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नया हरियाणा

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

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कांग्रेस का तंबू उखाड़ेगा लोसुपा-बीएसपी गठबंधन, बीजेपी की मदद के लिए करेगा तांडव

गठबंधन के पीछे एक ही मनोविज्ञान काम करता है- मिलकर लड़ेंगे और सबका बोरिया-बिस्तर समेत कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेंगे।

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13 फ़रवरी 2019



उमेश जोशी

जींद उपचुनाव के बाद सपने बिखर गए, इनेलो और बीएसपी, दोनों दलों के। हरियाणा में चुनाव जीतने और सत्ता पर क़ाबिज़ होने के लिए बड़े अरमानों के साथ दोनों दलों ने गठबंधन किया था। गठबंधन के पीछे एक ही मनोविज्ञान काम करता है- मिलकर लड़ेंगे और सबका बोरिया-बिस्तर समेत कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेंगे। बड़ा से बड़ा तेज़ वेग वाला दरिया भी पार करने का हौंसला दिखाई देने लगता है लेकिन जींद में पहली ही परीक्षा में दोनों दलों के होंसलों की हवा निकल गई और छोटे से नाले में ही डूब गए। सत्ता के सपने देखने वाले दोनों दल मिलकर भी अपने साझा उम्मीदवार उमेद सिंह रेढू की जमानत नहीं बचा पाए।

हार कभी सम्मानजनक नहीं होती लेकिन हमारे लोकतंत्र के पुरोधाओं ने बहुत कम अंतर से होने वाली हार को सम्मानजनक हार’ का दर्जा दे दिया। ठीक वैसे ही है जैसे कोमा में जाने के बाद घर वाले इस तसल्ली से जीते हैं कि हमारा पेशेंट अभी जीवित है, मरा नहीं है। ‘अभी जीवित है’ का भाव अपने देश की राजनीति में सम्मानजनक हार की तरह मान लिया गया है। जमानत गंवाने वाली हार को ‘डूब मरने की लानत’ जैसा माना जाता है; इनेलो-बीएसपी इसी गति को प्राप्त हो गई हैं।

था तो चौटाला परिवार का झगड़ा, उसमें अभय चौटाला का जितना बिगड़ा, उससे तगड़ा बीएसपी को लग गया रगड़ा। बीएसपी दर्द से कराह रही थी। भारी तकलीफ यह थी कि आम चुनाव में भी ऐसी ही दुर्गति हो गई तो कई वर्षों सद्गति नहीं होगी। बीएसपी बहाना ढूंढ रही थी कि इनेलो से कैसे किनारा किया जाए; इनेलो से अलग भी हो जाए और आम जनता यह डंका भी ना पीटे कि आगामी आम चुनाव में जींद जैसी धुनाई के डर से नाता तोड़ लिया। बहाना बनाया कि  संयुक्त चौटाला परिवार से गठबंधन किया था लेकिन अब परिवार में फूट पड़ गई है इसलिए हमारा गठबंधन अब सार्थकता खो चुका है। बयानों में यह ध्वनि भी सुनाई दी कि परिवार एक हो जाए तो गठबंधन बरकरार रहेगा।

बीएसपी ने नौ मन तेल जुटाने जैसी शर्त रख दी; वे जानते हैं कि नौ मन तेल कभी होगा नहीं और राधा कभी नाचेगी नहीं। लिहाजा, बीएसपी ने इनेलो से कुछ महीनों का गलबहियाँ वाला नाता एक झटके में खत्म कर दिया। जींद उपचुनाव में दोनों पार्टियां काणी  हो चुकी थीं और अब दोनों काणे फिर से अपनी अपनी राह पर आ गए।

इस कहानी में सबसे बड़ा और अहम बिंदु यह है कि बीएसपी ने इनेलो का दामन छोड़ते ही बीजेपी के बागी सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के साथ रिश्ता जोड़ लिया। इससे यह साबित होता है कि लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी और बीएसपी के बीच गुपचुप प्यार की पींग चढ़ रही थी और सारी शर्तों पर सहमति होने के बाद इनेलो को बाय बाय कह दिया। अगर ऐसा ना होता तो लोसुपा से नाता जोड़ने के लिए कुछ तो समय लगता।

दरअसल, इनेलो और बीएसपी का गठबंधन बेमेल था। दलित वर्ग जाट नेताओं के साथ सहज महसूस नहीं करता। राजकुमार सैनी और बीएसपी का मतदाता लगभग समान हैं; सैनी के साथ पिछड़ा वर्ग है तो बीएसपी के साथ दलित। दोनों मतदाताओं के बीच दूरियां नहीं हैं इसलिए यह गठबंधन स्वाभाविक  और ज़्यादा असरदार माना जा रहा है।

अब अहम सवाल यह है कि यह गठबंधन किसके वोट काटेगा। जींद उपचुनाव को सामने रख कर आकलन करें तो यह निर्विवाद सत्य है कि सैनी कांग्रेस के वोट काटेगा, बीजेपी के नहीं। सैनी से बीजेपी को फायदा मिला  है और भविष्य में मिलेगा इसलिए बीजेपी अंदरूनी तौर पर वो सारे इन्तज़ाम करेगी जिससे सैनी मज़बूती के साथ डटा रहे।

यूं तो बीएसपी की सुप्रीमो मायावती का हरियाणा के दलित वोटों पर ज़्यादा असर नहीं है और जिन वोटों पर प्रभाव है वह कांग्रेस का परंपरागत वोट है। लिहाजा, बीएसपी भी कांग्रेस को ही काणा करेगी। दुष्यन्त चौटाला की जननायक जनता पार्टी का समर्थक कहीं नहीं डिगेगा क्योंकि उसने अभी तक अपने नेता को परखा नहीं है और परखे बिना नेता से मोहभंग नहीं होता. लिहाजा यह गठबंधन जेजेपा के लिए निरापद है।

इनेलो पहले ही काणी हो चुकी है. उसके पास जमानत बचाने लायक भी वोट नहीं हैं लेकिन जितने हैं वो पार्टी के प्रति निष्ठावान हैं। लोसुपा-बीएसपी गठबंधन इनेलो के वोटों में भी सेंध नहीं लगा सकता। दुष्यंत चौटाला ने जींद उपचुनाव से पहले गोपाल कांडा से मुलाक़ात की थी। यदि दोनों में गठजोड़ हो गया तो उससे इनेलो को भारी नुकसान होगा; इनेलो के गढ़ सिरसा जिले में उसका सफाया भी हो सकता है। मौजूदा राजनीतिक समीकरण संकेत दे रहे हैं कि यह लोसुपा-बीएसपी गठबंधन कांग्रेस के ही वोट काटेगा जिसका सीधे सीधे बीजेपी को लाभ मिलेगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी खुद को मजबूत करने के साथ गठबंधन को भी टॉनिक देगी. यह भी संभावना है कि बीजेपी ने ही इस गठबंधन का आईडिया दिया हो

चूंकि गठबंधन सिर्फ वोट कटुआ भूमिका में रहेगा और बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने के बदले लोसुपा और बीएसपी अपने एक दो नेताओं को सत्ता के केक में से कुछ टुकड़े मिलने की आस से काम करेंगी। बीएसपी और लोसुपा गठबंधन सत्ता के आसपास भी नहीं पहुंच पाएगा। सत्ता पाने के सपने देखने वाली बीएसपी की सबसे अधिक दुर्गति होगी, भले ही वो कुछ भी कर ले।

उमेश जोशी की व्हाटसअप पोस्ट से प्रेरित, ये लेखक के खुद के विचार हैं.

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