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नया हरियाणा

सोमवार , 1 मार्च 2021

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रोहतक लोकसभा का इतिहास और ताऊ देवीलाल की 3 करारी हार

रोहतक लोकसभा से भूपेंद्र हुड्डा 4 बार और दीपेंद्र हुड्डा 3 बार सांसद बन चुके हैं.

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8 फ़रवरी 2019



नया हरियाणा

इस सीट पर तीन बार हारे चौ. देवीलाल

यहां से सर्वाधिक 4 बार भूपेंद्र सिंह हुड्डा (1991, 1996, 1998 और 2004) चुनाव जीते हैं। वह चौधरी देवीलाल को लगातार तीन बार हरा चुके हैं। तीनों बार देवीलाल अलग-अलग पार्टियों से चुनाव लड़े थे और हर बार उनकी हार का अंतर कम होता गया। वर्ष 1991 में वह 30573, 1996 में 2664 और 1998 में केवल 383 वोट से चुनाव हारे थे। उन्होंने यहां से 1989 का चुनाव जीता था।

यह हरियाणा की वह लोकसभा सीट है जिस पर हमेशा जाट जाति से ही सांसद बने हैं. इस सीट पर चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा, लहरी सिंह, प्रो. शेर सिंह, हरद्वारी लाल, चौधरी देवीलाल और भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे बड़े नेता सांसद रह चुके हैं. रणबीर हुड्डा 1951, 1957, शेर सिंह 1977, देवी लाल 1989, हरद्वारी लाल 1984, 1989 उपचुनाव और भूपेंद्र सिंह हुड्डा 1991, 1996, 1998 में यहां से चुनाव जीते हैं. इसके बाद दीपेंद्र सिंह हुड्डा 2005 उपचुनाव, 2009 और 2014 में जीत दर्ज कर लगातार तीन बार सांसद बन चुके हैं. रोहतक लोकसभा सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही है और खासतौर पर 1991 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लोकसभा चुनाव लड़ना शुरू करने के बाद यह पार्टी  सिर्फ एक चुनाव 1999 का ही हारा. हुड्डा परिवार के सामने चौधरी देवीलाल, कैप्टन अभिमन्यु, नफे सिंह राठी और ओम प्रकाश धनकड़ जैसे नेता चुनाव जीतने में नाकामयाब रहे हैं. हालांकि चौधरी देवीलाल पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा की लोकसभा चुनाव में दो बार जीत सिर्फ 2664 और 383 वोटों की रही. लेकिन हर हाल में हुड्डा परिवार का यहां दबदबा साफ दिखता है. भूपेंद्र सिंह हुड्डा को 1982 और 1987 में किलोई विधानसभा सीट के चुनाव में हार मिली थी.

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2014 चुनाव में कांग्रेस पार्टी की तरफ से सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा का ही फिर से चुनाव लड़ना तय था. दीपेंद्र हुड्डा ने 2005 उपचुनाव और 2009 में बहुत बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. पहले चुनाव में उन्होंने भाजपा के कैप्टन अभिमन्यु को 2 लाख 20 हजार वोटों से हराया. जबकि 2009 में इनेलो के नफे सिंह राठी पर उनकी जीत 4 लाख 45 हजार वोटों की रही. यह 2009 के चुनाव की देश भर में सबसे बड़ी जीत थी. कांग्रेस सरकार में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के मुख्यमंत्री रहते हुए दीपेंद्र हुड्डा की लोकप्रियता चरम पर रही.  इसी वजह से हरियाणा और पूरे देश में मोदी लहर के बावजूद दीपेंद्र हुड्डा की सीट कांग्रेस के लिए सुरक्षित रही. चुनाव के समय इस लोकसभा के तहत आने वाली सभी 9 सीटों पर कांग्रेस के विधायक थे और ऐसे एक तरफा कांग्रेसी झुकाव वाला यह इकलौता संसदीय क्षेत्र था. हालांकि 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस यहां 9 में से 5 सीटें ही जीत पाई. रोहतक, बहादुरगढ़, बादली और कोसली विधानसभा कांग्रेस के हाथ से निकल गई. दीपेंद्र हुड्डा को महम, गढ़ी सांपला किलोई, रोहतक, कलानौर, बादली, झज्जर और बेरी में काफी अच्छी बढ़त मिली. बहादुरगढ़ और कोसली में वह दूसरे स्थान पर रहे. खासकर कोसली में तो भाजपा उम्मीदवार ने 40 हजार से ज्यादा वोटों की बढ़त पाई. दिल्ली से सटी इन 3 सीटों बहादुरगढ़, बादली और कोसली में कांग्रेस के प्रति कम रुझान की बदौलत ही यहां अक्टूबर में भाजपा के विधायक बने. रोहतक विधानसभा सीट पर कांग्रेस हार गई जो बड़ी हैरानी का विषय था. दीपेंद्र हुड्डा ने कुल 46.86% वोट लिए और उनकी जीत करीब 1 लाख 70 हजार वोटों की थी. 2009 में दीपेंद्र हुड्डा को यहां कुल मतदान के 69.98% वोट मिले थे जो उस समय एक तरह का रिकॉर्ड था. स्वतंत्रता सेनानी परिवार में जन्मे दीपेंद्र हुड्डा ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी से एमबीए भी किया है.
इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार ओमप्रकाश धनखड़ थे. इनका यह पहला लोकसभा चुनाव था. ओमप्रकाश धनखड़ भाजपा के किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे थे और दादरी से विधानसभा चुनाव लड़ चुके थे. चुनावी राजनीति में अच्छी तरह पहली बार सक्रिय हुए धनखड़ को लोगों का समर्थन तो मिला लेकिन वह दीपेंद्र को चुनौती देने के लिए नाकाफी था. धनखड़ के यहां से मजबूती से चुनाव लड़ने का पार्टी को फायदा यह हुआ कि जहां अब तक इस संसदीय क्षेत्र में भाजपा का एक भी विधायक नहीं था वहाँ अक्टूबर में पार्टी ने 9 में से 4 सीटें जीती. रोहतक बहादुरगढ़ बादली और कोसली में भाजपा के विधायक बने. जिनमें से बादली से तो खुद ओम प्रकाश धनखड़ ही जीते. लोकसभा चुनाव में धनखड़ को रोहतक, बहादुरगढ़ और कोसली में अच्छे वोट मिले. कोसली से तो उन्हें करीब 40 हजार की बढ़त भी मिली. जबकि बहादुरगढ़ में भी वह पहले नंबर पर रहे. रोहतक के लोगों ने भी उन्हें लगभग 42 हजार वोट दिए.  धनखड़ को आखिरकार करीब 30.55% वोट मिले जो इस सीट पर दीपेंद्र हुड्डा की लोकप्रियता के मद्देनजर काफी थे. 2009 में भाजपा ने यहां से चुनाव नहीं लड़ा था और गठबंधन के तहत सीट इनेलो के लिए छोड़ दी थी. वैसे इस सीट पर भाजपा का सांसद कभी नहीं बना. हालांकि 1962 में जनसंघ की सीट पर मुख्त्यार सिंह मलिक और 1971 में जनसंघ की ही टिकट पर चौधर लहरी सिंह रोहतक से सांसद बने. भाजपा बनने के बाद पार्टी के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के तौर पर यहां कैप्टन अभिमन्यु दो बार उपविजेता जरूर रहे. रोहतक सीट पर ओम प्रकाश धनखड़ की सक्रियता की वजह से हुड्डा परिवार को काफी समय यहां चुनाव प्रचार में देना पड़ा. जिसकी वजह से वह बाकी हरियाणा में ज्यादा नहीं घूम पाए. इसका फायदा कहीं ना कहीं भाजपा को चुनाव में मिला.
रोहतक सीट पर इनेलो के उम्मीदवार शमशेर सिंह खरकंडा थे. जो अब तक महम विधानसभा क्षेत्र की राजनीति करते थे. शमशेर खरकंड़ा ने 2009 में महम से निर्दलीय चुनाव लड़ा था और कांग्रेस उम्मीदवार आनंद सिंह दांगी से करीब 7 हजार वोटों से हारे थे. लोकसभा चुनाव से पहले खरकंडा ने इनेलो जॉइन कर ली और रोहतक से टिकट भी ले ली. उन्हें ज्वाइन करवाने के लिए पार्टी नेता अभय सिंह चौटाला नाटकीय ढंग से महम में उनकी एक जनसभा में पहुंचे थे और उन्हें उसी मंच से पार्टी में शामिल करने की घोषणा कर दी थी. अचानक हुए इस घटनाक्रम के क्षेत्र में काफी चर्चा हुई और टिकट मिलने के बाद एक बार शमशेर खरकड़ा मजबूत उम्मीदवार के तौर पर नजर आने लगे थे. लेकिन जैसे-जैसे मोदी लहर का असर हरियाणा के चुनाव पर पड़ा. सभी सीटों की तरह यहां भी कांग्रेस के निष्ठावान वोटरों को छोड़कर बाकी मतदाता भाजपा की ओर की चला गया. चुनाव के समय इस लोकसभा क्षेत्र में इनेलो का एक भी विधायक नहीं था और यह स्थिति कुछ महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी बनी रही. इनेलो रोहतक संसदीय क्षेत्र में खाता ही नहीं खोल पाई. लोकसभा चुनाव में शमशेर खरकड़ा महम को छोड़कर बाकी सभी विधानसभा हलकों में बड़े अंतर से तीसरे स्थान पर रहे. महम में वे दीपेंद्र हुड्डा के बाद दूसरे नंबर पर थे.  सरकंडा को कुल 14.45% वोट मिले. जो 2009 में यहां पार्टी उम्मीदवार नफे सिंह राठी को मिले मतों से भी दो फ़ीसदी कम थे. शमशेर खरकड़ा ने अपना राजनीतिक अनुभव बढ़ाने और विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत माहौल बनाने के उद्देश्य से भी यह चुनाव लड़ा था. इसमें भी उन्हें सही कामयाबी नहीं मिली. मोदी लहर में पूरा चुनाव बह जाने की वजह से उनके वोट काफी कम रहे और इसका असर उनके विधानसभा चुनाव पर भी पड़ा. जो उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर लड़ा था और हारे थे.
रोहतक सीट पर आम आदमी पार्टी के नेता नवीन जयहिंद भी चुनाव लड़ रहे थे, जो बाद में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने. युवा नेता नवीन जयहिंद को यहां ज्यादा समर्थन नहीं मिला और वह मुश्किल से 4.47% वोट ले पाए. नवीन को सबसे ज्यादा 9914 वोट रोहतक विधानसभा क्षेत्र से ही मिले थे.
रोहतक लोकसभा राजनीतिक लिहाज से एक सक्रिय और चर्चा में रहने वाला क्षेत्र है. खासतौर पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा के मुख्यमंत्री काल से यह इलाका हरियाणा की राजनीति का सबसे अहम हिस्सा रहा. इस सीट पर लोकसभा चुनाव में भाजपा की विफल चुनौती ने विधानसभा चुनाव में उथल-पुथल का माहौल तैयार किया और पार्टी को अकेले चुनाव लड़ने का आत्मविश्वास हासिल हुआ. खास तौर पर रोहतक शहर सीट में मजबूती से प्रदेश के शहरी सीटों और दिल्ली से सटे 3 विधानसभा सीटों में भाजपा की जीत को एनसीआर और अहीरवाल में पार्टी के अच्छे प्रदर्शन से जोड़कर देखा जाने लगा. इस सीट पर जाट जाति का असर इतना ज्यादा है कि यहां हुए चुनाव में विजेता ही नहीं उपविजेता भी जाट ही रहते हैं और यह सिलसिला 2014 में भी कायम रहा.


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