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नया हरियाणा

रविवार, 23 सितंबर 2018

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थैली में जहर : किसानों की ख़राब हालात का एक बड़ा कारण है मिलावट 

मिलावट के बाजार के साथ-साथ मेडिकल का बाजार फल-फूल रहा है. मिलावट को खत्म करो और स्वास्थ्य को बहाल करो.

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24 फ़रवरी 2018

नया हरियाणा

जी हां!, इस एक लाइन को खोजने और वेरीफाई करने में नारसी मोन जी इंस्टीटूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज मुम्बई से आये 5 स्टूडेंट्स की टीम ने 24 दिनों तक बहुत मेहनत की और हमें यह राह खोज कर दिखाई के जो इतनी हाय तौबा मची है खेतीबाड़ी सेक्टर में, उसका एक कारण कृत्रिम खाद्य पदार्थों और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के बीच में कानून द्वारा कोई स्पष्ट नीति न होना है।
उदहारण के तौर पर आज दूध 50 रुपये के आस पास प्रतिलीटर बिक रहा है मार्केइट में. यह रेट किसने तय किया है, जाहिर है जिसका बाजार पर होल्ड है उसी ने तय किया। बाजार पर होल्ड मिल्क cooperatives का है, कागजी तौर पर किसान उसके मालिक हैं, जबकि यह एक अलग दुनिया है जिसमें एक किसान की हालत तार पर सुखाए हुए कपड़े से अधिक नहीं है।(मैं जो शब्द कहना चाहता हूं आप समझ जाइये)
होता क्या है मिल्क प्लांट के अंदर जो दूध बनता है, उसे बनाने के लिए निम्नलिखित घटकों की आवश्याकता पड़ती है-
1. स्किम मिल्क पाउडर (सूखा दूध जिसे इम्पोर्ट भी किया जाता है बड़ी मात्रा में)
2. बटर आयल या वेजिटेबल आयल (किस सब्जी का यह तेल होता है वो भगवान ही जानता है, दर असल यह एक इंडस्ट्रियल उत्पाद है जो रिफाइन तेल बनाते समय बाय प्रोडक्ट के तौर पर बच जाता है , जहरीला होता है क्योंकि अप्राकृतिक होता है। इसको फैट पूरा करने के लिए इस्तेमाल में लाते हैं)
3. प्राकृतिक दूध यह किसानों द्वारा उत्पादित किया जाता है, लेकिन इसको मिल्क प्लांट तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए बीच मे इसके अंदर यूरिया, चीनी, और फॉर्मेलिन जैसे घातक तत्व मिला दिए जाते हैं।
इस पूरे सौदे को घोल घाल कर मिल्कप्लांट थैली में दूध भर के पेश कर देता है, जो FSSAI के मानकों के अनुरूप होता है। मिल्क प्लांट अपनी उत्पादन कोस्ट निकाल कर उसके ऊपर प्रॉफिट रख कर बाज़ार में उतार देता है।
अब आप आंकड़ो पर नज़र डालें देश की एक बड़ी दूध कंपनी जो हर रोज 44 लाख लीटर दूध खरीदती है और बेचती है डेढ़ करोड़ लीटर दूध प्रतिदिन। यही से आप समझ सकते हैं मिलावट के खेल को. सारी कंपनियां खरीदती कम हैं और बेचती ज्यादा हैं. जब ज्यादा बेचती हैं तो नकली माल तैयार करके बाकी की जरूरत को पूरा करती हैं.
अब प्लांट में पैदा हुआ दूध और रामफल की गाय भैंस से पैदा हुए दूध की कीमत एक जैसी कैसी हो सकती है? 
जब कानून ही भेद नहीं करेगा फ्रेश मिल्क और स्टैण्डर्डडाइज़ेड मिल्क में। ऐसे में किसान भी अपना मेहनत से पैदा किया हुआ दूध इसी भाव बेचने पर मजबूर है।
धीरे-धीरे किसान इस काम को छोड़ देता है और खुद भी थैली का दूध पीना शुरू कर देता है। मैं कई गांवों में दूध की थैलियों को बिकते हुए देख रहा हूँ। अब गाय रोड़ पर घूमना शुरू कर देती है, समस्या बढ़ती चली जाती है।
थैलियों का दूध पीने वाले गौ भक्त और गौ रक्षक बन जाते हैं, देश मे चीख पुकार का माहौल बन जाता है। किसान की खेती चक्र का एक महत्वपूर्ण घटक उसके हाथ से फिसल जाता है और वो कर्जे की ओर अग्रसर होता है।
देश खड्डे में जा रहा है, डॉक्टर, वकील, चार्टेड अकाउंटेंट कंपनी सेक्रेटरी इंजीनियर , आईएएस , सरकारी नौकर सब के सब बाजार में उपलब्ध कूड़ा खा रहे हैं और सब के सब मेडिकल बिजनेस कंपनियों के लिए कमा रहे हैं। मेडिकल इन्शुरन्स करवा लेने से दर्द कम नहीं हो जाता बावलों। पूरा देश डायबिटीज और कैंसर की चपेट में आ रहा हैं।

अब रास्ता क्या है?

देश मे चल रही खाने पीने की वस्तुओं में हो रही मिलावट के विरुद्ध किसान और जनता एक साथ उतरें।
FSSAI नंबर को देख कर संतुष्ट न हों, क्योंकि इस संस्था के बारे में CAG ने जो लिखा है उसका भाव यह है के हिंदुस्तान में आज तक का सबसे बड़ा फ्रॉड है। दूध के मामले में केंद्र सरकार मान चुकी है के देश मे मिल रहे दूध में 3 सैम्पलों में से 2 कन्फर्म जहरीले हैं। 1 को ठीक न मानियो चेक करवा लीजिए, बावलों के बेरा अफसर झूठ बोल गये हो।
अपने आस पास फ़ूड टेस्टिंग लेबोरेटरी ढूंढो और खुद सैंपल भरने शुरू करो और अपनी तसल्ली के लिए खुद चेक करवाओ। जब रिपोर्ट नेगटिव आ जाये और आपको यकीन हो जाये के आप अप्राकृतिक मौत खुद खरीदकर घर ला रहे हैं. इससे बचने के लिए  कुछ करने की सोच रहे हैं तो निम्नलिखित स्टेप्स उठाएं-
अपने फ़ूड टेस्टिंग वाले रिजल्ट्स को अपने आस पास लोगों को बताएं और उन्हें भी प्रेरित करें के वो टेस्ट करवाएं, उनकी सैंपल भरने में और टेस्ट करवाने में मदद करें। जब उनकी भी टेस्ट रिपोर्ट को देख कर टैं बुल जाए और वो कहें के कुछ करो तो सबसे पहले एक इनफॉर्मल Consumer Cooperative बना ले और उसमें इतने मेंबर शामिल करें के मेंबर्स के हाथ में 1 लाख रुपया एकत्र हो जाये। याद रखें इस कोआपरेटिव को पंजीकृत नहीं करवाना है. नहीं तो सरकार के अफसर फिर खसम बन जाएंगे आपके मिशन के। यह हिसाब किताब महिलाओं के पास रहे तो बेहतर है।
उसके बाद अपने निवास के तीस किलोमीटर के अंदर अंदर घूम घाम के किसानों का एक समूह तलाशो. जहां आपकी बात एक किसान से न होकर पूरे किसान परिवार से हो। किसान परिवार से कठठे हो कर मिलने जाओ। उनकी बात सुनो और चर्चा इस बात पर करो के शुद्ध दूध कैसे मिल सकता है।
किसान से रेट मत पूछो उसकी कॉस्टिंग निकलवाओ जैसे तुम हर रोज अपने दफ्तरों में निकालते हो। फिर भी न निकले तो एक कोस्ट अकाउंटेंट को बांध के ले जाओ और उससे निकलवाओ।
जब रेट सेट हो जाये तो उन किसान परिवारों को अपने घरों में न्यौता दो और ऐसा सिस्टम बनवाओ के उनके पास पैसा बिल्कुल सही समय पर पहुंचे। एटीएम पे टी एम जो भी ले कर देना है उनको ले कर दो। आप जो भी सिस्टम बनाओ उसको इन चार फैक्टर्स पर फिट करना है जो इस प्रकार है- Locality, Seasonality, Transperency, Traceability
मतलब यह है के आपका सिस्टम लोकल होना चाहिए, सीजन के अनुरूप होना चाहिए, ट्रांसपेरेंट होना चाहिए और उत्पादन से लेकर किचन तक का सफर ट्रेसबल होना चाहिए।
भाई बाद में बायोप्सी करवाने से बेहतर है के दूध का टेस्ट आज ही करवा लो। शुगर , कैंसर, की गोलियां खाने से बेहतर है के ढंग का खाना खा लो आखिर पैसे कमाए किसके लिए जा रहे हैं। भाई नवदीप खेड़ा जो चंडीगढ़ के जाने माने बिजनेस मैन हैं ने मुझे एक बार कहा था के दूध का काम एक रेलवे लाइन के जैसे है यदि यह शुरू हो गया तो सब कुछ उसके ऊपर शुरू हो सकता है।
अब असल काम यह करना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को शहरी अर्थव्यवस्था से जोड़ना है. नेटवर्किंग करनी है. ये सब काम करने से होना है। पूरे हरियाणे में 5000 से अधिक मिलावटखोर नही होंगे जो ढाई करोड़ लोगों का फद्दु बना रहे हैं हर तरफ से। दूसरी तरफ युवा अगर इस काम में आगे आएंगे तो उनके लिए रोजगार का यह एक सुनहरा अवसर भी है.
जाग जाओ भाइयों न तो यहीं नरक बण जावेगा, इससे लड़ना है इसको रोकना है। शुद्ध दूध की पटरी बिछा लो अपने घर तक गाय भी बच जाएगी और किसान भी बच जाएगा।
रोजगार के नए अवसर और किसानों का आर्थिक भला व आमजन के स्वास्थ्य का भला। सारे काम एक साथ हो सकते हैं. जिसका मूलमंत्र यही है कि- आओ काम करें।
 


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