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रविवार, 19 अगस्त 2018

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बलवान शर्मा : डिजिटल इंडिया को दे रहे हैं नई पहचान

बलवान शर्मा को डिजिटल इंडिया का ब्रांड एंबेसडर बनाया जाना चाहिए.

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7 फ़रवरी 2018

डॉ. नवीन रमण

जुनून और जज्बा हो तो कोई भी बाधा इंसान को रोक नहीं सकती. बल्कि सभी बाधाएं उसके लिए प्रेरक बनकर उसका साथ देने लगती हैं. अगर पूरी शिद्दत से किसी काम को करना चाहो तो पूरी कायनात लग जाती है उसे पूरा करने में. ऐसी एक शख्सियत से आज आपको रू-ब-रू करवा रहे हैं. जो डिजिटल इंडिया के जरिए अपनी और अपने आस पास की जिंदगी की मुश्किलों को कम कर रहे हैं और एक नई दिशा दे रहे हैं.

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दृश्य परियोजना में हुई मुलाकात
बलवान शर्मा जैसी शख्सियत से मेरी मुलाकात दृश्य परियोजना के तहत हुई. दरअसल यह एक गैर सरकारी संगठनों की तरफ से किया जा रहा वह प्रयोग है. जिसमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के ज्यादा किसान हितैषी बनाने के लिए एक प्रयोग किया जा रहा है. सरकार की तरफ से जो बीमा योजना लागू हुई है, उसमें सबसे बड़ी कमी यह है कि वह प्रीमियम तो प्रति एकड़ के हिसाब से लेती है और मुआवजा गांव को इकाई मानकर फसल खराब होने के हिसाब से देती है. जो कि किसी भी तरह किसानों के हक में नहीं है. दृश्य प्रोजैक्ट के तहत किसान अपने खेत की हर दूसरे दिन फोटो दृश्य टीम को भेजते हैं. दृश्य टीम उन्हें खेती से जुड़ी जरूरी सलाह देती है और 10 हजार तक का फ्री बीमा भी देती है. इस टीम का यह विचार है कि अगर किसान की फसल की मोनिटरिंग सैटेलाइट के माध्यम से की जाए और मुआवजा भी उन्हें इसी आधार पर दिया जाए तो यह किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा.

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बलवान शर्मा डिजिटल इंडिया के ब्रांड एंबेसडर बनने के हैं हकदार
डिजिटल भारत (डिजिटल इण्डिया) सरकारी विभागों एवं भारत के लोगों को एक दूसरे के पास लाने की भारत सरकार की एक पहल है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिना कागज के इस्तेमाल के सरकारी सेवाएं इलेक्ट्रॉनिक रूप से जनता तक पहुंच सकें और इस योजना का एक उद्देश्य ग्रामीण इलाकों को हाई स्पीड इंटरनेट के माध्यम से जोड़ना भी है. जिसके लिए सरकारी और गैर सरकारी संगठन अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं. जिनकी पहुंच अभी तक गांव के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंची है. दूसरी तरफ ऐसे शख्स भी हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत से डिजिटल इंडिया के विचार को जमीनी रूप दिया है.
बलवान शर्मा ऐसी ही शख्सियत हैं, जो केवल 10वीं पास हैं और वो भी परीक्षा में दो बार फेल होने के बाद पास हुए हैं. परंतु आज वो अपने जज्बें के कारण तकनीक के दौर में किसी के मोहताज नहीं है. बल्कि अपने आसपास के लोगों के लिए डिजिटल सेवा देने और सीखाने के लिए तत्पर रहते हैं. बलवान शर्मा हरियाणा में असंध तहसील और करनाल जिले के छोटे से गांव चोचरा की जानी-मानी शख्सियत हैं. 
बलवान शर्मा के पिता का नाम लखीराम शर्मा है और 28 दिसंबर 1965 को आपका जन्म हुआ था. अनपढ़ मां-बाप के घर पर 6 पुत्र और 5 पुत्रियों का पालन पोषण खेतीबाड़ी के जरिए ही हुआ. बलवान शर्मा अपने भाइयों में चौथे नंबर के हैं और उनसे बड़े तीन भाई अनपढ़ थे और बलवान शर्मा व उनसे छोटे भाई दोनों साथ-साथ पढ़ते हुए 10वीं पास कर सके. पढ़ाई के दौरान ही खेती करने लगे और पढ़ाई के बाद पूरी तरह से खेती के काम में लग गए. 5 एकड़ की खेती के खुद मालिक हैं और बाकी कुछ जमीन ठेके पर लेकर भी करते थे.
बलवान शर्मा के चार बच्चे हुए, जिनमें सबसे बड़ा लड़का बीए पास है और तीन लड़कियां एमए, बीएड पास हैं. बच्चों की डिमांड पर वो सन् 2007 में कंप्यूटर लेकर आए. अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण बच्चों को उसे कैसे चलाते हैं, गौर से देखने और समझने लगे. जैसे-जैसे उनकी जिज्ञासा बढ़ी, तो उन्होंने अपने बच्चों को कहा कि “आ रै बालको मन्नै भी सीखा दयो नै.” इस पर बच्चों ने कहा कि “पापा तू तो इसनै खराब कर देगा.” यह बात सुनकर एक बार तो उन्हें बुरा लगा. पर सीखने के लिए अंदर की बेचैनी यूं ही फड़फड़ाती रही.
ज्यादातर मामलों में युवा घर वालों के मना करने के बावजूद चोरी छिपे कार या बाइक रात में या घर वालों की गैर मौजूदगी में सीखते हैं. परंतु यहां मामला थोड़ा उलट था. यहां एक पापा रात में बच्चों के सोने के बाद रात में छिपकर कंप्यूटर चलाना सीख रहे थे. बलवान जी ने बातचीत में बताया कि एक बार चलाते-चलाते कंप्यूटर की विंडो उड़ गई. हाथ पैर एक बार को कांप गए यह सोचकर कि बच्चे ठीक कहते थे कि तू खराब कर देगा. खैर बच्चों के बाहर जाने के बाद मैं विंडो करवाने वाले को लेकर आया और उससे विंडो करवाई. उसने जैसे-जैसे विंडो की मैंने उसे गौर से देखकर सीख लिया और उसके बाद तो मैं विंडो की सीडी घर ही ले आया और उसके बाद जब भी विंडो उड़ती मैं खुद ही कर देता. उन्होंने बताया कि कंप्यूटर की ये खासियत सबसे बढ़िया है कि वह खुद ही बताता रहता है कि आगे क्या करना है या क्या गलत है. बस यूं ही खराब करते, ठीक करते मैं कंप्यूटर से दोस्ती कर बैठा और नई-नई चीजें पढ़ने लगा. जो भी मुझे चीज पता करनी होती मैं गूगल पर टाइप कर देता. धीरे-धीरे सीखने लगा तो मजा भी आने लगा.
एक बार रात में मैं बच्चों ने कंप्यूटर पर बैठा हुआ पकड़ लिया. मैं बंद करने लगा तो बच्चों ने कहा कि “बंद क्यूं करो हो. हामनै बेरा सै अक तू रात नै चलावै सै.” 
7210 नोकिया के फोन के जरिए पहले-पहल उन्होंने अपने कंप्यूटर को इंटरनेट से जोड़ना शुरू किया था. वो 2जी का दौर था. 2014 से टच फोन लिया हुआ है. अब फोन पर ही ज्यादातर काम चल जाते हैं. इसलिए कंप्यूटर की कम ही जरूरत पड़ती है.
डिजिटल लेन-देन ही करते हैं बलवान शर्मा
नोटबंदी के समय जहां मजबूरी में लोगों ने डिजिटल सेवा सीखी या इस सेवा का इस्तेमाल करना शुरू किया, बलवान शर्मा उससे पहले से ही डिजिटल सेवाओं के जरिए अपने ज्यादातर काम करने शुरू कर चुके थे. 
बिजली बिल, खेत का बिल, डिस रिजार्च, फोन रिजार्ज, आढ़ती से लेन-देन, परचून के सामान में आदि सभी में वो पेटीएम के जरिए ही भुगतान करते हैं. केवल रेहड़ी वालों से जो फल, सब्जी आदि ही वो कैश देते हैं. उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि बहुत से लोग कैश में ही लेना चाहते हैं, क्योंकि इस तरह उन्हें टैक्स चोरी करने में आसानी होती है. पर मैंने तो ठानी हुई है कि ज्यादा से ज्यादा डिजिटल लेन-देन ही करना है. एक आम इंसान के स्तर पर मैं ऐसे ही देश की सेवा कर देता हूं. और मैंने अपने जीवन में कभी किसी को रिश्वत नहीं दी है. शुरू-शुरू में एक दिन का काम तीन-तीन दिन में होता था. अब जब मुझे जानते हैं तो जाते ही मेरा काम कर देते हैं यह कहते हुए कि “इस आफत नै टालो.”
गैस एंजेसी वालों के साथ का अपना अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि मैंने उनको कहा कि पैसा मैं पेटीएम से दे देता हूं. तो गैस एंजेसी वाले के लड़के ने कहा कि हम तो कैश लेते हैं. मैंने कहा कि मोदी तो कहते हैं कि कैश से कम से कम काम करो और आपका काम तो सरकारी है आप मना कैसे कर सकते हो. उसने मुझे कहा कि हम नहीं करते पेटीएम से. मैंने भी कहा कि ठीक है एसडीएम को फोन कर देता हूं और उसे ही पेटीएम से पैसे दे दूंगा. वो आकर आपको पैसे दे जाएगा. उससे ले लेना. ये सुनते ही उसके बाप ने कहा कि कर दे पेटीएम.
बलवान शर्मा जी खुद तो इन सभी सेवाओं का इस्तेमाल करते ही हैं, साथ में गांव वालों को भी डिजिटल सेवाओं से जोड़ रहे हैं. धीरे-धीरे लोग सीख भी रहे हैं और इस्तेमाल करना भी शुरू कर रहे हैं. 
नकली नोट बना प्रेरणा
एक बार बलवान जी के पास कहीं से हजार का नकली नोट आ गया. इन्होंने उसे बदलवाने के लिए बैंक वालों से बात की. बैंक वालों ने मना कर दिया. फिर इन्होंने बड़े लेनदेन करने वालों से बात की. उन्होंने भी मना कर दिया. किसी को चुपचाप चेंपने का इनका मन नहीं माना. फिर इन्होंने मन बनाया कि मैं तो जितना हो सकेगा, लेनदेन डिजिटल तरीके से ही किया करूंगा. थोड़ी बहुत जानकारी इन्हें थी ही. इसके बाद इन्होंने अपनी लगन से डिजिटल लेनदेन करना खुद ही सीखा और आज भी उतनी ही शिद्दत से वो नई चीजों को सीखने के लिए लालायित रहते हैं.
युवा दिन भर फोन तो चलाते हैं, पर उसके जरिए अपनी और अपने आसपास की जिंदगी को जिस दिन फायदा पहुंचाने लगेंगे, उस दिन देश में सच में डिजिटल क्रांति आ जाएगी. बलवान जी को यह देखकर दुःख होता है कि युवा केवल टाइम पास करते रहते हैं. फोन से अपने आपको और अपने परिवार व समाज को जोड़ने व मजबूती देने का काम कम कर रहे हैं. जो कि उन्हें करना चाहिए. 
मनोरंजन के तौर शतरंज खेलते हैं
बलवान जी के साथ गांव के कई लोग आपस में शतरंज खेलते थे. कंप्यूटर से जुड़ने के बाद मनोरंजन के तौर पर उस पर शतरंज खेल लेते हैं. गांव में ज्यादातर लोग जहां ताश खेलकर अपना समय गुजारते हैं, वहीं बलवान जी ने उसी समय में संचार क्रांति का हिस्सा बनकर खुद को मजबूत बनाया और अपने परिवार को डिजिटल तौर पर मजबूत किया. उनकी इस मजबूती का फायदा अब गांव को भी हो रहा है. अक्सर लोग उनसे कुछ पूछने व सीखने के लिए आते रहते हैं.
 


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