Privacy Policy | About Us | Contact Us

नया हरियाणा

रविवार, 23 सितंबर 2018

पहला पन्‍ना English लोकप्रिय हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप

दीक्षा को संथारा बताकर किया जा रहा है सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार

जब तक शिक्षित समाज इन कुरीतियों और अमानवीय कर्मों का साथ देता रहेगा, तब तक इन से छुटकारा मिलना संभव नहीं है. यह बात हर धर्म के अंदर मौजूद अमानवीयता पर लागू होती है. 

haryana jind baroda, santhara jain religion, naya haryana, नया हरियाणा

20 फ़रवरी 2018

नया हरियाणा

लंबे समय से संथारा के समर्थन और विरोध में स्वर उठते रहे हैं और जैन धर्म को मानने वालों के पास इसके समर्थन में अपने तर्क और आस्थाएं हैं, जबकि इसके विरोध में खड़े लोगों के पास अपने तर्क और मानवीय पहलू है. इसमें एक पक्ष कानूनी भी है. जिसके आधार पर इस पर बैन लगाए जाने की मांग उठी थी, दूसरी तरफ कोर्ट ने इस पर लगे बैन को हटा दिया था। क्या संथारा प्रथा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र है या यह पूरी तरह से अमानवीय है? हरियाणा में सोशल मीडिया पर संथारा प्रथा को लेकर किया जा रहा है विरोध। सोशल मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार हरियाणा में जींद के उचाना हल्के के बड़ौदा गांव में एक 18 वर्ष की लड़की का संथारा किया जा रहा है, जबकि यह जैन धर्म की संथारा प्रथा से मेल नहीं खाता है. इनेलो प्रवक्ता और वकील रवींद्र सिंह ढुल ने इस अमानवीयता का विरोध करते हुए लिखा है कि-

<?= haryana jind baroda, santhara jain religion; ?>, naya haryana, नया हरियाणा

सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं-

<?= haryana jind baroda, santhara jain religion; ?>, naya haryana, नया हरियाणा

<?= haryana jind baroda, santhara jain religion; ?>, naya haryana, नया हरियाणा

हरियाणा में इससे पहले भी संथारा प्रथा का अनुसरण करने की जानकारी मिली है-
<?= haryana jind baroda, santhara jain religion; ?>, naya haryana, नया हरियाणा


क्या है संथारा प्रथा
सल्लेखना (समाधि या सथारां) मृत्यु को निकट जानकर अपनाये जाने वाली एक जैन प्रथा है। इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि वह मौत के करीब है तो वह खुद खाना-पीना त्याग देता है। दिगम्बर जैन शास्त्र अनुसार समाधि या सल्लेखना कहा जाता है, इसे ही श्वेतांबर साधना पध्दती में संथारा कहा जाता है। सल्लेखना दो शब्दों से मिलकर बना है सत्+लेखना। इस का अर्थ है - सम्यक् प्रकार से काया और कषायों को कमज़ोर करना। यह श्रावक और मुनि दोनो के लिए बतायी गयी है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है, जिसके आधार पर व्यक्ति मृत्यु को पास देखकर सबकुछ त्याग देता है। जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र के सातवें अध्याय के २२वें श्लोक में लिखा है: "व्रतधारी श्रावक मरण के समय होने वाली सल्लेखना को प्रतिपूर्वक सेवन करे"। जैन धर्म में संथारा मृत्यु की धार्मिक प्रक्रिया है।
जैन ग्रंथो में सल्लेखना के पाँच अतिचार बताये गए हैं:-
जीवितांशसा- सल्लेखना लेने के बाद जीने की इच्छा करना
मरणांशसा- वेदना से व्याकुल होकर शीघ्र मरने की इच्छा करना
मित्रानुराग- अनुराग के द्वारा मित्रों का स्मरण करना
सुखानुबंध- पहले भोगे हुये सुखों का स्मरण करना
निदांन- आगामी विषय-भोगों की वांछा करना
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना आत्महत्या जैसा, बैन लगाया
राजस्थान हाईकोर्ट ने जैनों के धार्मिक रिवाज ‘संथारा’ (मृत्यु तक उपवास) को अवैध बताते हुए उसे भारतीय दंड संहिता 306 तथा 309 के तहत दंडनीय बताया। अदालत ने कहा, संथारा या मृत्यु पर्यंत उपवास जैन धर्म का आवश्यक अंग नहीं है। इसे मानवीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह मूल मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है। वकील निखिल सोनी ने वर्ष 2006 में ‘संथारा’ की वैधता को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दायर की थी। याचिका दायर करने वाले के वकील ने ‘संथारा’, जो कि अन्न जल त्याग कर मृत्यु पर्यंत उपवास है, को जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया था।
जबरदस्ती बंद नहीं किया जाता अन्न
ऐसा नहीं है कि संथारा लेने वाले व्यक्ति का भोजन जबरन बंद करा दिया जाता हो। संथारा में लेने वाला व्यक्ति स्वयं धीरे-धीरे अपना भोजन कम कर देता है। जैन-ग्रंथों में स्पष्ट लिखा है कि उस समय यदि उस व्यक्ति को नियम के अनुसार भोजन दिया जाता है। जो अन्न बंद करने की बात कही जाती है, वह मात्र उसी स्थिति के लिए होती है, जब अन्न का पाचन असम्भव हो जाए।

पक्ष में तर्क
इसके पक्ष में कुछ लोग तर्क देते हैं कि आजकल अंतिम समय में वेंटिलेटर पर शरीर का त्याग करते हैं। ऐसे में ये लोग न अपनों से मिल पाते हैं, न ही भगवान का नाम ले पाते हैं। यूं मौत का इंतजार करने से बेहतर है, संथारा प्रथा। धैर्य पूर्वक अंतिम समय तक जीवन को सम्मान के साथ जीने की कला है ये।
सितंबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने जैन समुदाय को सितंबर 2015 में बड़ी राहत देते हुए संथारा प्रथा को बैन करने के राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी.
जानिए जैन धर्म की इस प्रथा की 10 खास बातें.
1. जैन धर्म में दो पंथ हैं, श्वेतांबर और दिगंबर. संथारा श्वेतांबरों में प्रचलित है. दिगंबर इस परंपरा को सल्लेखना कहते हैं.
2. यह बड़ी भ्रांति है कि संथारा लेने वाले व्यक्ति का खाना-पीना जबरदस्ती बंद करा दिया जाता है या वह एकदम खाना-पीना छोड़ देता है. संथारा लेने वाला व्यक्ति स्वयं धीरे-धीरे अपना भोजन कम करता है.
3. जैन ग्रंथों के मुताबिक, संथारा में उस व्यक्ति को नियम के मुताबिक भोजन दिया जाता है. अन्न बंद करने से मतलब उसी स्थिति से होता है, जब अन्न का पाचन संभव न रह जाए.
4. भगवान महावीर के उपदेशानुसार जन्म की तरह मृत्यु को भी उत्सव का रूप दिया जा सकता है. संथारा लेने वाला व्यक्ति भी खुश होकर अपनी अंतिम यात्रा को सफल कर सकेगा, यही सोचकर संथारा लिया जाता है.
5. जैन धर्म में संथारा की गिनती किसी उपवास में नहीं होती.
6. संथारा की शुरुआत सबसे पहले सूर्योदय के बाद 48 मिनट तक उपवास से होती है, जिसमें व्यक्ति कुछ पीता भी नहीं है. इस व्रत को नौकार्थी कहा जाता है. 
7. संथारा में उपवास पानी के साथ और बिना पानी पीए, दोनों तरीकों से हो सकता है.
8. संथारा लेने से पहले परिवार और गुरु की आज्ञा लेनी जरूरी होती है.
9. यह स्वेच्छा से देह त्यागने की परंपरा है. जैन धर्म में इसे जीवन की अंतिम साधना माना जाता है.
10. जैन धर्म के मुताबिक, जब तक कोई वास्तविक इलाज संभव हो, तो उस अहिंसक इलाज को कराया जाना चाहिए. संथारा के व्रत के बीच में भी व्यक्ति डॉक्टरी सलाह ले सकते हैं. इससे व्रत नहीं टूटता.

दरअसल धर्म और आस्थाओं के नाम अमानवीय कर्मों की एक लंबी फेहरिस्त हम सभी के सामने मौजूद है, परंतु जब तक शिक्षित समाज इन कुरीतियों और अमानवीय कर्मों का साथ देता रहेगा, तब तक इन से छुटकारा मिलना संभव नहीं है. हर बात हर धर्म के अंदर मौजूद अमानवीयता पर लागू होती है. सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि हरियाणा में दीक्षा को संथारा बताकर किया जा रहा है सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार।


बाकी समाचार