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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

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डिजिटल किसान बलवान शर्मा से बातचीत

बलवान शर्मा को डिजिटल इंडिया का ब्रांड एंबेसडर बनाया जाना चाहिए

8 फ़रवरी 2018

नया हरियाणा

जुनून और जज्बा हो तो कोई भी बाधा इंसान को रोक नहीं सकती. बल्कि सभी बाधाएं उसके लिए प्रेरक बनकर उसका साथ देने लगती हैं. अगर पूरी शिद्दत से किसी काम को करना चाहो तो पूरी कायनात लग जाती है उसे पूरा करने में. ऐसी एक शख्सियत से आज आपको रू-ब-रू करवा रहे हैं. जो डिजिटल इंडिया के जरिए अपनी और अपने आस पास की जिंदगी की मुश्किलों को कम कर रहे हैं और एक नई दिशा दे रहे हैं.
दृश्य परियोजना में हुई मुलाकात
बलवान शर्मा जैसी शख्सियत से मेरी मुलाकात दृश्य परियोजना के तहत हुई. दरअसल यह एक गैर सरकारी संगठनों की तरफ से किया जा रहा वह प्रयोग है. जिसमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के ज्यादा किसान हितैषी बनाने के लिए एक प्रयोग किया जा रहा है. सरकार की तरफ से जो बीमा योजना लागू हुई है, उसमें सबसे बड़ी कमी यह है कि वह प्रीमियम तो प्रति एकड़ के हिसाब से लेती है और मुआवजा गांव को इकाई मानकर फसल खराब होने के हिसाब से देती है. जो कि किसी भी तरह किसानों के हक में नहीं है. दृश्य प्रोजैक्ट के तहत किसान अपने खेत की हर दूसरे दिन फोटो दृश्य टीम को भेजते हैं. दृश्य टीम उन्हें खेती से जुड़ी जरूरी सलाह देती है और 10 हजार तक का फ्री बीमा भी देती है. इस टीम का यह विचार है कि अगर किसान की फसल की मोनिटरिंग सैटेलाइट के माध्यम से की जाए और मुआवजा भी उन्हें इसी आधार पर दिया जाए तो यह किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा.

बलवान शर्मा डिजिटल इंडिया के ब्रांड एंबेसडर बनने के हैं हकदार
डिजिटल भारत (डिजिटल इण्डिया) सरकारी विभागों एवं भारत के लोगों को एक दूसरे के पास लाने की भारत सरकार की एक पहल है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिना कागज के इस्तेमाल के सरकारी सेवाएं इलेक्ट्रॉनिक रूप से जनता तक पहुंच सकें और इस योजना का एक उद्देश्य ग्रामीण इलाकों को हाई स्पीड इंटरनेट के माध्यम से जोड़ना भी है. जिसके लिए सरकारी और गैर सरकारी संगठन अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं. जिनकी पहुंच अभी तक गांव के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंची है. दूसरी तरफ ऐसे शख्स भी हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत से डिजिटल इंडिया के विचार को जमीनी रूप दिया है.
बलवान शर्मा ऐसी ही शख्सियत हैं, जो केवल 10वीं पास हैं और वो भी परीक्षा में दो बार फेल होने के बाद पास हुए हैं. परंतु आज वो अपने जज्बें के कारण तकनीक के दौर में किसी के मोहताज नहीं है. बल्कि अपने आसपास के लोगों के लिए डिजिटल सेवा देने और सीखाने के लिए तत्पर रहते हैं. बलवान शर्मा हरियाणा में असंध तहसील और करनाल जिले के छोटे से गांव चोचरा की जानी-मानी शख्सियत हैं. 
बलवान शर्मा के पिता का नाम लखीराम शर्मा है और 28 दिसंबर 1965 को आपका जन्म हुआ था. अनपढ़ मां-बाप के घर पर 6 पुत्र और 5 पुत्रियों का पालन पोषण खेतीबाड़ी के जरिए ही हुआ. बलवान शर्मा अपने भाइयों में चौथे नंबर के हैं और उनसे बड़े तीन भाई अनपढ़ थे और बलवान शर्मा व उनसे छोटे भाई दोनों साथ-साथ पढ़ते हुए 10वीं पास कर सके. पढ़ाई के दौरान ही खेती करने लगे और पढ़ाई के बाद पूरी तरह से खेती के काम में लग गए. 5 एकड़ की खेती के खुद मालिक हैं और बाकी कुछ जमीन ठेके पर लेकर भी करते थे.
बलवान शर्मा के चार बच्चे हुए, जिनमें सबसे बड़ा लड़का बीए पास है और तीन लड़कियां एमए, बीएड पास हैं. बच्चों की डिमांड पर वो सन् 2007 में कंप्यूटर लेकर आए. अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण बच्चों को उसे कैसे चलाते हैं, गौर से देखने और समझने लगे. जैसे-जैसे उनकी जिज्ञासा बढ़ी, तो उन्होंने अपने बच्चों को कहा कि “आ रै बालको मन्नै भी सीखा दयो नै.” इस पर बच्चों ने कहा कि “पापा तू तो इसनै खराब कर देगा.” यह बात सुनकर एक बार तो उन्हें बुरा लगा. पर सीखने के लिए अंदर की बेचैनी यूं ही फड़फड़ाती रही.
ज्यादातर मामलों में युवा घर वालों के मना करने के बावजूद चोरी छिपे कार या बाइक रात में या घर वालों की गैर मौजूदगी में सीखते हैं. परंतु यहां मामला थोड़ा उलट था. यहां एक पापा रात में बच्चों के सोने के बाद रात में छिपकर कंप्यूटर चलाना सीख रहे थे. बलवान जी ने बातचीत में बताया कि एक बार चलाते-चलाते कंप्यूटर की विंडो उड़ गई. हाथ पैर एक बार को कांप गए यह सोचकर कि बच्चे ठीक कहते थे कि तू खराब कर देगा. खैर बच्चों के बाहर जाने के बाद मैं विंडो करवाने वाले को लेकर आया और उससे विंडो करवाई. उसने जैसे-जैसे विंडो की मैंने उसे गौर से देखकर सीख लिया और उसके बाद तो मैं विंडो की सीडी घर ही ले आया और उसके बाद जब भी विंडो उड़ती मैं खुद ही कर देता. उन्होंने बताया कि कंप्यूटर की ये खासियत सबसे बढ़िया है कि वह खुद ही बताता रहता है कि आगे क्या करना है या क्या गलत है. बस यूं ही खराब करते, ठीक करते मैं कंप्यूटर से दोस्ती कर बैठा और नई-नई चीजें पढ़ने लगा. जो भी मुझे चीज पता करनी होती मैं गूगल पर टाइप कर देता. धीरे-धीरे सीखने लगा तो मजा भी आने लगा.
एक बार रात में मैं बच्चों ने कंप्यूटर पर बैठा हुआ पकड़ लिया. मैं बंद करने लगा तो बच्चों ने कहा कि “बंद क्यूं करो हो. हामनै बेरा सै अक तू रात नै चलावै सै.” 


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