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नया हरियाणा

सोमवार , 17 दिसंबर 2018

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किसान कपंनियां बदलेंगी किसान परिवारों के हालात

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस बार के बजट में इन किसान कंपनियों को 5 साल तक के लिए 100 करोड़ तक के टर्न ओवर तक टैक्स स्लैब से बाहर रखा है. 

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2 फ़रवरी 2018

डॉ. नवीन रमण

ग्रामीण भारत में रहने वाली 70 फीसदी आबादी में बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है. वो मेहनत करते हैं खेतों में पैसे खर्च करते हैं, बावजूद इसके उन्होंने उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता क्योंकि लाभ का एक बड़ा हिस्सा बिचौलिए खा जाते हैं. ऐसा न हो इसलिए किसानों के समूहों का गठन कर कंपनियां बनाई जा रही हैं, ताकि किसान खुद अपनी उपज के मालिक बन सकें. किसानों के लिए बनाई गई ये कंपनियां, किसानों के लिए ही काम कर रही हैं और जो लाभ है वो भी किसानों को मिलेगा. नाबार्ड की कोशिश रंग लाई तो अब तक असंगठित किसान भी संगठित होंगे और बिचौलियों के हाथ की कठपुतली बनने से बच जाएंगे. किसान उत्पादक संगठनों के द्वारा अब किसान संगठित हो कर खुद के संगठन (जो कि कम्पनी या सहकारी समिति के रूप में) अपने उत्पादों को उचित दामो पर बेच सकेंगे.
दरअसल कम्पनी बन जाने के बाद किसानों को उत्पादन का लाभ दिलाने के लिए खरीदे गये माल की बिक्री देश की किसी भी मंडी में की जा सकेगी. खर्च काटने के बाद उसका पूरा लाभ किसानों को मिलेगा. देश की किसी भी कम्पनी से किसान बीज, खाद, कीटनाशक दवा सहित कृषि की जरूरतों का सामान मंगा सकता है, इससे किसानों को बहुत कम लागत में सामान मिलेगा. कंपनी की पूंजी के आधार पर भारत सरकार द्वारा भी सामान पूंजी की व्यवस्था अधिकतम 10 लाख तक की गयी है। कंपनी बनने के बाद किसानों का संगठन बीज से लेकर बाजार तक के क्षेत्र में काम कर सकेगा. शुरुआत में कंपनी में किसान जितने पैसे जमा करेंगे केंद्र सरकार उसी रकम के बराबर अपने पास से मदद देगी, ये मदद 10 लाख रुपये तक हो सकती है.

किसानों को अपनी फसल का उचित दाम जब मिलने लगेगा तभी जाकर किसानों की हालत में सुधार होने की संभावना है. सरकार की msp की नीतियों को देखते हुए सीधे-सीधे सरकार से कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है. ऐसे में सरकार द्वारा किसान कंपनियों को बढ़ावा देने की नीति एक कारगर कदम हो सकती है. यदि किसान इन कंपनियों के माध्यम से अपनी फसल को बाजार में सीधे उपभोक्ता तक पहुंचाकर उसकी वाजिब कीमत ले सकें.
किसान-दर-किसान यह काम करना मुश्किल है, क्योंकि व्यापार करने के लिए जो नियम कानून बनाए गए हैं, उनसे दिक्कत पैदा होती हैं. जबकि यदि कुछ किसान मिलकर कंपनी बनाएं तो यह काम आसान हो जाता है और भारतीय समाज की जो पारंपरिक पहचान रही है, सामुदायिकता के माध्यम से जीवन यापन करने की उसे एक बिजनस मॉडल तैयार किया जा सकता है.
हरियाणा, पंजाब व अन्य राज्यों में धीरे-धीरे इस तरह की किसान कंपनियां बनाई जा रही हैं, जो अभी अपने प्रांरभिक दौर में हैं. 
क्या करेंगी किसान कंपनियां
दरअसल किसान कंपनियां किसानों और उपभोक्ताओं के बीच बैठे बिचौलियों और मिलावट करने वाले को दूर करेंगी और उपभोकक्ताओं तक स्वास्थ्यवर्धक तथा जहरमुक्त सामान पहुंचाने का काम करेंगी. पहले वो अपने खेतों में पैदा हुई फसल को औने-पौने दामों पर बगल के कस्बे में बेच देते थे, लेकिन अब जो उनके खेत में उगेगा उसके रेट भी वो खुद तय करेंगे और उसकी बिक्री भी वो खुद ही करेंगे. यह मॉडल जब विकसित हो जाएगा तब किसान कंपनियां किसानों के खेत की सब्जी, फल, गेहूं और चावल आदि आपको बिग बाजार जैसे किसी मल्टीस्टोर में बिकते नजर आएंगे. इस मॉडल से खरीद और बिक्री की पूरी व्यवस्था बदल जाएगी. किसानों ने अलग-अलग अपनी प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बनाई हैं.

नाबार्ड के ‘कृषक उत्पादन विकास कार्यक्रम’ के सहयोग से बनाई गई ये कंपनियां अभी प्राथमिक स्टेज में हैं. इसमें किसान 1000रु निवेश करके इसका शेयर होल्डर बन जाता है. नए नियमों के अनुसार अब एक किसान कंपनी में 50 से ज्यादा शेयर होल्डर नहीं हो सकते हैं.
कंपनियों के कार्य
 ये कंपनियां अपने सदस्यों के लिए बाजार से खाद-बीज वगैरह सस्ती दरों पर खरीदने की कोशिश करती हैं.
 किसानों द्वारा उत्पादित उत्पादों को बेहतर मूल्य पर बेचने का प्रयास करेंगी.
 जैविक खेती को बढ़ावा देंगी और किसान की लागत को कम से कम करने की कोशिश करेंगी.
लागत कम हो जाए और फसल की कीमत ज्यादा मिल जाए तो किसान की आर्थिक स्थिति अपने आप सुधर जाएगी. जबकि आज के दौर में किसान फसल पर अपनी लागत बढ़ाता जा रहा है और सरकार की तरफ से उसे उचित दाम नहीं मिल पाता है. जिसके कारण किसान की स्थिति दिनप्रतिदिन खराब होती जा रही है. दूसरी तरफ यह किसानों को व्यापार करने की प्रणाली का हिस्सा बनाएंगी, जिससे किसान परिवारों में व्यापार के प्रति एक कल्चर बनेगा. जिसके परिणामस्वरूप सरकारी नौकरी की तरफ भागने की रफ्तार में कुछ कमी आएगी और यह धारणा ध्वस्त होगी कि खेती मुनाफे का काम नहीं है.
सबका साथ सबका विकास
सभी किसान साथ मिलकर काम करेंगे तो सभी का विकास होना संभव हो सकेगा. सबके साथ मिलकर काम करने से बड़ा फायदा होता हुआ कई कंपनियों में दिख भी रहा है। 
बीमा कंपनियों से संतुष्ट नहीं हैं किसान 
खेती का संकट बीमा बाज़ार के लिए मुनाफे का सौदा बनता दिख रहा है. किसानों की आत्महत्याओं, कृषि ऋण, प्राकृतिक आपदाओं और बढ़ती लागत के चलते खेती और खेतिहर समाज चिंता में है. क्योंकि उन्हें बीमा कंपनियां पारदर्शी तरीके से बीमा देने की कोई तकनीक विकसित नहीं कर पाई हैं. परिमियम लेते वक्त कंपनियां एक एकड़ को एक इकाई मानती हैं, जबकि नुकसान की भरपाई के लिए पूरे गांव को एक यूनिट मानती हैं. जो कि किसी भी तरह न्याय पूर्ण प्रणाली नहीं है.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार निजी बीमा कंपनियों ने माहौल बनाया था कि कृषि और फसल बीमा बहुत गंभीर और संवेदनशील विषय है. इसमें तय है कि जितने प्रीमियम का भुगतान किया जाएगा, उससे दावों की राशि कम से कम 200 प्रतिशत ज़्यादा होगी. ऐसे में अगले बीमा वर्ष में प्रीमियम की राशि में वृद्धि करना होगी; किन्तु खरीफ़ और रबी (2016-17) मौसम के आंकड़े बता रहे हैं कि एक बार फिर फसल बीमा का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है.इन दो मौसमों के लिए ताज़ा-ताज़ा बाज़ार में उतारी गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों, राज्य और केंद्र सरकार ने मिलकर कुल 20374 करोड़ रुपये प्रीमियम का भुगतान किया. इसके एवज में कुल 5650.37 करोड़ रुपये के दावे किया गए थे. इसमें से 65 प्रतिशत राशि (3656.45 करोड़ रुपये) के दावों का ही भुगतान किया गया.
अभी सरकार को यह जानने की ईमानदार कोशिश करना होगी कि जब किसान दर्द से दोहरा हुआ जा रहा है, पिछले साल कई राज्यों में सूखे और बाढ़ का संकट था, तब भी वहां बीमा लाभ के लिए किसानों के द्वारा दावे किया नहीं किए जा सके? क्या वास्तव में बीमा प्रक्रिया किसानों की पहुंच में है?
नया प्रयोग कर सकता है इन कमियों को दूर
इन कमियों के दूर करने के लिए कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं मिलकर एक नया प्रयोग कर रही है. जिससे किसानों और बीमा कंपनियों के बीच की दूरी को कम किया जा सके. 
चित्र आधारित बीमा परियोजना
तस्वीर आधारित बीमा में नामांकित रहने के लिए, wheat cam app पर बुवाई से कटाई तक एक सप्ताह में दो बार चयनित गेहूं के उस भूखंड के एक ही भाग की तस्वीरें नियमित रूप से लेनी हैं. केवल नियमित रूप से लेने वाले किसानों को ही भुगतान करने के लिए विचार किया जाता है. इन तस्वीरों को स्वतंत्र कृषिविज्ञानी और गेहूं विशेषज्ञों का एक समूह भेजे गए चित्रों की समीक्षा करता है. यदि विशेषज्ञों को लगता है कि चित्रों में गेहूं की फसल क्षतिग्रस्त है तो वे बीमा कंपनी से छुपा नहीं सकते, बीमा कंपनी इन दी गई दर में क्षतिपूर्ति के रूप में किसान को पैसे देगी.
0-20% पर 0
21-50% पर 3500रु
51-75% पर 6500रु
75-100% 10 हजार रु
इस प्रयोग को करने वाली सरकारी और गैर सरकारी संगठन- information food research institute(IFPRI http://www.ifpri.org/) borlaug institute for south asia(BISA http://bisa.org/), HDFC EGRO, KISAN SANCHAR, https://www.cabi.org/
किसान कंपनियां इन सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से इस नए क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं और अपनी समस्याओं के समाधान इन के माध्यम से खोज रही हैं. अगर ये कंपनियां कामयाब होंगी, तो धीरे-धीरे किसान जो अभी असंगठित क्षेत्र में हैं, वो संगठित क्षेत्र का हिस्सा बनकर खेती के कामकाज को मुनाफे के कामकाज में बदलने में कामयाब होंगे. दरअसल किसान कंपनियां डिजीटल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया के ही पार्ट के तौर पर बनकर उभर रही हैं.

दृश्य परियोजना

वाशिंगटन डी सी से अंतरराष्ट्रीय खाद्य संस्थान के रिसर्च फेलो बरबर क्रेमर आयी. इस परियोजना में  किसानों के खेतों को कंट्रोल रूम से देख कर किसानों को सलाह दी जाती है और टेस्टिंग की जाती है, प्रोजेक्ट दृश्य के सभी घटक प्रोग्रोवेर्स प्रोड्यूसर्स कंपनियों जिनमें तरवाड़ी करनाल, शिवशंकर वेजिटेबल प्रोड्यूसर्स कंपनी निजामपुर पानीपत, साढौरा किसान कंपनी यमुनानगर आदि के प्रतिनिधि शामिल हुए. कल पूरा दिन किसानों के साथ, बीड नारायणा गांव में किसानों के साथ इस सिस्टेम को तसल्ली से चेक किया गया ,किसान अश्वनी ने फीडबैक देते हुए कहा कि हम खेत का फोटो भेजने और एक्सपर्ट की सलाह ऑनलाइन भेजने के सिस्टम से उत्साहित जरूर हैं लेकिन संतुष्ठ नही हैं, अब हमें क्लोज़ अप पिक्चर भेजने के लिए वीडियो फैसिलिटी की आवश्यकता है। किसान अश्वविनी के इस सुझाव को सभी के द्वारा नोट किया गया और इसे ऐप्परिशिएट किया गया। कैब इंटरनेशल से आये साथी अरुण जाधव जी जो इस प्रोजेक्ट के टेक्निकल हेड भी हैं ने कहा के हम यह सिस्टम बहुत जल्दी बना देंगे।


किसान कपंनियों के सांझे कार्यक्रम की कुछ झलकियां

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