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नया हरियाणा

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

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कुमार विश्वास : हिंदी कविता मंच पर युवा धड़कनों में हंगामा करने वाले कवि

एक नेता के रूप में बाद में ख्याति मिली, उससे पहले कुमार विश्वास हिंदी मंचीय कविता में बड़ा नाम बन चुके थे.

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10 फ़रवरी 2018

डॉ. नवीन रमण

कुमार विश्वास हिन्दी के एक अग्रणी कवि तथा सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। मंचीय कविता में युवा दिलों की धड़कनों को कुरेदने वाले कवि के रूप में कुमार विश्वास को ख्याति प्राप्त है। वह युवा धड़कन प्रेम में लीन हो या प्रेम में टूट चुका हो, उन दोनों के अहसासों को लगातार छूने की काबिलियत कुमार विश्वास में है। हिंदी साहित्य की तथाकथित गंभीर आलोचना उन्हें मंचीय कवि कहकर हिंदी कवियों में भले ही शामिल न करती हो, फिर भी कुमार विश्वास हिंदी पाठकों और दर्शकों के भीतर कविता के बीज रोपण का कार्य बखूबी कर रहे हैं और हिंदी के विस्तार में अहम् भूमिका निभा रहे हैं।
कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिलखुआ, (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय विद्यालय, पिलखुआ से प्राप्त की। उनके पिता डॉ॰ चन्द्रपाल शर्मा, आर एस एस डिग्री कॉलेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कॉलेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे।
 डॉ॰. कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढ़ाई में नहीं लगा और उन्होंने बीच में ही वह पढ़ाई छोड़ दी। एक बार मंच पर उन्होंने इसका जिक्र करते हुए कहा था कि अगर मैं इंजीनियर बनता तो देश का भविष्य खराब कर रहा होता, आज खुद का कर रहा हूं। दरअसल हमारे यहां यह आम धारणा है कि कवियों को खुद का भविष्य खराब करने वाला माना जाता है, जबकि कुमार विश्वास ने इस आम धारणा को भी धवस्त किया है।
साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्पश्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। शिक्षक से कवि और कवि से एक राजनेता बनने की पूरी यात्रा में उनका कवि हृदय लगातार समृद्ध ही हुआ है।
कवि कुमार विश्वास एक कवि के रूप में अपनी पीड़ा और कवि की जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि-
“मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है
तब तक मुझको जीना होगा.” 
व्यक्तिगत पीड़ा ही मनुष्य को प्रेम के चरम पर लेकर जाती है और यही पीड़ा आम इंसान को सृजनकार बनाती है. ये पीड़ाएं सामूहिक चेतन-अवचेतन का हिस्सा बनकर व्यक्तिगत न रहकर सामूहिक बन जाती हैं। इसीलिए इनमें जिम्मेदारी का अहसास भी बढ़ जाता है और दायित्व का दबाव भी। ये पीड़ाएं फिर व्यक्तिगत न रहकर समस्त संसार की पीड़ाओं से एक खास किस्म का संबंध निर्मित कर लेती है, जो इन्हें भूमंडलीय स्वरूप देता है।
कवि कुमार विश्वास इन पीड़ाओं के माध्यम से राधा, सीता, हाड़ा रानी, मीरा और द्रोपदी आदि की पीड़ाओं को महसूस कर पाते हैं और अपने काव्य के माध्यम से उन्हें अभिव्यक्ति देते हैं- 
“मनमोहन के आकर्षण मे भूली भटकी राधाओं की
हर अभिशापित वैदेही को पथ मे मिलती बाधाओं की
दे प्राण देह का मोह छुड़ाओं वाली हाड़ा रानी की
मीराओं की आँखों से झरते गंगाजल से पानी की
मुझको ही कथा सँजोनी है,
मुझको ही व्यथा पिरोनी है
स्मृतियाँ घाव भले ही दें
मुझको उनको सीना होगा.”
इन सभी व्यथाओं को एक साथ पिरोकर दुःख के सांझे स्वरूप के माध्यम से उन टूटे दिलों को दिलासा देने का काम किया है, जहां हजार शब्दों का ज्ञान कम पड़ जाता है. और ये स्मृतियां भले ही घाव देती हों, कवि अपनी संवेदनाओं से उन्हें सीने या महरम लगाने का काम करता है. इसीलिए कहते हैं कि मन खुश हो या दिल टूटा हो, दोनों ही स्थितियों में गीत मनुष्य को दिलासा देने का काम करते हैं। उत्साह और निराशा दोनों क्षणों में गीत मनुष्य के सदा से सहपाठी रहे हैं।
प्रेम को अभिव्यक्ति देने वाले कवि
कुमार विश्वास प्रेम को आम शब्दों में गंभीर अभिव्यक्ति देने वाले कवि हैं. दरअसल कुमार विश्वास एक आम भारतीय प्रेमी के हृदय तक अपनी बात पहुंचाने वाले कवि हैं। वो हिंदी साहित्य की एकाडमिक भाषा और शैली वाले कवि नहीं हैं। वो उस आम भारतीय प्रेमियों के कवि हैं, जो प्रेम के दरिया में डूबते रहते हैं। कुमार विश्वास को ख्याति दिलाने में इस गीत का सबसे बड़ा योगदान रहा है-
“कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है !
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है !
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!
मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है !
कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !!
यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं !
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !!

समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नहीं सकता !
यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नहीं सकता !!
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले !
जो मेरा हो नहीं पाया, वो तेरा हो नहीं सकता !!”
कुमार विश्वास ने इस कविता में जो बिंब चुने हैं, प्रेम की अभिव्यक्ति में वो इतने सटीक बैठते हैं कि आम हृदय में तुरंत समाहार हो जाते हैं जैसे-धरती की बेचैनी को बादल समझता है, आंखों के पानी को मोती समझना या पानी और मोहब्बत एहसासों की पावन सी बेला है।  
प्रेम पर हंगामा
कुमार विश्वास ने प्रेम को लेकर जो दोहरी मानसिकता  उसको बखूबी पकड़ा है. हमारे यहां किस्सों में तो खूब प्रेम सुनाया-गाया जाता है, परंतु जब कोई प्रेम करने लगता है तो हंगामा हो जाता है। इन तमाम तरह के हंगामों के बीच प्रेम करने वाले कब डरे हैं और वो भी तब जब कुमार विश्वास जैसे कवि ऐसे प्रेमियों के साथ सुर-ताल के साथ खड़े हों।
“भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा!
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा!!
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का!
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!!
भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा.
कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा
कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा
मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है , साजिश है
उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा
जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा
ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब
ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा
कलम को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा 
गिरेबां अपना आंसू में भिगोता हूँ तो हंगामा 
नहीं मुझ पर भी जो खुद की खबर वो है जमाने पर 
मैं हंसता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा
इबारत से गुनाहों तक की मंजिल में है हंगामा
ज़रा-सी पी के आये बस तो महफ़िल में है हंगामा
कभी बचपन, जवानी और बुढापे में है हंगामा
जेहन में है कभी तो फिर कभी दिल में है हंगामा
हुए पैदा तो धरती पर हुआ आबाद हंगामा
जवानी को हमारी कर गया बर्बाद हंगामा
हमारे भाल पर तकदीर ने ये लिख दिया जैसे
हमारे सामने है और हमारे बाद हंगामा.”
इतने प्यारे किस्म के हंगामों को अंजाम देने वाले कवि कुमार विश्वास, युवा दिलों पर अहसासों की पावन बारिश कर रहे हैं।


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