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नया हरियाणा

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

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...बहुत बेरहम है बांगर की यह जमीन

जींद कैथल का इलाका बांगर का इलाका कहा जाता है।

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1 फ़रवरी 2019



मनोज ठाकुर

जींद कैथल का इलाका बांगर का इलाका कहा जाता है। यहां का सियासी मिजाज खासा खुश्क है। सियासत में यहां   किसी पर दया नहीं करते।  इल्तुतमिश की पुत्री  रजिया सुलतान ने दिल्ली की सत्ता संभाली। जब वह लड़ाई में हार कर बांगर की जमीन पर पहुंची तो यहां उसकी हत्या कर दी थी।  आज जींद उपचुनाव के परिणाम में बरबस ही इतिहास का यह किस्सा याद आ रहा था। बहरहाल भाजपा ने चुनाव जीत लिया। जीतना ही था। वजह साफ थी। बीजेपी अब उत्साहित हो सकती है। बीजेपी को नान जाट पार्टी कहने वाले भी अब बोलने से पहले थोड़ा सोचेंगे। सीएम मनोहर लाल आज खासे खुश होंगे। क्योंकि जींद में पहली बार कमल खिला है। अब भले ही प्रत्याशी उधार का था। कह सकते हैं यह सरकारी नीतियों की जीत है। उनके कहने की वजह भी है।  मौका भी है।  और दस्तूर भी। बीजेपी अब लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव में जा सकती है। पार्टी इसके लिए तैयारी कर रही है। बीजेपी के लिए यह जीत ऐसे मौके पर आयी, जब पार्टी विधानसभा के लिए तैयार हो रही है। निश्चित ही इससे भाजपा का मनोबल बढ़ा है। इसके साथ ही वह वोटर्स जो बीजेपी से छिटक रहे थे, वह पार्टी पर वापस आ सकते हैं। बीजेपी ने उपचुनाव जीत का निश्चित ही बड़ी सफलता हासिल की है।सीएम अब गंभीर रणनीतिकार भी बन गए हैं। ऐसा उनके समर्थक बोल सकते हैं। 
कांग्रेस इनेलो के लिए झटका 

कांग्रेस पार्टी 

कांग्रेस के लिए उपचुनाव बड़ा झटका है। पहला मौका है जब सारे कांग्रेसी एकजुट नजर आए। लेकिन यह एकता संतरे की फांक की तरह साबित हुई।  उनके राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला उपचुनाव हार गए। प्रदेश की राजनीति में लगातार हाशिये की ओर जा रही कांग्रेस अब कैसे संभलेंगी। यह बड़ा सवाल है। हो सकता है प्रदेशाध्यक्ष बदल दें। हो सकता है। कुलदीप बिश्नोई को यह पद दिया जा सकता है।  पूर्व सीएम भूपेंद्र िसंह  हुड्डा कुछ और ज्यादा साइड लाइन हो जाए। बड़ी बात यह है कि कांग्रेस को अपनी सोच बदलनी होगी। जो शायद बदलने के तैयार नहीं है। अब यदि कांग्रेस के नेताओं ने अपनी सोच नहीं बदली तो हरियाणा में भी कांग्रेस का यूपी वाला हाल हो सकता है।

तंवर: प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते हार पर उनकी जिम्मेदारी बनती है। उनकी परेशानी यह है कि लंबे समय से प्रदेशाध्यक्ष पद पर रहने के बाद भी अपनी टीम ही उनके पास नहीं है। वह अच्छा बोलते हैं। यह एक गुण हो सकता है। लेकिन वह चुनाव जिताने की क्षमता नहीं रखते। उन्हें इसके लिए सोचना होगा। वह पार्टी को एकजुट करने में नाकामयाब रहे हैं। सीनियर नेता उन्हें प्रदेशाध्यक्ष नहीं मान रहे। यह क्यों है? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्योंकि पार्टी में अनुशासन लाना उनकी जिम्मेदारी बनता है। यदि अनुशासन नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी तंवर को लेनी होगी। 

हुड्डा: वह भले ही यह कहे कि उपचुनाव सरकार जीतती है। यह हार को पचाने का एक तरीका हो सकता है। लेकिन यह विशुद्ध गैर राजनीतिक सोच है। क्योंकि हुड्डा पर यह ठप्पा लग रहा है कि वह सिर्फ रोहतक के आस पास के लीडर है। वह पूरे हरियाणा के लीडर नहीं है। इस वक्त जब सबसे ज्यादा हुड्डा दाव पर है, जमीन घोटालो में सीबीआई उन पर लगातार दबाव बना रही है। जींद उपचुनाव के दौरान सीबीआई ने छापेमारी की। ऐसे में हुड्डा को यह उपचुनाव जीतने के लिए जी जान लगानी चाहिए थी। जो वह नहीं कर सके। यदि वें ऐसा करते तो न सिर्फ पार्टी को मजबूत करने में योगदान देते बल्कि खुद के लिए भी ताकत मिलती। 

रणदीप सुरजेवाला: निश्चित ही उन्हें निराशा हाथ लगी। राहुल की टीम का सदस्य चुनाव हार जाए। हारना तो फिर भी समझ में आता  है, तीसरे नंबर पर रहे। हुड्डा के बाद यदि कांग्रेस में यदि सीएम पद का कोई दूसरा दावेदार नजर आता है तो वह रणदीप है। लेकिन वह भी मौका चूक गए। कैथल के साथ ही जींद लगता है। फिर ऐसा क्या हुआ वह दिग्विजय से मात खा गए। रणदीप की दिक्कत  यह है कि वह भी टीम बनाने में ज्यादा यकीन नहीं रखते। बाकी कांग्रेसियों को साथ जोड़ने में नाकामयाब रहे। कहना नहीं होगा कांग्रेस का सर्वमान्य नेता बनने का मौका वह चूक गए। 

 कांग्रेस में नयी संभावनाएं 
कुलदीप बिश्नोई मेन स्ट्रिम में आ सकते हैं। उन्हें पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का पद भी दे सकती है। पार्टी के अंदर गुटबाजी खत्म करने के लिए बड़े कदम उठाए जा सकते हैं। इसमें हुड्डा की चुनौती बढ़ सकती है। रणदीप सुरजेवाला यदि हार को सही से जस्टिफायी करने में कामयाब रहे तो पार्टी में फिलहाल उनका रूतबा कायम रह सकता है। तंवर को निश्चित तौर पर अपने काम करने का तरीका बदलना चाहिए। 

जींद में तो इनेलो का सफाया हो गया। 
कुछ नेता अभी जेजेपी में जाने की सोच रहे थे, लेकिन द्वंद में थे। अब इनेलो में टूट तेजी से बढ़ सकती है। इनेलो के लिए यह सबसे मुश्किल समय है। शायद ऐसा वक्त तब भी नहीं आया था जब पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला जेल गए थे। तब भी पार्टी के भीतर असंतोष नहीं था। इस बार पार्टी में असंतोष है। कार्यकर्ता और नेता टूट रहे हैं। इनेलो की ताकत ग्रामीण वोटर है। जींद में जिस तरह से बीजेपी लगतार जेजेपी के साथ मुकाबला करती नजर आई, इससे इनेलो के वोट बैंक में भाजपा ने सेंध लगाई है। भाजपा को दक्षिण हरियाणा में नेता चाहिए। जेजेपी को भी नेताओं की तलाश है। ऐसे में इनेलो में टूट बढ़ सकती है। 

अभय चौटाला : उन्हें अपनी रणनीति पर विचार करना होगा। पार्टी कैसे एकजुट रहे, इसके लिए नई सोच के साथ आगे बढ़ना होगा। अन्यथा आने वाला समय उन्हें साइड लाइन कर सकता है। उन्हें विचार करना होगा कि कैसे पार्टी अब एकजुट रह सकती है। पिहोवा के  विधायक जसविंद्र संधू का भी निधन होना भी बड़ा झटका है। अभय को यह भी समझना होगा कि अब दिग्विजय और दुष्यंत को गरिया कर काम चलने वाला नहीं है। 

इनेलो के लिए संभावना 
बीजेपी के साथ गठबंधन किया जा सकता है। भले ही बीजेपी ने जींद जीत लिया, लेकिन दक्षिण हरियाणा को मजबूत करने के लिए जाट लीडर चाहिए। यह कमी इनेलो पूरी कर सकती है। यह गठबंधन दोनों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है। इससे जहां इनेलो जेजेपी को रोकने में कामयाब हो सकती है, वहीं भाजपा भी जाट मतदाता को अपने साथ कुछ हद तक ही सही जोड़ने में कामयाब तो हो ही सकती है। 

जेजेपी निश्चित ही बड़ी सफलता है 
हार के भी जीत गए दिग्विजय। निश्चित ही। यह युवा टीम की जीत है। बदलाव की जीत है। परिवार से लड़ कर, दादा  दादी की आलोचना सह कर दूसरे नंबर पर रहना निश्चित ही बड़ी बात है। जेजेपी अब इनेलो और कांग्रेस को प्रदेश की राजनीति में हाशिये की ओर धकेल सकती है। यह कुव्वत इस पार्टी में है। साथ में उनके साथ आम आदमी पार्टी भी है। आम आदमी पार्टी को क्योंकि एक सुलझा हुआ नेता चाहिए। जो जाट भी हो। यह कमी दिग्विजय और दुष्यंत की पार्टी पूरी करती नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव में यदि यह गठबंधन यूं ही बना रहा तो काफी हैवीवेट साबित हो सकता है।  

दिग्विजय चौटाला: हारे क्यों? यह सोच का विषय है। युवा टीम है। अनुशासन का अभाव है। राजनीतिक तजुर्बा नहीं था। यहीं वजह रही कि अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी हार मिली। कुछ सीनियर लीडर चाहिए, कुछ वरिष्ठ सलाहकार साथ होने चाहिए। जो जेजेपी के पास नहीं है। दुष्यंत चौटाला भले ही सांसद है, लेकिन वह अभी इस स्टेज पर नहीं है कि हरियाणा के लीडर बन जाए। इसके लिए उन्हें काम करना होगा। 

संभावना: ऐसे लीडर जो इनेलो छोड़ कर इधर उधर चले गए थे, वह अब जेजेपी में आ सकते हैं। आम आदमी पार्टी से गठबंधन हो सकता है। लेकिन यह रिस्की भी साबित हो सकता है। पार्टी को मजबूती मिलेगी, क्योंकि बड़ी संख्या में कार्यकर्ता जेजेपी के साथ जुड़ सकते हैं। 

और अंत में  भाजपा 
भाजपा में मनोहर लाल एक बार फिर से मजबूत हुए हैं। चुनाव के दौरान चुनाव के बाद सिर्फ उनका ही नाम आगे रहा। यानी सरकार में जो उनकी टांग खींचने वाले थे, अब वह चुप होने में ही अपनी भलाई समझेंगे। भाजपा के समर्थकों का उत्साह बढ़ेगा। निश्चित ही नए मतदाता भी जुड़ सकते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो कुछ बाहरी नेता जो पिछले लोकसभा व विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा में आए थे, अब वें जाने की सोच रहे थे। उनके कदम इस जीत से जरूर ठिठक रहे होंगे। कुरुक्षेत्र के   सांसद राजकुमार सैनी भी अब अपने भविष्य का गुणाभाग कर रहे होंगे। 

संभावनाएं 
तुरंत लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव घोषित कर देने चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो जींद में दूसरे नंबर पर रहने का लाभ जेजेपी उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। इस वक्त भाजपा के पक्ष में माहोल बना हुआ है। यह लंबे समय तक बना रहेगा इसकी गारंटी नहीं है। इसलिए भाजपा के पास यहीं मौका है।     पार्टी मजबूत हुई, लेकिन पंजाब वाली गलती कर सकते हैं। जिस तरह से लोकसभा चुनाव जीतने और हरियाणा विधानसभा में जीत हासिल करने के बाद भाजपा ने पंजाब में अकाली गठबंधन को एक समय के लिए छोड़ने की सोच चल निकली थीी। इस तरह की सोच हरियाणा में भारी पड़ सकती है।

मनोज ठाकुर हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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