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डॉ. अजित : गति और नियति के बीच औसत जीवन के सौंदर्यबोध को उकेरती कविताएं

कवि डॉ. अजित कविताओं के साथ-साथ गद्य लेखन और सिनेमा पर दर्शकीय टिप्पणी लिखते हैं.

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7 मार्च 2018

डॉ. नवीन रमण

डॉ. अजित  गुरुकल कांगड़ी विश्वविद्यालय में एडहॉक हिंदी प्रवक्ता हैं. शामली जनपद के हथछोया में जन्मे अजित स्वभाव से भदेस एवं सोशल मीडिया के दौर में उपजे ब्लॉगर हैं. जो कि अपने पद्य और गद्य दोनों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और आध्यात्मिक व आत्मीय संवादों को अभिव्यक्ति देने में माहिर हैं. कठोर होती यथार्थ की भूमि पर सृजनात्मक कल्पनालोक के जरिए मानवीय ऊष्मा को संप्रेषित करने में अजित को महारत हासिल है. ब्लॉग एवं फेसबुक पर नियमित लेखन के साथ कवि के तौर पर उनका पहला काव्य-संग्रह बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, जिसका नाम है- ‘तुम उदास करते हो कवि!’ https://www.facebook.com/nomadicajeet

अमेजन पर उपलब्ध---https://www.amazon.in/TUM-UDAS-KARTE-KAVI-POETRY/dp/938647087X
यह पहला मौका था, जब मैं किसी कवि के संग्रह को लेकर थोड़ा सचेत हुआ था. वो भी खासकर काव्य संग्रह का नाम पढ़कर- ‘तुम उदास करते हो कवि!’
मैं फेसबुक पर लंबे अर्से से डॉ. अजित की कविताओं को पढ़ता रहा हूं और मुझे उनकी कविताएं हमेशा गाम जीवन शैली की सहजता से भरी हुई प्रतीत होती थी. जहां गंभीरता और जानने का अहम् नहीं बल्कि बड़ी सहजता से संवाद लगातार सक्रिय रहते हैं. जहां विचारधाराओं का आग्रह नहीं था, बल्कि जीता-जागता जीवन है. इन सबके बावजूद मुझे नामकरण को लेकर बड़ी हैरानी हुई. पहला सवाल यह उठा कि क्या सचमुच अजित की कविताएं उदास करती हैं, क्योंकि कवि को तो हम कविताओं से ही जानते हैं, अब कवि व्यक्तिगत जीवन मंर उदास करता है या हंसाता है, उसका संग्रह से तो कोई संबंध सीधे-सीधे नहीं ही बनता, अप्रत्यक्ष तौर पर भले ही कविताओं में कवि का जीवन गुंथा हो.
आखिर अजित की कविताओं में ऐसा क्या है, जो पाठकों को उदास करता होगा? 
पहले पहल मेरा मन उदासी शब्द पर ही अटक गया, मैंने सोचा कवि की कविताओं को इस उदासी वाले एंगल से ही क्यों न समझा जाए, डॉ. अजित जैसे सचेत मनोविश्लेषक बिना कारण के तो ऐसा नामकरण करेंगे नहीं. क्या पता उनकी कविताओं का मूल सूत्र इसी एक शब्द में खुलता हो. क्योंकि अपने जीवन में हम सभी कभी न कभी, किसी न किसी वजह से उदास जरुर हो जाते हैं. कई बार हमारे हालात कुछ ऐसे चल रहे होते हैं कि हम लंबे दिनों तक उदास रहते हैं और फिर अवसाद जिसे आप डिप्रेशन कहते हैं, के शिकार हो जाते हैं. कवि को लेकर पहला खतरा यह उठा कि कहीं कवि उदासी से शुरू करते हुए पाठकों को अवसाद में तो नहीं ले जाएगा. इस उलझन को सुलझाती कवि की पंक्तियां यूं है कि- “तुम तलाश लेती थीं/ उदासी में कविता/ मौन में अनुभूति और दूरी आश्वस्ति.” इस उदासी में कविता का होना यह बताता है कि यहां अवसाद नहीं हो सकता, क्योंकि “कविता तब बचाती है उसका एकांत/ स्मृतियों की मदद से/ वो हंस पड़ता है अकेला/ वो रो पड़ता है भीड़ में.” जहां हंसना और रोना है, वही जीवन है. और जहां जीवन की जीवंतता है, वहां अवसाद के लिए कोई स्थान नहीं रहता है. अवसाद जीवन में पसरता ही तब है जब मनुष्य रोना व हंसना दोनों भूल जाता है.
“मेरा कोई अपना अनुभव अपना नहीं/ प्रेम के बाद कुछ अपना बचता है भला?” कवि यहां पर प्रेम की मानवतावादी दृष्टि को महत्त्व देते है, जो व्यक्तिगत प्रेम व अनुभव से आगे बढ़ते समस्त सृष्टि के प्रेम में एकाकार होने की बात करता है. दूसरी तरफ मनुष्य को उसकी तमाम कमजोरियों, निराशाओं व आशाओं आदि के अंतर्विरोधों के चित्रित करते हुए लिखा है-मैंने जीना चाहा तमाम अभावों और त्रासदियों के बीच/ मैंने पाना चाहा तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद/ मैंने बांट दिया खुद को कतरा-कतरा/ मैंने खो दिया उसको लम्हा-लम्हा/ इस बात पर मुझे पुख्ता यकीं है/ वो साथ है भी और है भी नहीं.”
दरअसल जीवन में अगर उदासी लम्बे समय तक कायम रहती है, तो हम अवसाद के शिकार होते चले जाते हैं. ऐसे हालातों में आपके भीतर क्या होता है? बुनियादी तौर पर, जब चीजें आपकी योजना के अनुसार नहीं होतीं, या लोगों का बर्ताव आपके मनमुताबिक नहीं होते, और साथ ही इन पर आपका कोई वश भी नहीं होता, तब आप उदास होते चले जाते हैं. क्या अजित की कविताएं हमें उदासी से गहरे अवसाद की तरफ लेकर जाती हैं या जीवन के उन छोटे-छोटे पलों के बीच ले जाकर छोड़ देती हैं, जो हमें पल भर के लिए उदास तो करती हैं, परंतु अवसाद में जाने से बचाती भी हैं. बसंत कविता में कवि लिखते हैं- “वैराग्य की देहरी पर/ जब छोड़ता है अनुराग मेरा हाथ/ बिलख कर रो पड़ता हूं मैं/ तुम याद आती हो.” रो पड़ना दरअसल जीवन में बसंत लेकर ही आता है, वह चाहे दुख की घड़ी हो या खुशी के आंसू हो. ठीक इन्हीं क्षणों में कवि कहता है कि- “वैराग्य की पीठ पर बिठा/ फिर छोड़ आता मुझे/ अनुराग की अंधेरी गुफा में.” अनुराग की इन अंधेरी गुफाओं में ही जीवन का रोमांच रचा-बसा हुआ है, यह रोमांच ही जीवन का असली बसंत है.
दूसरी तरफ हम उम्मीद करते हैं कि दुनिया या हमारी किस्मत हमारे सोचने के मुताबिक चले, लेकिन ऐसा नहीं होता. दूसरे शब्दों में कहें तो बात सिर्फ इतनी है कि आप घटित हो रही चीजों के खिलाफ होते हैं, आप उन्हें स्वीकार नहीं कर पाते. डॉ. अजित कई कविताओं में इस फ्लो के साथ बह जाना पसंद करते हैं. इसीलिए कई बार वो नियतिवादी कवि लगते हैं. “मैं घूमता हूं सारे ब्राह्माण्ड में/ नहीं मिलती उतनी मिट्टी/ फिर खड़ा हो जाता हूं निरुपाय/. धरती फिर कहती है/ अच्छा थोड़ी देर खड़े रहो/ नंगे पैर.” ताकि धरती माप सके उसके बोझ में हमारा बोझ कितना है. चलना क्रिया है और ठहरना भी क्रिया है. दोनों क्रियाओं के बीच में कवि अपने जीवन दर्शन को कविताओं में उकेरता है.
 दरअसल अजित की कविताएं न तो किसी मान्यता के खिलाफ हैं, न किसी इंसान के खिलाफ हैं, न किसी विचारधारा के पैरवीकार हैं और न किसी विचारधारा के विरोधी. कवि का इन सभी सिद्धांतों और तथाकथित विचारधारओं में मन नहीं रमता. कवि अजित का कवि-मन जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं और संवादों के बीच दर्शन और मनोविश्लेषण में अलख जोगी की तरह रमता है. ये बाहर से भीतर की यात्रा उनके कवि हृदय की सबसे बड़ी खासियत है, जो उन्हें किसी के साथ होते हुए भी अकेले में भीतर की यात्रा में विचरण करने में बाधा नहीं डालती. इन भीतर की यात्राओं से जब उनका मन उबने लगता है, तब उनका मन प्रकृति की गोद में यात्राओं के लिए मचलने लगता है. आमजन के नजरिए से  उनका व्यवहार सामाजिक भले ही न लगता हो, कवि और लेखक के तौर पर उनकी सबसे बड़ी ताकत ये भीतर और बाहर की यात्राएं ही हैं. जो उन्हें लेखक और कवि के तौर पर विशिष्ट बनाती हैं. इसकी झलक अजित के लिखे शब्दों और वाक्यों के माध्यम से भी आप महसूस कर सकते हैं. जहां कवि पति को देव कहने से बचने हिदायत पत्नी को देते हैं, पति को देव बनाना छल को निमंत्रित करना है, आत्मगौरव को देवत्व के समक्ष बंधक बनाना है और भी एक पुरुष या कवि के तौर पर नहीं, बल्कि “बतौर मां यही आखिरी सलाह है मेरी.”-
हो सके तो संबोधनों के षडयंत्रों से बचना/पति को देव कहने से बचना/ देव आदर्श भरी कल्पना है/ मिथकों से घिरी एक अपवंचना है/ मनुष्य जब देवता बताया जाता है/ फिर वो कर देता है इनकार/मनुष्य को मनुष्य मानने से /समझने लगता है खुद को चमत्कारी/ प्रेम की चासनी  में लिपटे/ बहुत से चमत्कार तुम समझ न पाओगी.”
अजित की कविताओं का बाहरी फ्लेवर बहुत मामूली-सा प्रतीत होता हुआ भी आम पाठक के मानसिक स्तर और उसके जीवन के छोटे-छोटे क्षणों  को पकड़ने के कारण गुदगुदाने लगता है, यह “इतना मामूली है कि दुखी हो सकता था सब्जी वाले के दो रुपए कम न करने पर, खुश हो सकता है फटी जुराब होने के बावजूद किसी को नजर न आने पर. दरअसल मैंने खुद को जानबूझकर मामूली नहीं बनाया, मैं बनता चला गया.” कवि की स्वीकारोक्ति जितनी सहज है, उतनी उनकी कविताओं में सहजता है.
जहां गंभीरता, दर्शन, मनोविश्लेषण और सहजता सभी एक साथ चलती हुई प्रतीत होंगी. वह पाठक पर निर्भर करता है कि वह खुद को किस वजह से इनसे खुद को कनेक्ट करता है. इसीलिए भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति के पाठक आसानी से आपके लेखन के साथ जुड़ते चले जाते हैं और लेखन में मिलने वाले अपनेपन के कारण वो कवि के नजदीक जाने की कोशिश करते हैं. जो कि कवि की नेचर से मेल नहीं खाता. इसी कारण कुछ पाठकों को कवि में अहंकार की बू आ सकती है. पाठकों को यह बात समझनी चाहिए कि आपको रचना से प्यार करने का हक है और आपका हक रचना पर हो सकता है, परंतु रचनाकार पर नहीं.
इस “मामूली होने ने जीना जहां थोड़ा आसान किया/ और मरना थोड़ा मुश्किल/ मामूलीपन की यही वो खास बात है/ जिसे मेरा कोई खास जान नहीं पाया/ आज तक.”
गांव का जीवन शहरी जीवन की तुलना में थोड़ी कम रफ्तार के साथ चलता है. कवि इस कम रफ्तार को शहरी जीवन और कविताओं दोनों में बचाकर रखने के लिए निरंतर प्रयासरत दिखते हैं. सोशल मीडिया के दौर में हालांकि गांव और शहर दोनों के जीवन की रफ्तार में अचानक से जो तीव्रता आई है, भागदौड़ भरे जीवन में भौतिक लालसाओं व उपभोगतावादी प्रवृत्ति में जो इजाफा हुआ है, उससे उलट कवि हमें ठहरने पर मजबूर करते हैं और सवालों व अस्तित्व को लेकर थोड़ा गंभीरता से विचार करने पर मजबूर करते हैं-“प्रश्नों के शोर में/ दुबक जाती हैं हमारे अस्तित्व की/ निश्चल अनुभूतियां/ बेजा बहस में खत्म होती जाती है ऊर्जा.” दरअसल कवि गति और नियति के बीच फर्क को पकड़ते हे लिखते हैं-एक दिन उसने/ फोन किया और कहा/ गति और नियति में फर्क बताओ/ उस दिन भीड़ में था कहीं/ ठीक से सुन नहीं पाया उसकी आवाज/ जवाब की भूमिका बना ही रहा था कि/ हेलो हेलो कहकर कट गया फोन/ उसके बाद उसका फोन नहीं/ एसएमएस आया तुरंत/ शुक्रिया मिल गया जवाब/ ये उसकी त्वरा नहीं,/ समय का षडयंत्र था/ जिसने स्वतः प्रेषित किए मेरे वो जवाब/ जो मैंने कभी दिए ही नहीं.” आम जीवन की गति और नियति को पकड़ने की यह सूक्ष्म दृष्टि एक कवि के पास ही हो सकती है. जिसमें अजित निपुण हैं.
जीवन में आप किसी खास हालात के खिलाफ हों, या फिर आप जीवन के ही खिलाफ हों, ऐसे में अवसाद उसी हिसाब से गहरे से गहरा होता जाता है. परंतु कवि अजित हमें अवसाद की तरफ नहीं लेकर जाते बल्कि जीवन के खट्टे-मीठे, कड़वे अनुभवों की तरफ लेकर जाते हैं. जो जीवन में एक सबक या टीस की तरह जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. कवि इन व्यक्तिगत अनुभवों को कविता की शक्ल में रखककर हम सभी के अनुभवों से एकाकार करके उन्हें सामूहिक रूप दे देते हैं. इसीलिए इनकी कविताओं में पाठकों को अपने जीवन के छोटे-छोटे क्षण और घटनाएं चलायमान रूप में मिलती है, जिनसे कनैक्ट करके पाठक आत्मविभोर होकर कवि से एकाकार हो जाता है. कवि अपनी कविताओं के माध्यम से हम सब के कवि बन जाते हैं.
 न खिलाफत और न मुखालत
कवि अजित की कविताओं का स्वर न खिलाफत का है और न मुखालत का है. दरअसल इन दोनों तरह के रास्तों से अलग प्रेम और जीवन की औसत परिघटनाओं के सूक्ष्म रेशे उकेरने वाले कवि हैं. आखिर आप किसी चीज के खिलाफ क्यों होते हैं? आप खिलाफ सिर्फ इसलिए होते हैं, क्योंकि चीजें आपकी उम्मीद के हिसाब से नहीं हुईं। आखिर पूरी दुनिया को आपके हिसाब से क्यों चलना चाहिए? इन्हीं वजहों से आप अवसाद से घिर जाते हैं। अवसाद आपको चिड़चिड़ा और गंभीर रूप से आत्मघाती बनाता है। आमतौर पर अवसाद से घिरे लोग किसी दूसरे को नहीं मारते, बल्कि वे खुद को ही अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। मारने का मतलब हमेशा सिर्फ शारीरिक रूप से मारना या नुकसान पहुंचाना ही नहीं होता। अवसाद एक तरह का हथियार है, लेकिन यह ऐसा हथियार नहीं है, जो बाहर निकलकर किसी को भी काट डाले। यह तो खुद के ही टुकड़े कर डालेगा और आपका जीवन दुखी बना देगा। अवसाद से घिरे लोग ऐसा ही करते हैं।
कवि का सौंदर्यबोध
जीवन को उसकी सहजता में विश्लेषित करते हुए कवि अजित का सौंदर्यबोध कविताओं में मुखरता से उद्घाटित होता है. “दुनिया की कृत्रिमता छिप भी जाए/ खुद पर सवाल खड़े करने वाले नहीं छिप पाते.” कवि जीवन बोध और यथार्थबोध के बीच व्यक्ति के अस्तित्वबोध के सौंदर्यबोध को विकसित करते हुए लिखते हैं- “अपनी इयत्ता में सिमटा हर शख्स खतरा है/ सभ्य समाज के लिए/ क्योंकि वो नहीं जानता विशुद्ध साइंटिफिक केलकुलेशन/ वो होता है लगभग अनपढ़/ रिश्तों का उपयोग करने के कौशल में/ वो जोड़ लेता दशमलव के बाद का भी शून्य/ अपनत्व के भ्रम में/ ...अपनी इयत्ता में सिमटे शख्स का डर/ होता है बेहद विचित्र/ वो डर जाता है एक आत्मीय हंसी से/ एक निजी सवाल से/ और जब वो डरता है/ तब दिखता है ठीक उनके जैसा/ जिनकी खुद से बिल्कुल मुलाकातें नहीं.” हिंदी साहित्य में इस व्यष्टि बोध और समष्टि बोध को लेकर खूब बहसें हुई हैं. खासकर नई कविता आंदोलन के दौर में. जिसमें अज्ञेय और मुक्तिबोध को औजार बनाकर अपने-अपने मोर्चों से लड़ाई लड़ी गई. जिसका फलसफा कवि के शब्दों में इतना भर है कि- “और रात में लिखते हैं न होने वाली क्रांतियों के पाठ/ जिन्हें पढ़कर एक जवान पीढ़ी हो जाती है तुरंत बूढ़ी.” दरअसल इन “दोनों थकानों में थकता है/ एक मनुष्य/ जिसे बाद में कहा जाता है/ एक औसत मनुष्य.” कवि अजित इस औसत मनुष्य की संवेदनाओं और मर्म को कविताओं में उकेरने वाले कवि हैं. यह औसत मनुष्य राजनीतिक तौर पर किए गए सामाजिक-सांस्कृतिक एवं खगोलीय बंटवारों इसे इत्तर एक औसत मनुष्य है. जिसके कारण आलोचकों की खुराक बनने से बच जाते हैं कवि अजित. यह बच जाना है जीवन का बच जाना है, तमाम षडयंत्रों से. क्योंकि वो कविता से क्रांति नहीं करना चाहते, बल्कि औसत मनुष्य के बीच ले जाना चाहते हैं कविता को. ताकि कविता में बचा रहे औसत मनुष्य.
औसत मनुष्य और कवि “कविताओं से सीखता रहा हूं प्रेम को इस तरह पेश करना जैसे अर्थ से बड़ी दरिद्रता प्रेम की दरिद्रता है.” कवि बात करते हैं उन दिनों की “जब मनुष्य का मनुष्य पर बचा हुआ था भरोसा.” आज के दौर में सबसे ज्यादा कोई चीज दरक गई है तो वो है भरोसा. क्योंकि विज्ञापन के दौर में विज्ञापित होने लगे हैं संबंध एवं भरोसे. इस भरोसे को जीवंत बनाता है संवाद या बातचीत. इसीलिए कवि कहते हैं कि- बातों का बच जाना मनुष्य के बच जाने से कम खतरनाक नहीं है.
जारी...
 




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