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नया हरियाणा

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

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मास्टर रामचंद्र लाल: हरियाणा के उर्दू हस्ताक्षर 

हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार रणदीप घणगस एक पुस्तक लिख रहे हैं जिसका नाम है- हरियाणा के उर्दू हस्ताक्षर. उसी पुस्तक के अंश हम समय समय पर खास तौर पर अपने पाठकों के लिए लेकर आयेंगे. इसी कड़ी में पेश है हरियाणा के बड़े उर्दू लेखक मास्टर रामचंद्र लाल पर यह लेख.

Master Ramchandra Lal, Urdu signature of Haryana,, naya haryana, नया हरियाणा

23 फ़रवरी 2018

रणदीप घनगस

हरियाणा की साहित्यिक एवं सास्कृतिक विरासत पर वरिष्ठ पत्रकार रणदीप घणगस बेहतरीन काम कर रहे हैं. हरियाणा के हस्ताक्षरों पर खोज-खोजकर एक जगह लेखन करना काफी परिश्रम और दर-दर भटकने का काम है. जिसे जज्बे के बगैर करना कभी भी संभव नहीं है. शीघ्र प्रकाशित पुस्तक में हरियाणा के उर्दू  शायरों, साहित्यकारों, पत्रकारों, उर्दू समाचार पत्रों एवं उनके द्वारा लिखे गए लेखों के संबंध में विवरण दिया गया है. इस प्रदेश में उर्दू  शायरों, साहित्यकारों, पत्रकारों एवं समाचार पत्रों को अभी और शोध की जरुरत है. आखिर उर्दू का पहला उपन्यास ( रियाज ए दिलरुबा) भी तो इसी हरियाणा की सरजमीं पर लिखा गया था. कुछ लेखकों ने उर्दू भाषा और साहित्य दोनों को बढ़ावा देने में योगदान दिया है। मास्टर रामचंद्र एक ऐसे लेखक हैं और उर्दू के साहित्यिक इतिहास ने उन्हें न केवल उपेक्षित किया बल्कि लगभग उसे भुला दिया है. इसी सीरिज में आज उन्होंने हरियाणा एक ऐसे ही हस्ताक्षर से हमें रू-ब-रू करवाया है मास्टर रामचंद्र लाल से. आप भी जानिये हरियाणा की इस महान हस्ती को.                   

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मास्टर रामचंद्र पर बहुत कम लिखा गया है, हालांकि उन्होंने उर्दू निबंध लेखन और आधुनिक उर्दू गद्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वास्तव में  मास्टर रामचंद्रलाल ही उर्दू का पहला निबंध लेखक था, लेकिन मास्टर रामचंद्र और उनके उर्दू निबंधों के बारे में ज्ञान की कमी ने गलत धारणा को जन्म दिया है कि सर सैयद अहमद खान उर्दू के पहले निबंध लेखक थे। जैसा कि सईदा जेफर ने अपनी पुस्तक में साबित किया, रामचंद्र ने सर सैयद के मुकाबले उर्दू में लेखन शुरू किया था। मास्टर रामचंद्र ने दिल्ली कॉलेज में गणित और विज्ञान पढ़ाया और छात्रों और प्रशासन के बीच लोकप्रिय था। चूंकि एक शिक्षक जो स्कूल में पढ़ाता था, उस समय 'मास्टर' कहलाता था, यह शब्द रामचंद्र के नाम का हिस्सा बन गया। मौलवी अब्दुल हक के अनुसार, रामचंद्र का जन्म 1822 में पानीपत में हुआ था। सिद्दीक-उर-रहमान क़िदवाई ने अपनी पुस्तक ‘मास्टर रामचंद्र’ में लिखा है कि रामचंद्र एक हिंदू कायस्थ परिवार के थे। उनके पिता राय सुंदर लाल माथुर पानीपत में नायब तहसीलदार के पद पर कार्यरत थ। जब वह 10 साल के थे तब उनके पिता राय सुंदरलाल जी का देहांत हो गया। 
मास्टर रामचंद्र लाल अपनी मां के साथ दिल्ली चले गये,  जहां उनका मकान था। 1933 में उन्होंने एक अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में दाखिला ले लिया जहां उन्होंने 2रु. महीना की छात्रवृत्ति मिलने लगी। मास्टर रामचंद्र की कम उम्र में ही शादी हो गई। परिवार चलाने के लिए और पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने यह शादी की। कुछ समय के लिए उन्होंने एक नौकरी भी की। बाद में 1941 में उन्होंने तब के ओरिएंटल कॉलेज दिल्ली कॉलेज में दाखिला ले लिया। जहां उन्होंने एक प्रतियोगिता परीक्षा में भाग लिया और 30रु.  महीना की छात्रवृत्ति प्राप्त की। जिससे उनकी वित्तीय समस्या खत्म हुई और वह अपनी पढ़ाई में समय देने लगे। फरवरी 1844 में मास्टर रामचंद्र लाल दिल्ली कॉलेज में अध्यापक बन गए।  मास्टर रामचंद्र लाल दुनिया के जाने माने गणितज्ञ के रूप में जाने जाने लगे। 1845 में उन्होंने दिल्ली की पहली पाक्षिक उर्दू पत्रिका “फुआदिन नाजरीन “का प्रकाशन शुरू किया। इसके साथ ही 1847 में उन्होंने मासिक उर्दू पत्रिका “खैरखवा ए हिंद “का संचालन किया। बाद में इस मासिक पत्रिका का नाम “मुहब-हि-हिंद” हो गया। यह दोनों पत्र नए-नए विचारों से भरे होते थे। इनमें विज्ञान से संबंधित उर्दू के लेख लिखे होते थे। जो देश में पहली बार अंग्रेजी से उर्दू में अनुवाद करके लिखें गए थे। यह दोनों पत्रिकाएं 1852 के आसपास बंद कर दी गई। एक अध्यापक, एक संपादक पत्रकार होने के साथ-साथ मास्टर रामचंद्र लाल एक अनुवादक भी थे। उन्होंने विज्ञान की अनेक किताबों का उर्दू में अनुवाद किया। मास्टर रामचंद्र लाल हरियाणा में जन्म लेने वाले पहले व्यक्ति थे जो “थामसन इंजीनियरिंग कॉलेज” आजकल “आईआईटी रुड़की” के मुख्याध्यापक बने थे। 
1852 के बाद उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था। 1858 में उन्होंने इस पर अफसोस जाहिर भी किया कि उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया, जबकि अंग्रेज और उनमें भेदभाव किया जा रहा है। कुछ समय बाद उन्होंने थामसन कॉलेज रुड़की से इस्तीफा दे दिया और दिल्ली आकर एक स्कूल में प्रिंसिपल हो गए। 1866 में रिटायर होने के बाद पटियाला रियासत में चले गए और 1868 में पटियाला रियासत के शिक्षा विभाग के निदेशक नियुक्त हुए।  मास्टर रामचंद्र लाल अंग्रेजी से उर्दू और फारसी में एक अच्छे अनुवादक भी थे। उन्होंने साधारण भाषा में अनेक अंग्रेजी की किताबों का उर्दू में अनुवाद किया “इलम मूसा लस”-1844, उसूल जबर मुकाबला 1845, अजय बात ई रोजगार 1847, तज किरात उल कामिलन 1849, कोलायत ओ झंझावत 1850. मास्टर रामचंद्र  के काम पर  अनेक देशो  में काम हुआ है और तो और पाकिस्तान के सबसे बड़े समाचारपत्र “डान” ने भी पिछले वर्ष अगस्त में उन पर एक पूरे पेज का लिटरेरी नोट प्रकाशित किया था। पर ये दुःख की बात है कि हमारे अपने हरियाणा में उनके बारे में शायद ही कोई जानता हो। मास्टर रामचंद्र का निधन 11 अगस्त 1880 को हुआ।


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