर में उन्होंने उस अवस्था में मदिरा त्यागी जब शरीर व्याधियों की शरण स्थली बन गई थी. मां की प्ररेणा से वो गांव के प्रधान और जिला सहकारी बैंक के डायरेक्टर भी रहें.
मेरी मां ने आजीवन संघर्ष किया. गांव के पितृसत्तात्मक और जनबल के समाज़ के समक्ष वो अकेली वैधानिक लड़ाई लड़ती रही. जिस वक्त घर पुरुषविहीन हो गया था, उन्होनें अपने मायके से कहकर अपना एक भाई स्थाई रुप से गांव में रखा. वो खेती बाड़ी दिखवाते हैं. इन सब के पीछे की ऊर्जा प्ररेणा और सच्चाई की लड़ाई लड़ने वाली मां ही रही हैं.

उनके अन्दर गजब की जीवटता भरी है. नेतृत्व उनके खून में है, इतने प्रतिशोध उन्होनें सहे कि सभी की चर्चा की जाए तो एक बड़ी कथा लिखी जा सकती है. जमीन से जुड़े और अन्य फौजदारी के कई-कई मुकदमें उन्होनें लड़े, क्योंकि उनको इस आशय से परेशान किया जाता था कि उनका मनोबल कमजोर हो जाए और वो गांव से भाग खडी हों. तहसील और जिले स्तर पर अधिकारियों से, नेताओं से, जजों से मिलना उनके जीवन का हिस्सा बन गया था. उनके अन्दर गजब का आत्मविश्वास रहा है, जो आज भी कायम है। गांव में चाहे डीएम आया हो या एसएसपी उनके अन्दर कभी स्त्रियोचित्त संकोच मैने नहीं देखा है.

मेरी मां कक्षा तीन पढी थी उन्हें अक्षर ज्ञान था वो पढ़ भी लेती थी और आज भी हस्ताक्षर ही करती हैं. उनके संस्कार और मूल्य हम तीन भाई और एक बहन के अन्दर स्थाई रुप से बसे हुए हैं. मां ने हमें बताया कि अपने परिश्रम से अर्जित सम्पत्ति का यश भोग ही मनुष्य का नैतिक अधिकार होता है. पैतृक सम्पत्ति के अभिमान में नहीं रहना चाहिए. इसमें हमारी भूमिका मात्र हस्तांतरण भर की होती है. निजी तौर पर मेरे अन्दर सामंतवादी मूल्य नहीं विकसित हुए. इसकी बड़ी वजह मां के दिए संस्कार ही थे. उन्होनें सदैव मानवता, करुणा और शरणागत वत्सल का पाठ पढ़ाया. इतनी बड़ी जमींदारन होने के बावजूद भी वो वंचितों के शोषण के कभी पक्ष में नहीं रही, बल्कि ऐसा कई बार हुआ गांव ने अन्य शक्तिशाली ध्रूवों के द्वारा सताए गए लोगों की उन्होनें अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करके मदद की. वो संकट में पड़े किसी भी व्यक्ति की मदद के लिए सदैव तत्पर रहती थी.

अपने दैनिक जीवन में मां बेहद अनुशासित और आध्यात्मिक चेतना वाली महिला रही हैं. आज भी लगभग ब्यासी साल की उम्र में नित्य पूजा कर्म और यज्ञ करना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है. मां को कभी कमजोर पड़ते मैंने नहीं देखा. अपनी यादाश्त के आधार पर कह सकता हूं कभी उनको शिकायत करते हुए नहीं देखा. ना ही उनके अन्दर स्त्रियोचित्त अधीरता मुझे कभी नजर आई. मां के मन के संकल्प इतने मजबूत किस्म के रहे हैं कि उन्होने जो तय किया वो उन्होंने प्राप्त भी किया है.
मेरे बड़े भाई डॉ. अमित सिंह सर्जन ( एम.एस.) हैं. मै पीएचडी (मनोविज्ञान) हूं और मुझसे छोटा भाई जनक बी टेक है. हम तीनों भाई अपनी मां की वजह से ही उच्च शिक्षित और दीक्षित हो पाए हैं. एक बेहद लापरवाह किस्म के पारिवारिक परिवेश में मेरी मां अपने-अपने पोत्रों के जीवन में मूल्यों और संस्कारों का निवेश किया है और उसी के बल पर हम एक बेहतर इंसान बनने की दिशा में आगे बढ पाएं हैं.

कुछ वर्ष पूर्व पिताजी का लीवर की बीमारी के चलते आकस्मिक निधन हो गया. यह सदमा जरुर मां के लिए अपूर्णीय क्षति है. इकलौते पुत्र के निधन ने उन्हें अन्दर से तोड़ दिया है, मगर आज भी वो हमें हौसला देती रहती हैं. उनका होना भर एक बहुत बड़ी आश्वस्ति है. ये मां के संस्कारों का आत्मबल था कि पिताजी के निधन के उपरांत हम बहुत आत्मश्लाघी होकर न सोच पाए और मैं अपनी स्थापित अकादमिक दुनिया और छोटा भाई अपनी एमएनसी की जॉब छोडकर गांव में खेती बाड़ी के प्रबंधन के लिए चले आए।
सदियों में ऐसी जीवट और जीजिविषा वाली महिला का जन्म होता है. उनका जीवन स्वयं में एक अभिप्ररेणा की किताब है. जिसको पढ़ते हुए जिन्दगी आसान और मुश्किलें कमजोर लगने लगती हैं. ऐसी दिव्य चेतना से मेरा रक्त सम्बंध जुडा हुआ है. यह निश्चित रुप से मेरे प्रारब्ध और पूर्व जन्म के संचित् कर्मों का फल है. मेरे अन्दर संवेदना, सृजन, करुणा आदि कोमल भावों के बीज रोपण में मां की अभूतपूर्व भूमिका रही है. सार्वजनिक जीवन के हिसाब से मां महज़ मेरी दादी नहीं हैं, बल्कि गांव की एक आदर्श महिला हैं. जिसके व्यक्तित्व और कृतित्व से गांव का इतिहास अनेक वर्षो तक प्रकाशित होता रहेगा. निसन्देह उनका होना हमारे लिए एक सामाजिक गौरव का विषय है. उनका व्यक्तित्व सदैव यही पाठ पढ़ाता रहेगा कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हो, मनुष्य को अपने आत्मबल पर भरोसा रखना चाहिए. नीयत नेक हो तो मंजिल अवश्य ही मिलती है.
 

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