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नया हरियाणा

शनिवार, 22 सितंबर 2018

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जींद रैली में अमित शाह की बॉडी लेंगुएज को लेकर चर्चाएँ, भाषण से इतर थे हाव भाव 

किसी भी रैली से किसी पार्टी की जीत-हार से ज्यादा पार्टी के शक्ति-प्रदर्शन के तौर पर देखा जाना चाहिए. इस शक्ति प्रदर्शन में भाजपा कमजोर साबित हुई है.

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16 फ़रवरी 2018

नया हरियाणा

अमित शाह के कल के भाषण और उनकी बॉडी लेंग्वेज पर गौर किया जाए, तो एक बात साफ दिख रही थी कि उनकी जुबान पर सुभाष बराला और मुख्यमंत्री के लिए जितने भी प्रशंसा में शब्द कहे गए हों, उनकी बॉडी लेंग्वेज उसके उलट व्यवहार कर रही थी. हो सकता है भाजपा हाईकमान पहले से हरियाणा में बदलाव का मन बना चुका हो और बड़ी जिम्मेदारी के नाम पर फेरबदल करने के लिए इस रैली को आधार बना सकता है. इस बात को राजनीति के जानकार बखूबी समझते हैं कि जब रैली का मंच हो तो भले ही मुख्य वक्ता भीड़ से खुश हो या नाराज़ वह कभी मंच पर मौजूद नेताओं को खरी खोटी नहीं सुनाएगा. ऐसे में अगर अमित शाह के भाषण में सीएम और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष की तारीफ थी तो उनकी बॉडी लेंगुएज से नाराज़गी झलक रही थी और इसी वजह से अब इस बात की ज़ोरदार चर्चाएँ हैं कि रैली से मिला फीडबैक हरियाणा भाजपा के कई बड़े नेताओं के लिए मुसीबत का सबब बन सकता है.

मनोहर लाल खट्टर का भाषण 
भीड़ चाहे 20 हजार हो 30 हजार हो या 40 हजार हो, लाखों के दावे के आसपास भी नहीं थी. दूसरी तरफ मुख्यमंत्री का मोदी शैली की नकल में भाषण देना उनकी बौखलाहट को साफ दिखा रहा था और उनको मिलने वाले गलत फीडबैक की बानगी भी झलका रहा था. खट्टर साहब को यह गलत फहमी हो गई है कि यशपाल मलिक के साथ समझौते करके और उन्हें हिसाब से चलाकर वो दोबारा सत्ता में लौट आएंगे. दरअसल आज के दिन खट्टर के काम करने के तरीके से न तो जाट खुश हैं और न गैर जाट. उनके शासन में कानून व्यवस्था की सबसे ज्यादा बैंड बजी हुई है. जनता के मूड को भांप नहीं रहे हैं या अनदेखा करना उन्हें सत्ता से दूर ले जा सकता है. दरअसल खट्टर के हावभाव से यह साफ लगने लगा है कि उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि अगर हरियाणा में भाजपा रिपिट करेगी तो मोदी लहर में करेगी, वरना न भी करेगी तो उन पर क्या फर्क पड़ने वाला है. अपनी मेहनत से तो उन्होंने इस बार भी जीत नहीं दिलवाई थी. दूसरों के भरोसे दीवाली मनाने वाले मस्तमौला इंसान हैं.

इनेलो की अनदेखी के मायने
यह एक खास किस्म की रणनीति हो सकता है, जिसके तहत शाह ने इनेलो की अनदेखी की. उसके कई आधार हो सकते हैं. एक तो यह कि जिस दल से सब से ज्यादा खतरा हो उस दल की अनदेखी कर दो. दूसरी तरफ शाह उतना स्पेस छोड़कर रखना चाहते हों कि भविष्य में इनेलो से गठबंधन भी हो सकता है. दूसरी तरफ सोशल मीडिया और धरातल पर इनेलो ने ही शाह का खुलकर विरोध किया. इनेलो के सोशल मीडिया के धुंरधर अक्सर भाजपा को 5 या 7 सीटों तक सीमित बताते हैं, जिसने भी यह रणनीति बनाई है, उसे राजनीति की समझ नहीं है. इनेलो को यह बात समझ लेनी चाहिए कि अगर भाजपा का सूपड़ा साफ हुआ तो यह कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा सुनहरा अवसर बनेगा, इनेलो के लिए खतरे की घंटी है. इनेलो को फायदा तभी होगा जब कांग्रेस और भाजपा आपस में एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दें. वर्तमान समय में इनेलो कार्यकर्ताओं में सबसे ज्यादा जोश साफ नजर आ रहा है और पार्टी का कद बढ़ता हुआ भी साफ दिख रहा है.

भूपेन्द्र हुड्डा पर निशाना
पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा पर हमला रणनीति का हिस्सा हो सकता है, या तो भाजपा अपना असली टक्कर देने वाला उन्हें मानती है या फिर जानबूझकर हुड्डा को अपने विपक्ष के तौर प्रायोजित किया जा रहा है. यह भी माना जा रहा है की यह हुड्डा पर दबाव की रणनीति हो सकती है.  फिलहाल कांग्रेस बैकफूट और अंतारिक कलह की शिकार ज्यादा लग रही है.

 

जींद की रैली से जीत-हार किस पार्टी की होगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. बल्कि यह कहा जा सकता है कि भाजपा हाईकमान ने रोहतक और जींद से अपने चुनावी बिगुल को बजा दिया है. जनता किस पार्टी पर विश्वास करेगी और किसके सपनों को अपना समर्थन देगी, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है.


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