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नया हरियाणा

सोमवार , 16 जुलाई 2018

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खेतीबाड़ी को देश सेवा नहीं कारोबार मानकर करें किसान, तभी होगा फायदा

किसानों को आगे बढ़कर बाजार में उतरना होगा, तभी उसे अपनी फसल की लागत से कई गुना लाभ मिल सकेगा.

kishan bajar, naya haryana, नया हरियाणा

21 फ़रवरी 2018

कमल जीत

कल रात  एक पोस्ट पढ़ी, जिसमे गेहूं का आटा 50 रुपये प्रतिकिलो बिकता हुआ दर्शाया गया था, पोस्ट की आत्मा यह थी के गेहूं के समर्थन मूल्य से तीन गुना आटे की कीमत कैसे हो सकती है।

"गेहूं उगाना, आटा बनाना और फिर आटा बेचना " प्रॉफिट बनाना ये एक छोटी सी चेन रिएक्शन दर असल कितनी बड़ी महाभारत है इसका अंदाज मुझे तब लगा जब मैं कुछ किसान समूहों के साथ मेंटर की भूमिका में जुड़ा। मिशन था खेती में से दो पैसे कमाना और खेती को एक बढ़िया शानदार रोजगार के रूप में स्थापित करके देखना।

मैंने दो ढाई साल के अनुभव से जो सीखा वो इस प्रकार है।

1. खेतीबाड़ी एक रोजगार है, व्यवसाय है कारोबार है किसान इसे देशसेवा कहता है वो इसमें से चमत्कार की उम्मीद करता है।

2. कारोबार हमेशा एक चेन में जुड़ कर होता है मतलब एक व्यवस्था का हिस्सा बनना पड़ता है, जैसे ही व्यावस्तिथ होने की बात आती है तो किसान का दम घुटने लगता है।

3. हर कारोबार की नीवं हिसाब किताब लेखा जोखा होता है, खेती एक ऐसी व्यवस्था है जहां हर कदम पर कुछ न कुछ पैदा होता है जिसे धन में कन्वर्ट किया जा सकता है लेकिन धन में कन्वर्ट करने के लिए आपको फिर एक व्यवस्था का हिस्सा बनना पड़ेगा।उसके बिना होगा नही।लगभग किसी किसान के पास उसके कारोबार का कोई हिसाब किताब नही है।

4. किसान समाज तहसील पुलिस कोर्ट कचहरी के मामलों में इतना अधिक उलझा हुआ है जिसकी वजह से कभी भी वो शांति से अपने काम मे फोकस ही नही कर पाता है। तहसील के काम किसानों के कभी खत्म ही नही होते।

5. शादी ब्याह , मृत्यु , मकान, गाड़ी आदि किसान समाज के सामने बड़े चेलेंज हैं, किसान समाज आपस में बैठ कर ये फैंसला क्यों नही करता के हम अपने रीति रिवाज और तौर तरीके बनाएंगे जिसमे किसी भाई पर आर्थिक बोझ न पड़े। दिन प्रतिदिन ये पक्ष उलझता ही जा रहा है, इस दिशा में कोई प्रगति नही है।

6. एक एक किसान अकेला अकेला आटा नही बना कर बेच सकता, उसके लिए पूंजी की आवश्यकता पड़ेगी, पूंजी एकत्र करने के लिए आपस मे मिलना पडेगा। नियम कायदे कानून हिसाब किताब से चलना पड़ेगा। जो चलेगा वो बन जायेगा।

7. मार्किट में सबसे कीमती वस्तु होती है साख जिसको कमाना पड़ता है, क्वालिटी के मामले में देश मे आज भी लोग यह मानते हैं के यदि किसान के घर आ रहा है तो वह शुद्ध ही होगा, लेकिन इस साख का फायदा उठाने में किसान समाज बिल्कुल फेल होता दिखाई दे रहा है।इसको जितनी जल्दी टैप किया जाएगा उतनी जल्दी खेती बाड़ी के कारोबार में स्थायित्व आएगा।

8. मैं अनेक युवाओं से बात करता हूँ तो वो बताते हैं कि जैसे ही मार्केटिंग की बात आती है उनका दिमाग ब्लेंक हो जाता है। यह खालीपन तब तक रहेगा जब तक कुछ शुरू नही किया जाता।

9. बैंक जैसे महत्वपूर्ण संसाधन का दोहन करने में किसान समाज पूर्णतया नाकाम रहा है। जिसका एक मात्र कारण इग्नोरेंस है।

10. राजनीतिक भाषण और जुमले सबसे अधिक किसान समाज को आकर्षित करते हैं और वही लपेटे जाते हैं इनके चक्करों में सबसे पहले। हर रैली को किसान भरते हैं, क्यों? सरकारों से लाभ लेने वाले आर्थिक संगठन होते है क्योंकि उन्हें पता होता है के एजेंडा क्या चलाना है। किसान समाज की एकता केवल नाम की होती है जबकि आर्थिक जगत की एकता "काम" की होती है।

11. किसान समाज ने दीनबंधु की न बात रखी न इज्जत वो जहां से उन्हें निकाल कर लाये थे ये उससे भी बुरी थां पर घुसे हुए हैं। इस बारे में अधिक नही कहूंगा लेकिन आप आत्ममंथन जरूर किजिये।

12. ऐसा बिल्कुल नही है के किसान समाज के पास धन की कमी है, अपितु मेरा मानना है के इस दुनिया मे जो जगमग दिखाई देती है वो केवल किसान समाज की बदौलत ही दिखाई देती है, अपने धन को आधुनिक इकनॉमी में यथा स्थान दिलवाने में नाकामयाब रहा है किसान समाज। आज भी मंडी के आढ़ती की बैलेंस शीट इम्प्रूव होती है हर साल किसान कैश पकड़ के घर आ जाता है। इस बात का कितना लॉस किसान समाज को होता है उसका अंदाज किसान को है ही नही।

14. किसान समाज के पास अपने उत्पादन को होल्ड करने का कोई इंतजाम नही है, क्यूं नही है मेरी समझ के बाहर है,जब कमीज खरीद रखी है पहनने के लिए फिर पैंट सिमवाने में दिक्कत क्या है। लेकिन दिक्कत तो है।

15.किसान समाज सबसे कुपोषित, बीमार और शारीरिक रूप से कमजोर होता जा रहा है कारण क्या है, दूध, फल, घी, सब्जी सब मोल आ रहा है,भाई जब गेहूं धान कंबाइन ने काटने हैं, धान बिहारी भाइयों ने लगाने हैं, बुवाई ट्रैक्टरों की मदद से हो जानी है, मेरे हिसाब से समय का कोई टोटा नही है किसान समाज के पास फिर भी सब कुछ मोल का आ रहा है। गंदा जहरीला दूध जैसा 
पदार्थ गांवो में मिलने लग गया है। कहाँ डटोगे भाई।

बात रेट से शुरू हुई थी इस बाबत एक प्रैक्टिकल अनुभव सुनाता हूँ, इसी साल हमारे एक साथी ने चंडीगढ़ में 1500 रुपये किलो गुड़ बेच कर दिखाया, लोगों ने हस कर लिया सुनो कैसे। उसने गुड़ की टॉफियां बनवाई 100 ग्राम के बहुत सुंदर डिब्बे की कीमत 150 रुपये रिटेल जिसमे लगभग 200 टॉफियां थी। सिंधी स्वीट्स पर यह डिब्बा उपलब्ध है। इस हिसाब से गन्ने का रेट हो गया 18000 रुपये क्विंटल।

अब ये टॉफियों के डिब्बे दुनिया भर में एक्सपोर्ट होंगे, लेकिन यहां तक आने में हमारे साथी ने कितनी मेहनत की है हमारा जी जानता है।

भाइयों यही आटा 100 रुपये किलो भी बहुत आराम से बिक सकता है, दूध भी 100 रुपये लीटर बिक सकता है लेकिन उसके लिए उद्योग करना पड़ेगा। हाड़ गोड़ड़े हिलाने पाड़ेंगे, दिमाग का दही करना पड़ेगा।

हमारे अनेक किसान साथी 2 वर्षों में हिले हैं, मुझे इस बात की अत्यंत खुशी है,मैं बहुत आशावान हूँ क्योंकि मैं ऐसे किसानों के बीच मे रहता हूँ जो खुद हालात बदलने के लिए मेहनत कर रहे हैं। उनके पास आज किसी किसान रैली में जाने का समय नही है।

हिसार में किसान बैठे हैं, मामला नहरों का है, किसी के पास कोई डाटा नहीं है डाटा रघु यादव जी के पास है, वो न धरने पर आएंगे न उनको कोई कंसल्ट करेगा क्योंकि हल नही निकालना है किसी ने। यही हाल 23 फरवरी को होना है, जाओ जाओ सब दिल्ली जाओ।

तेल तो तिलों में से निकलना है। एक ही बात कहूंगा बातें काम को नही पीट सकती अंत मे काम ही राह निकालेगा। ये समय काम करने का है।


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