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नया हरियाणा

सोमवार , 26 अक्टूबर 2020

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जींद की जनता ने दिया जनादेश का संदेश

मायावती की रणनीति में शायद लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी ज्यादा मुफीद बैठे।

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1 फ़रवरी 2019



राजकुमार सिंह

जींद विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की जीत में संदेह नहीं था, पर इतनी बड़ी जीत की उम्मीद खुद उसे भी नहीं थी। बहुकोणीय मुकाबले में अकसर हार-जीत का अंतर कम हो जाता है, लेकिन पहली बार जींद जीतनेवाली भाजपा ने डेढ़ महीने पहले बनी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) से 12930 वोट ज्यादा पा कर जीत हासिल की, जबकि देश की सबसे पुरानी और हरियाणा पर लंबे समय तक राज करनेवाली पार्टी कांग्रेस बमुश्किल अपनी जमानत ही बचा पायी। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब ग्रामीण क्षेत्र के मुकाबले शहरी क्षेत्र में, जो कि भाजपा का आधार माना जाता है, में कम मतदान हुआ हो। वैसे भाजपा को ग्रामीण क्षेत्र में भी अच्छे वोट मिले, जिसका बड़ा कारण शायद कांग्रेस और इनेलो का खराब प्रदर्शन रहा। दरअसल जिस इनेलो के विधायक हरिचंद मिड्ढा के निधन के चलते उप चुनाव हुआ, उसका प्रदर्शन सबसे शर्मनाक रहा। जींद में कुल पड़े 130859 मतों में से इनेलो-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार उमेद रेढू को महज 3454 वोट मिले। इससे कहीं बेहतर प्रदर्शन भाजपा से इस्तीफा दिये बिना ही अलग लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी बना लेनेवाले सांसद राजकुमार सैनी के उम्मीदवार विनोद आसरी का रहा, जिन्हें लगभग 10 प्रतिशत मत मिले। मतगणना के दौरान और परिणाम की घोषणा के बाद भी ईवीएम पर सवाल उठाये गये हैं, लेकिन इस हाई वोल्टेज उप चुनाव में हार-जीत का अंतर इतना ज्यादा है कि जनादेश को समझने में गलतफहमी की गुंजाइश ही नहीं। भाजपा ने दिवंगत इनेलो विधायक हरिचंद मिड्ढा के बेटे कृष्ण मिड्ढा पर जो दांव लगाया, वह अंतत: सफल रहा। इनेलो में पारिवारिक कलह के चलते जो विभाजन हुआ, उसमें इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उसके परंपरागत वोटों में से भी कुछ, सहानुभूतिवश ही सही, भाजपा उम्मीदवार को मिले होंगे। फिर भी भाजपा की जीत का असली श्रेय उस जुनून को जाता है, जिससे पार्टी और मनोहरलाल खट्टर सरकार ने यह उप चुनाव लड़ा। पंजाबी उम्मीदवार को टिकट दिये जाने से वैश्य समुदाय की नाराजगी दूर करने के लिए भाजपा ने जिस तरह दिन-रात कवायद की, वह चुनाव प्रबंधन की मिसाल भी है।
इस लिहाज से कांग्रेस का चुनाव प्रबंधन कमजोर नजर आया। प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को अपवाद मान लें तो अन्य कांग्रेसी दिग्गज सैलानियों की तरह बीच-बीच में आते-जाते रहे। कैथल से विधायक होते हुए भी जींद की जंग में उतरे रणदीप सुरजेवाला तो नहीं मानेंगे, पर उनकी स्थिति महाभारत के अभिमन्यु-सी थी। यह रणदीप ही बेहतर जानते होंगे कि कम समय में बड़ी छलांग की महत्वाकांक्षा के वशीभूत खुद उन्होंने यह स्थिति स्वीकार की या फिर विरोधियों की चक्रव्यूह रचना में फंस गये। चुनाव प्रबंधन के मामले में जेजेपी भी पीछे नहीं रही।
पिछले 9 दिसंबर को ही अस्तित्व में आयी जेजेपी ने परिवारवाद के आरोप का जोखिम उठाते हुए भी दिग्विजय चौटाला को चुनाव मैदान में उतारा। जाहिर है, काडर इनेलो का असंतुष्ट वर्ग ही था, लेकिन सांसद भाई दुष्यंत और मां नैना चौटाला ने शुरू से आखिर तक ऐसा मोर्चा संभाला कि इनेलो-बसपा गठबंधन ही नहीं, कांग्रेस को भी मुकाबले से बहुत पीछे धकेल दिया। राजनीति में अपेक्षाकृत नवागत दुष्यंत के पास जिस तरह हर गांव में अपने संभावित वोटों की संख्या और समीकरण का आंकड़ा तैयार रहता था, वैसा बहुत कम देखने में आता है। शायद इस आधुनिक चुनाव प्रबंधन के कारण भी अनुभवी चाचा अभय सिंह चौटाला अपने भतीजों से मात खा गये। निश्चय ही बहुमतवाली सरकार के राज में एक उपचुनाव परिणाम का खास महत्व नहीं होता। तब तो और भी नहीं, जब नये विधानसभा चुनाव चंद महीने दूर हों, लेकिन इससे हरियाणा का राजनीतिक परिदृश्य दिलचस्प निश्चय ही हो गया है। इस सच को भाजपा शायद ही स्वीकार करेगी कि हरियाणा के गैर जाट मतदाताओं ने 2014 में पहली बार उसे अपनी पहली पसंद बनाया था। जींद उपचुनाव ने फिर उसकी पुष्टि कर दी है। कुछ राजनीतिक प्रेक्षक इसे जाट-गैर जाट राजनीति के रूप में भी देख रहे हैं, जो शुभ तो नहीं मानी जा सकती, लेकिन भाजपा के लिए फिलहाल विजयी समीकरण नजर आती है। वैसे जींद के जनादेश के कुछ तात्कालिक राजनीतिक प्रभाव दिख सकते हैं। मसलन, कांग्रेस आलाकमान पर राजनीतिक-रणनीतिक फैसलों का दबाव बढ़ सकता है। इनेलो से गठबंधन पर बसपा पुनर्विचार कर सकती है। जेजेपी को उम्मीद है कि आम आदमी पार्टी की तरह बसपा भी उसके साथ आ सकती है, लेकिन मायावती की रणनीति में शायद लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी ज्यादा मुफीद बैठे। अगर ऐसा हुआ तो हरियाणा एक और सामाजिक-राजनीतिक प्रयोग का साक्षी बनेगा, जिसके नतीजे चौंकानेवाले निकल सकते हैं।

राजकुमार सिंह, दैनिक ट्रिब्यून समाचार पत्र में संपादक हैं.


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