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शनिवार, 22 सितंबर 2018

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राजीव गांधी की शादी के बाराती अल्गोजा वादक धोधे खान रोटी-रोटी को हुए मोहताज

सरकार एवं कला संस्कृति विभाग दोनों के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात नहीं हो सकती कि संस्कृति के सच्चे साधक दो जून की रोटी को मोहताज हो रहे हैं.

24 फ़रवरी 2018

जोगिंद्र कुमार

राजस्थान का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में नक्काशी वाले बड़े-बड़े किले दिमाग में घूमने लगते हैं। राजा महाराजाओं की कहानियां और और रेतीला समंदर ही नजर आता है। इसके अलावा राजस्थान की एक विशेष पहचान है. वह है, वहाँ का संगीत और उसमें सबसे अलग है ओलगोजे की धुन।
आप अगर रेडियो पर राजस्थान के आकशवाणी केंद्र सुनते होंगे तो दोनों कार्यक्रमों के बीच में एक धुन सुनाई देती होगी। वो धुन ज्यादातर ओलगोजे की बजती है। उस धुन बजाने वाले  हैं धोधे खान. राजस्थान की कला एवं संस्कृति का वो बड़ा नाम, जो आज दाने-दाने के लिए मोहताज हो रहा है। इसे अब सरकार की नाकामी कहिए या संस्कृति उद्योग की मुनाफाखोरी. जिसमें बिचौलिये धन कमा जाते हैं और कला को उच्च शिखर पर पहुंचाने वाले दर-बदर की जिंदगी जीने को मोहताज रहते हैं। ऐसे ही शख्स हैं धोधे खान.

https://www.youtube.com/watch?v=Hj-12eBUMC8
धोधे खान का परिवार बाड़मेर में रहता है, उनके परिवार का मुख्य काम ब्याह-शादी और शुभ अवसरों पर गाने बजाने का है। धोधे खान अपनी जवानी के दिनों में किसी की शादी में अलगोजे बजा रहे थे, तभी धोधे खान पर बाड़मेर राजस्थान के वरिष्ठ नेता भूरचंद जैन की  नजर पड़ी। उन्होंने शौकिया तौर पर उनकी आवाज टेपरिकॉर्डर में रिकॉर्ड कर ली।
उन्हीं दिनों दिल्ली में राजीव गांधी की शादी की तैयारियां चल रही थी। भूरचन्द जी भी वहीं मौजूद थे, उन्होंने ओलगोजे की धुन राजीव गांधी को सुनाई तो वो मन्त्र मुग्ध हो गए। उन्होने तुरंत ही भूरचन्द  जैन को कहा कि धोधे खान को मैं अपनी बारात में साथ लेकर जाना चाहता हूँ। उसके बाद धोधे खान की किस्मत चमक गयी....उन्होंने कई देश घूमे. आकशवाणी और दूरदर्शन के लिए कार्यक्रम किये। उनके ओलगोजे की धुन राजस्थान की एक विशेष पहचान बन गयी। 

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लेकिन आज के वक़्त उसी धुन को बजाने वाले धोधे खान बहुत तंगहाली में जीवन-बसर कर रहे हैं, मोबाइल फोन आने से लोगो ने आकशवाणी से मुँह मोड़ा और आकशवाणी ने धोधे खान से। जब उनसे मैंने बात की तब उन्होंने बताया कि अब कभी-कभी आकशवाणी से पांच महीने में एक बार बुलावा आता है और दो से पांच हजार मिलते हैं। इससे खुद का गुजारा नहीं चलता। उन्होंने बताया कि मैने कई बार मुख्यमंत्री जी तक अपनी बात पहुँचाने की कोशिश की। मगर हमेशा आश्वाशन ही मिला।
मेरे पिताजी, दादाजी जहाँ गाते थे। वो  परिवार भी अब तंगहाली में जी रहे हैं। उनसे भी कुछ नहीं मिलता। हाल ही बाड़मेर कलेक्टर जी से मिलने गया था तब उन्होंने और कुछ लोगों ने सहायता की। लेकिन अब मांगना अच्छा भी नहीं लगता।
यह तो हालत है हमारे देश की। जहां संस्कृति को बचाने के नाम पर लोगों की जान तक ले ली जाती हैं और कहां संस्कृति के सच्चे सरंक्षक जीवन चलाने के लिए दो जून की रोटी के मोहताज हो रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार और अफसर आलीशान सेमिनारों में करोड़ों रुपए हर साल फूंक देते हैं। कम से कम कांग्रेस के नेताओं को ही कोशिश करके धोधे खान की मदद करनी चाहिए।
धोधे खान जी के बारे में मैने जब जोधपुर के रहने वाले संगीत प्रेमी गिरधारी लाल विश्वकर्मा जी (जिनकी अपनी निजी संगीत लाइब्रेरी है )से बात की तो उन्होंने बताया कि वो राजस्थान के पहले ओलगोजा वादक हैं। राजस्थान तो लोक कला की खान है, लेकिन उनके जैसा कलाकार राजस्थान में कही नहीं होगा। उन्होंने मुझे 1982 में दिल्ली में किये एक प्रोग्राम की उनकी एक रिकॉर्डिंग उपलब्ध करवाई है।

 

लेखक राजस्थान के निवासी हैं. आप उनसे उनके फेसबुक के माध्यम से जुड़ सकते हैं. https://www.facebook.com/profile.php?id=100015404057736
 


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