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शनिवार, 20 अप्रैल 2019

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गुड़गांव लोकसभा सीट से राव इंद्रजीत सिंह की 'बादशाहत' रहेगी बरकरार!

2014 के लोकसभा चुनाव में गुड़गांव लोकसभा सीट से राव इंद्रजीत ने जीत दर्ज की थी

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21 फ़रवरी 2019



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2014 के लोकसभा चुनाव में गुड़गांव लोकसभा सीट से राव इंद्रजीत ने जीत दर्ज की थी और 2019 में जिस तरह के गुणागणित हरियाणा की राजनीति के बने हुए हैं। उनसे साफ संकेत हैं कि हरियाणा की 10 लोकसभा सीटों पर भाजपा की जीत लगभग तय लग रही हैं। जिनमें गुड़गांव की लोकसभा सीट पर राव इंद्रजीत की बादशाहत बरकरार दिख रही है।

गुड़गांव लोकसभा सीट का गठन साल 2008 के परिसीमन में हुआ. इससे पहले दक्षिण हरियाणा में महेंद्रगढ़ लोकसभा सीट होती थी, जिसे खत्म कर आधे हिस्से को भिवानी-महेंद्रगढ़ में मिलाकर गुड़गांव व रेवाड़ी जिलों में मेवात जिले को मिलाकर गुड़गांव नाम से ही एक नयी लोकसभा सीट बना दी. गुड़गांव लोकसभा सीट में गुड़गांव जिले की सभी चार, मेवात की सभी तीन और रेवाड़ी की दो विधानसभा सीटें आती हैं. यह सीट अहीर बहुल है और पुरानी महेंद्रगढ़ सीट और नई गुड़गांव सीट पर 1977 (मनोहर लाल सैनी भारतीय लोकदल) को छोड़कर हर बार अहीर जाति से ही सांसद बने हैं. महेंद्रगढ़ सीट से तो राव बीरेंद्र सिंह, कर्नल राम सिंह और राव इंद्रजीत जैसे बड़े अहीर नेता सांसद बने. गुडगांव सीट बनने के बाद हुए दोनों चुनाव में राव इंद्रजीत ही चुनाव जीते हैं. 1971 तक पहले भी गुडगांव नाम से लोकसभा सीट होती थी, जिस पर अब्दुल गनी और तैयब हुसैन समेत मेव और अहीर नेता गजराज सिंह सांसद बने थे. 1971 के बाद गुड़गांव लोकसभा सीट खत्म कर फरीदाबाद नाम से लोकसभा सीट बना दी गई थी. गुड़गांव सीट दोबारा 2008 परिसीमन से बनाई गई.

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2014 लोकसभा चुनाव के लिए गुड़गांव से भाजपा ने एक पुराने कांग्रेसी नेता को टिकट थमा दी. लगातार दो बार से सांसद बनते आ रहे राव इंदरजीत मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मनमुटाव के चलते कांग्रेस पार्टी छोड़कर भाजपा में आ गए थे. भाजपा ने भी उन्हें आते ही उनकी मनपसंद गुड़गांव की लोकसभा सीट थमा दी और राव इंद्रजीत अपना पांचवा लोक सभा चुनाव लड़ने के लिए कमल के निशान पर मैदान में उतरे. इंद्रजीत पहली बार 1998 में महेंद्रगढ़ सीट से भाजपा के कर्नल राम सिंह को हराकर सांसद बने थे. कर्नल राम सिंह भी महेंद्रगढ़ क्षेत्र के बड़े नेता थे. जिन्होंने राव बीरेंद्र सिंह को दो बार लोकसभा चुनाव में हराया था. राव इंद्रजीत 1998 में जीते तो 1999 में भाजपा के डॉ. सुधा यादव से हार गए. इसके बाद उन्होंने 2004 का चुनाव महेंद्रगढ़ और 2009 का चुनाव गुड़गांव सीट से जीता. राव इंद्रजीत 2004 की यूपीए सरकार में रक्षा उत्पादन राज्य मंत्री बने थे. 2009 में उन्हें कोई मंत्री पद नहीं मिला और उनकी कांग्रेसी दूरी का यह बड़ा कारण बना. 2014 चुनाव के समय इस लोकसभा क्षेत्र में भाजपा का एक विधायक नहीं था और राव इंद्रजीत के भाजपा में आने और चुनाव जीतने का असर यह हुआ कि अक्टूबर 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गुड़गांव लोकसभा के तहत आने वाली 9 में से 6 सीटों पर अपने विधायक बनाएं. लोकसभा चुनाव में राव इंद्रजीत को बावल, रेवाड़ी, पटौदी, बादशाहपुर, गुड़गांव और सोहना सीटों पर एक तरफा वोट पड़े और जबरदस्त बढ़त मिली. बादशाहपुर और गुड़गांव में उनकी बढ़त 1-1 लाख वोटों से ज्यादा की थी. दूसरी तरफ मेवात जिले की नूंह, फिरोजपुर, झिरका और पुहाना सीटों पर इंद्रजीत को बेहद कम वोट मिले. फिरोजपुर,झिरका और पुहाना सीटों पर तो वे तीसरे नंबर पर रहे. आखिरकार राव इंद्रजीत को इस चुनाव में 48.82% वोट मिले. जबकि 2009 में उन्हें कांग्रेस की टिकट पर यहां 36.83% वोट मिले थे. उस चुनाव में गुड़गांव सीट पर भाजपा के उम्मीदवार सुधा यादव को 16.64% वोट मिले थे. भाजपा की टिकट पर राव इंद्रजीत की एकतरफा जीत के साथ ही पूरे अहीरवाल में भारतीय जनता पार्टी स्थापित हो गई. कुछ महीने बाद इस जीत ने प्रदेश में पहली बार भाजपा सरकार बनाने में मदद की.
गुड़गांव लोकसभा सीट पर 2014 में इनेलो के उम्मीदवार जाकिर हुसैन थे. जो कुछ समय पहले ही बहुजन समाज पार्टी छोड़कर इनेलो में आए थे. जाकिर हुसैन ने 2009 में गुड़गांव लोक सभा से बसपा की टिकट पर चुनाव लड़ा था और 25.61% वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे थे. मेवात क्षेत्र के बड़े राजनीतिक परिवार से संबंध रखने वाले जाकिर हुसैन के दादा मोहम्मद यासीन खान आजादी से पहले और बाद में संयुक्त पंजाब में कई बार विधायक रहे. इसके बाद उनके बेटे और जाकिर हुसैन के पिता तैयब हुसैन 1962 में फिरोजपुर झिरका से और 1984 (उपचुनाव), 1987 और 
1988 (उपचुनाव) में लगातार तीन चुनाव तावडू से जीते. तय्यब हुसैन की सक्रियता राजस्थान में भी रही और वहां भी कामा विधानसभा सीट से दो बार चुनाव जीतकर मंत्री रहे. इस तरह वे 3 राज्यों संयुक्त पंजाब, हरियाणा, राजस्थान की सरकारों में मंत्री रहे. तय्यब हुसैन 1971 में गुड़गांव और 1980 में फरीदाबाद संसदीय सीट से जीत कर लोकसभा पहुंचे. जाकिर हुसैन की बहन जाहिदा बेगम भी राजस्थान की राजनीति में सक्रिय हैं और सरकार से संसदीय सचिव बन चुके हैं. खुद जाकिर हुसैन 1990 से चुनावी राजनीति में सक्रिय हैं. वे 1991 में आजाद और 2000 में कांग्रेस की टिकट पर तावडू  से चुनाव जीते. इसी सीट पर 1996 और 2005 में कांग्रेस की टिकट पर वह चुनाव हारे भी ताबू सीट खत्म हो जाने के बाद 2009 में जाकिर हुसैन है सुहाना सीट से बसपा का विधानसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस के धर्मवीर से 505 वोटों से हार गए 2014 आते-आते में इनेलो में आ गए और गुड़गांव लोकसभा चुनाव लड़ते हुए उन्होंने 28.2% वोट लिए. पिछले चुनाव में बसपा की टिकट पर जाकिर को यहां 25.62% वोट मिले थे. लोकसभा चुनाव के समय इस लोकसभा क्षेत्र में इनेलो के पास पटौदी, फिरोजपुर, झिरका, पुहाना और बावल में विधायक थे. जिनमें से अक्टूबर 2014 के चुनाव में पार्टी सिर्फ फिरोजपुर, झिरका सीट ही बचा पाई. इसके अलावा इनेलो की टिकट पर नूंह विधानसभा सीट से जाकिर हुसैन भी जीतेऔर लोकसभा चुनाव हार गए. जाकिर हुसैन को मेवात जिले की तीनों सीटों में फिरोजपुर, झिरका और पुहाना में जबरदस्त समर्थन और बढ़त मिली. आलम यह था कि फिरोजपुर, झिरका में तो वे विजेता राव इंद्रजीत से करीब 75000 वोट से आगे थे. इसी तरह पुहाना में उन्हें 69 हजार और नूंह में 48 हजार की बढ़त मिली. सोहना सीट से भी जाकिर को लगभग 47 हजार वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे. वहीं दूसरी ओर गुड़गांव, रेवाड़ी, पटौदी, बादशाहपुर और बावल सीटों पर उन्हें कम वोट मिले. कुल मिलाकर जाकिर हुसैन को इन पाँचों सीटों पर करीब 80 हजार वोट मिले जबकि इन सीटों पर राव इंद्रजीत के वोट सवा चार लाख से ज्यादा थे. 2009 में इनेलो ने यह सीट गठबंधन के तहत भाजपा के लिए छोड़ी और सुधा यादव भाजपा-इनेलो की सांझी उम्मीदवार बनी.
गुड़गांव लोकसभा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार राम धर्मपाल थे. जिनका यह पहला लोकसभा चुनाव था. राव इंद्रजीत के पार्टी छोड़ जाने के बाद यहां मजबूत उम्मीदवार देना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन गया था. राम धर्मपाल लोकसभा के लिए नए जरूर थे. लेकिन विधानसभा के 6 चुनाव लड़ चुके थे. वे तीन बार सोहना (1987,1991 और 2000) से और एक बार बादशाहपुर 2009 से विधायक रह चुके थे. राव इंद्रजीत और जाकिर हुसैन के आगे चुनाव लड़ना राम धर्मपाल के लिए वाकई टेढ़ी खीर साबित हुआ और वे जमानत भी नहीं बचा पाए. धर्मपाल को सिर्फ 10.12% वोट मिले. जबकि इस सीट पर पिछले चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार राव इंद्रजीत को 36.83% वोट मिले थे.
चुनाव के समय इस लोकसभा क्षेत्र में रेवाड़ी, बादशाहपु, गुड़गांव, सोहना और नूंह में कांग्रेसी या समर्थक विधायक थे जबकि इसके बाद अक्टूबर 2014 में हुए चुनाव में पार्टी को यहां एक भी सीट नहीं मिली. विधानसभा चुनाव के संदर्भ में कांग्रेस पार्टी के लिए यह सबसे ज्यादा नुकसान वाला क्षेत्र साबित हुआ. जहां पार्टी 5 की संख्या से शून्य पर आ गई. इसका प्रमुख कारण राव इंद्रजीत का पार्टी बदलना था.
गुडगांव लोकसभा सीट पर एक और चर्चित उम्मीदवार थे-आम आदमी पार्टी के योगेंद्र यादव. अरविंद केजरीवाल के अहम सहयोगी रहे और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव गुड़गांव सीट पर चुनाव लड़ने उतरे तो यह काफी चर्चा का विषय बना. उम्मीद थी कि गुड़गांव और आसपास के शहरी इलाकों में उन्हें राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर अच्छा समर्थन मिलेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अरविंद केजरीवाल और ज्यादातर पार्टी कार्यकर्ताओं की वाराणसी और उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में व्यस्तता के कारण योगेंद्र यादव यहां अकेले पड़ गए और पार्टी के पक्ष का माहौल भी नहीं बन पाया. योगेंद्र यादव को बमुश्किल 6.2% वोट मिले और वह चौथे स्थान पर रहे. यादव को बादशाहपुर और गुड़गांव सीटों पर 20-20 हजार से ज्यादा वोट मिले लेकिन बाकी जगहों पर वोट बहुत कम थे. गुड़गांव सीट पर तो वे दूसरे स्थान पर रहे. उधर मेवात में तो योगेंद्र यादव को ना के बराबर वोट मिले और पूरे जिले की 3 सीटों पर वे कुल 6000 वोट भी नहीं ले पाए.
गुडगांव लोकसभा सीट पर तमाम अन्य महत्वपूर्ण बातों के अलावा मेव बहुल मेवात और बाकी क्षेत्रों के बीच वोटिंग पैटर्न का अंतर भी गौर करने लायक है. राव इंद्रजीत को शहरी और अहीर बहुल इलाकों में बहुत ज्यादा समर्थन मिला जो मेवात में जाकर बहुत ही कम हो गया. इसके उलट जाकिर हुसैन को शहरी मतदाताओं के ना के बराबर वोट मिले. लेकिन मेवात की मेव बहुल सीटों पर उन्हें बंपर वोट पड़े. मेवात क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवार के प्रति हद का समर्थन और अहीर बहुल क्षेत्र में इसका उलटा होना इस बात को साबित करता है कि आज भी बहुत से मतदाता वोट देते वक्त जाति और धर्म से प्रभावित होते हैं.


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