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सोमवार , 16 जुलाई 2018

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ईश्वर सिंह कुंडू : दसवीं पास किसान दे रहा खेती को नया जीवनदान

जैविक खेती का प्रचार-प्रसार हाल के वर्षों में बढ़ रहा है. जो एक सकारात्मक पहल है.

26 फ़रवरी 2018

डॉ.नवीन रमण

आम भाषा में अगर किसी को जैविक और रासायनिक खेती के बीच का अंतर समझाना हो तो उसे यह कहकर समझाया जा सकता है कि दूध-घी खाकर बनाई देही(शरीर) और पाउडर खाकर बनाई देही में जो फर्क होता है. वही फर्क इन दोनों में होता है. प्राकृतिक तरीके से बनाई देही की उमर और स्वास्थ्य दोनों सही रहते हैं, जबकि पाउडर वाला शरीर बस दिखावे का शरीर होता है. पाउडर  शरीर पर धीरे-धीरे नुकसान करता है. ऐसे ही खेत में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक पदार्थ फसल पर खर्चें को भी बढ़ाते हैं और शरीर के लिए नुकसानदायक भी होते हैं. कैंसर  जैसी अनेक बीमारियों का ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ने का एक बड़ा कारण ये रासायनिक ही हैं.

ईश्वर सिंह कुंडू ने दिया खेती को नया जीवनदान

ईश्वर सिंह कुंडू ने खेती को नया जीवनदान दिया है. रसायनों ने उनके जीवन को तो मुसीबत में डाला, परंतु उन्होंने इसे सबक की तरह लिया और खुद को व खेती को बचाने के लिए एक ठोस कदम उठाया.

कैथल जिले के छोटे से गांव कैलरम से दसवीं पास किसान ईश्वर कुंडू आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।  यह वही किसान वैज्ञानिक हैं, जिनके बनाए जैविक कीटनाशक राष्ट्रपति के मुगल गार्डन में इस्तेमाल होते हैं। कुंडू के आविष्कार और उनके जीवन संघर्ष पर मीडिया में खबरें लगातार छपती रही हैं। जिसके बाद दूरदर्शन ने अब उनके जीवन और आविष्कार पर एक धारावाहिक तैयार किया। दूरदर्शन के किसान चैनल पर कुंडू के जीवन संघर्ष की पूरी गाथा को दिखाया गया है।
दूरदर्शन के किसान चैनल पर उन किसानों की जीवन गाथा को दिखाया जाता है, जिन्होंने अपने जज्बे से खेती के क्षेत्र में एक मुकाम हासिल किया है। जिन्होंने अपने दम पर और मुश्किलों का सामना करते हुए वो काम कर दिखाया जिसे आम लोग असंभव कहते थे। इसी कड़ी में कुंडू की जीवनी को विस्तार से दिखाया गया है कि कैसे एक सिर्फ 10वीं पास दो एकड़ के किसान ने अपनी साधारण समझबूझ के बलबूते एक ऐसे काम को कर दिखाया जिसे सभी ने नामुमकिन कहा था। ईश्वर ने जब जहरीले कीटनाशकों आदि के दुष्प्रभाव को खुद पर महसूस किया और समझ लिया कि ये कीटनाशक प्रकृति का विनाश करने वाले हैं। शोध में पाया कि इन जहरीले उत्पादों ने न केवल भूमि, बल्कि पेयजल, हवा, मानव स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाया है। उसने इन कीटनाशकों का विकल्प तलाशने की सोची। दरअसल कीटनाशकों की दुकान पर काम करते हुए इन कीटनाशकों की वजह से कुंडू के शरीर का पूरा तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो गया। जिसका बुरा असर आजतक उनके शरीर पर साफ दिखता है। उनकी इस खोज में इस बुरी घटना से प्रेरणा का काम किया और किसानों को इन जहरों से दूर रहने का संदेश दिया और खुद जैविक उपचार तैयार किया।
कंपनियों ने पुलिस केस तक में उलझाया
कुंडू ने बताया कि उन्होंने किसी भी कीमत पर अपने मकसद को पाने के लिए दिन रात एक कर दिया। बड़ी-बड़ी कंपनियों से दुश्मनी हुई, लोगों ने पुलिस केस भी कराए, लेकिन रोकने, मार्ग से भटकाने में सफल नहीं हुए। जब इसने प्राकृतिक जड़ी बूटियों पर शोध आरंभ किया तो इस लाइन के विद्वानों ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता। सिर्फ घासफूस के सहारे खेती नहीं हो सकती। मगर ईश्वर ने साबित कर दिखाया कि जिनको लोग घास फूंस कहते हैं ये महान औषधियां हैं। कुंडू ने प्रयोग करके यह साबित कर दिया कि प्रकृति के अंदर ही लड़ने का उपचार मौजूद होता है. बसर्ते हम प्रकृति की शक्ति को पहचानते हों। प्रकृति की शक्ति पर विश्वास और खुद के विश्वास को एकाकार करके कुंडू ने इसे एक वरदान का रूप दे दिया।
चार रिकार्ड बनाए, तीन दर्जन अवार्ड

दूरदर्शन ऐसे लोगों को प्रेरणा स्त्रोत के रूप में प्रमोट करता है, जिन्होंने अपने जीवन में कुछ साबित कर दिखाया है। किसान ईश्वर कुंडू को अपने आविष्कारों के चलते तीन दर्जन से ज्यादा पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने चार रिकार्ड भी बनाए, जिसके चलते उन्हें राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है।
 


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