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नया हरियाणा

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

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ये महज जीत नहीं, व्यवस्था परिवर्तन पर जनता की मुहर

भाजपा ने साबित कर दिया कि वो शहरों और गांव दोनों जगह की पार्टी है.

जींद उपचुनाव, naya haryana, नया हरियाणा

1 फ़रवरी 2019



धर्मेंद्र कंवारी

कु छ तो लोग कहेंगे। उनका काम है कहना। भाजपा की जीत पर भले ही प्रदेश का तमाम विपक्ष बहाने बनाए, ईवीएम से लेकर जनता के फैसले तक पर उंगली उठाए, लेकिन ये सच है कि जींद उपचुनाव में भाजपा की जीत महज एक आंकड़ा नहीं है। असल में इस जीत से निकली बात दूर तलक जाएगी। आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव को ये सीधे-सीधे प्रभावित करेगी। भाजपा की उपचुनाव में जीत प्रदेश में व्यवस्था परिवर्तन और नीतियों पर जनता की मुहर है। प्रदेश सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में यह पहला उपचुनाव का मौका था। प्रदेश में सरकार बनाने से पहले भाजपा को केवल शहरों की पार्टी कहा जाता था। प्रदेश में जब सरकार बनी तो इसे मोदी का मैजिक कहा गया। नौकरियों में पारदर्शिता और ट्रांसफर पॉलिसी भाजपा सरकार लेकर आई तो कहा गया कि अब इस सरकार के मंत्री बैठकर मक्खियां मारेंगे। विपक्ष कहने लगा कि जब नौकरी ही नहीं दे सकते और ट्रांसफर ही नहीं करवा सकते तो कौन पूछेगा इन्हें? कुछ-कुछ दिखाई भी ऐसा ही दे रहा था कि सरकार जनता में अलोकप्रिय होती जा रही है। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के यहां भीड़ कम दिखाई देने लगी थी।  
पर, सरकार अलोकप्रिय है या जनता के मन में बैठी है तो इसे मापने का बस एक ही पैमाना है और वो है चुनाव। परीक्षा की घड़ी चंद महीने पहले तब आई जब पांचों नगर निगमों के चुनावों से सामना हुआ। ये कहा कहा गया कि मेयर के चुनाव भी सीधे जनता के वोट द्वारा करवाने का फैसला लेकर बीजेपी ने पांव पर कुल्हाड़ी नहीं बल्कि कुल्हाड़ी पर ही पांव मारा है। खैर, करनाल, हिसार, रोहतक, पानीपत और रोहतक में नगर निगम के चुनावों की रणभेरी बजी। भाजपा हमेशा की तरह सिंबल पर लड़ी और कांग्रेस के क्षेत्रपों ने अपने अपने उम्मीदवार उतारे। मुकाबला आमने-सामने का दिखा, लेकिन पांचों जगह पर बीजेपी के उम्मीदवारों को ही जीत मिली। हालात ये हुए कि कांग्रेस जिसे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ माना जाता है और हिसार जहां कुलदीप बिश्नोई खुद को बड़ा असरदार मानते हैं वहां भी मतदाताओं ने कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को बुरी तरह नकार दिया। ये उपचुनाव सीधे सीधे विधानसभा की दो दर्जन सीटों व चार लोकसभा क्षेत्रों से भी जुड़ा हुआ था। 
जीत पर भाजपा ने कहा कि वो जीते हैं इसका मतलब जनता उन्हें चाहती है। विपक्ष ने कहा, हम तो पहले ही कहते थे भाजपा तो शहरियों की पार्टी है, गांव में नहीं जीतेगी। खैर, इसके बाद वो दिन भी आ गया जिसका विपक्ष को बेसब्री से इंतजार था। डॉ. हरिचंद मिढा के निधन के बाद इनेलो की यह सीट खाली हो गई। उपचुनाव की घोषणा से पहले ही उनके बेटे कृष्ण मिढा भाजपा के पाले में चले गए। भाजपा ने उन्हें ही अपना उम्मीदवार बनाया, कांग्रेस ने सबसे बड़ा दांव खेलते हुए राहुल के सिपहसालार रणदीप सुरजेवाला को ही मैदान में उतार दिया। उनकी जीत का जिम्मा लगाया भूपेंद्र सिंह हुड्डा, अशोक तंवर, कुलदीप बिश्नोई समेत तमाम कांग्रेस धड़ों पर। इनेलो से अलग होने के बाद बनी जन नायक जनता पार्टी का यह पहला चुनाव था और दिग्वजय को ही उन्होंने चुनाव में मैदान में उतार दिया। मुकाबला शुरुआत में तिकौना, लेकिन धीरेधीरे रणदीप दौड़ से बाहर होते गए, उनकी गाड़ी के ब्रेक जमानत जब्त के नजदीक जाकर मुश्किल से ही लगे। भाजपा ने ये उपचुनाव भी जीत लिया है और उस बात पर मनोवैज्ञानिक जीत हासिल की है कि भाजपा सिर्फ शहरों में जीत सकती है। निश्चित रूप से इस जीत के बाद भाजपा आत्मविश्वास से लबरेज है। यह असर लोस और विस चुनाव में भी दिखाई देगा।

धर्मेंद्र कंवारी हरियाणा के लोकप्रिय लेखक एवं पत्रकार हैं.

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