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नया हरियाणा

रविवार, 16 जून 2019

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पढ़िए 'गली ब्वाय' फिल्म की समीक्षा

बहुत दिन बाद ऐसा कुछ देखा जो झकझोर नहीं रहा लेकिन बहुत कुछ कह रहा था

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21 फ़रवरी 2019



नया हरियाणा

बहुत दिन बाद ऐसा कुछ देखा जो झकझोर नहीं रहा लेकिन बहुत कुछ कह रहा था बता रहा था लेकिन समझाने की कोशिश नहीं कर रहा है, जिसमें समझने का शऊर है वो समझ लेगा.   हम मुराद की ज़िंदगी में उतर जाते हैं. कोई एक आर्टवर्क में कितनी जगह इशारा कर सकता है इसका एक छोटा नमूना है "गली बॉय". 

फ़िल्म धारावी 17 से उठती है और एक ही दुनिया में मौजूद कई दुनिया दिखाती है. 
सबसे पहले बात इसमें जिस की होनी चाहिए वो सिद्धार्थ चतुर्वेदी का किरदार श्रीकांत उर्फ़ 'शेर' हैं, जो मुराद की तरह ही अपनी ज़िंदगी के संघर्षों में उलझा हुआ है, पर उस में आत्मविश्वास है, अपनी क्रियेटिविटी है. वो हर तरह से मुराद का मेंटॉर होने लायक है. वो एक ही समय पर दोस्त है, प्रेरणा है, मेंटॉर है और फिर मुराद के टक्कर में उसका प्रतियोगी है. उसके किरदार को कहीं से भी रणवीर के किरदार 'मुराद' के बरक्स छोटा नहीं दिखाया गया, बल्कि बहुत ज़रूरी दिखाया है. उन दोनों के सम्बंध में खेलभावना को जीवन दिया गया है.

फ़िल्म में क्लास डिविज़न के आम लेकिन कम इस्तेमाल हुए कई सिनेरीयो मिलेंगे.

रणवीर 'मुराद' का जीवन उतना कठिन है जितना उसकी कोली में सपने भी न आ पाने लायक जगह. आलिया 'सफ़ीना' एक मध्यम परिवार की लड़की जो mbbs कर रही है. दोनों बचपन से प्रेम में हैं. मुराद के पिता जहाँ ड्राइवर वहीं सफ़ीना के पिता डॉक्टर. ग़रीबी और निम्न मध्यमवर्ग के बीच में कहीं अटका मुराद और रेगुलर मध्यमवर्ग की सफ़ीना के बीच में ये बड़ी मुश्किल है. 

जहाँ मुराद की माँ की शादी एक झोपड़पट्टी वाले ड्राइवर से होना वहीं उनके भाई यानी मुराद के मामा का घर-बार उच्चमध्यम वर्ग का होना. दो भाई बहनों के बीच असमानता. 

मुराद के पिता दूसरी शादी कर लाते हैं, पहली पत्नी रज़िया का उसी घर में रहते हुए असहाय हो जाना, रज़िया के भाई का कोई भी सहायता करने से मना कर देना. रज़िया की सास अपने बेटे से ख़फ़ा है दूसरी शादी के कारण लेकिन उन्हें इसमें ग़लत भी कुछ नहीं लगता. ये बहुत कुछ बयान करता है, ज़मीनी सच्चाई, मज़हब के अपने अनुकूल और पुनर्पाठ. एक बड़ा चुप सा मैसेज भी है, मुराद के पिता की दूसरी शादी उनकी ग़ुरबत का भी नतीजा है क्यूँकि ये दूसरी बीवी उसी घर में मेड की नौकरी करती है जहाँ वो ड्राइवर है. उस आदमी को एक फ़ायनैन्शल हेल्पिंग हैंड चाहिए इसलिए वो व्यवस्था में लूप होल का फ़ायदा ले दूसरी शादी करता है. वहीं वो एक जवान बीवी और अपने बेटे के बीच किसी सम्बंध कि पनपने की आशंका से भरा है. 

ग़रीब घर में बच्चों को एक इन्वेस्टमेंट की तरह भी देखना, बार बार पैसे ख़र्च होने के ताने देना. ऐसा नहीं है कि पिता अपने बच्चे को प्रेम नहीं करता, लेकिन वो डरा हुआ है अपने हालातों से, अपने सच उसे सपने देखने की इजाज़त नहीं देने देते बेटे को. 
मुराद प्रतिभावान है लेकिन राईटर ने उसके किरदार को स्मार्ट नहीं दिखाया है, वो बाप के सामने ज़ुबान नहीं खोल पाता है, हिचकता है गाने में, वो लिखता है गाना लेकिन हिम्मत नहीं है भीड़ का सामना करने की, वो अपनी प्रेमिका को प्रेम करता है लेकिन कल्कि के लिए आकर्षित होता है. फ़िल्म में वो रेगुलर हीरो नहीं है बल्कि 'प्रटैगनिस्ट' है, जो हमें कई लोगों से मिलवा रहा है. उसकी प्रेरणाएँ उसके जीवन की हैं, वो कहीं से भी गाने लिखता है अपने मालिक की बेटी को रोते देख जो उसे भाव निकलते हैं उन्हें भी गाने में डालता है, जो एकबारगी को किसी प्रेमिका के लिए लिखे जान पड़ेंगे. ये शो कर rha है कि आर्टिस्ट की प्रेरणाएँ हर तरफ़ हैं, मुक्त हैं. 

सफ़ीना डॉक्टर बनने जा रही है. उसके घर में उसे 'छूट' है, उसकी ग़लतियाँ माफ़ की जाती हैं, उसे लाड़ दिया जाता है, उसके पास आइफ़ोन/आइपैड है लेकिन उसे हिजाब से आज़ादी नहीं है, उसे लिपस्टिक लगाने की छूट नहीं है, दोस्तों के साथ घूमने जाने की आज़ादी नहीं है. वो झूठ बोलती है, माँ से मार खाती है, उसकी पढ़ाई बंद करने की धमकी है और भी बहुत कुछ. हमारे आसपास भी तो यही है न ! सफ़ीना हमें एक तरफ़ हिम्मत देती है तो दूसरी तरफ़ संकीर्ण दायरे हैं जिनमें वो जी रही है. 

एक मोईन भी है जो चोर है, मैकेनिक है, सस्ता नशा बेचता है, बच्चों को लिप्त रखता है लेकिन वही मोईन जीवन कई तलों पर जीता है. उसका किरदार हज़ार बातें कहता है जिस पर एक अलग बात कही जा सकती है. मुराद और मोईन दोनों ये बताते हैं कि एक ही जगह से निकले दो लोग कितने अलग हो सकते हैं. 

एक ख़ास बात ये है कि फ़िल्म में शराब को नकारा गया है, हमारा हीरो आगे बढ़ रहा है, सिगरेट पीता है है लेकिन शराब नहीं पीता, नमाज़ पढ़ता है, कभी सुरमा भी लगाता है. ये हमारी कंडिशनिंग की बारिकियाँ दिखा रहा है.

फ़िल्म के गाने नहीं व्यंग्य हैं.

ये फ़िल्म मुझे कुछ दिन तक नशे में रखेगी.


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