Privacy Policy | About Us | Contact Us

नया हरियाणा

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

पहला पन्‍ना English सर्वे लोकप्रिय हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप

बेरोजगारी : एक बुलावैं, तेरह आवैं का क्या होगा समाधान

पार्टियों के पास वादे तो हैं, इरादे नहीं है और न इस समस्या का कोई ठोस समाधान है.

unemployment issue, naya haryana, नया हरियाणा

30 जनवरी 2018

नया हरियाणा

बेरोजगारी की समस्या आज के दौर की ही समस्या नहीं है, बल्कि इसका इतिहास भी काफी पुराना है. इस समस्या को समय-समय पर उठाया तो गया है, पर इसका समुचित समाधान आज तक का कोई शासन नहीं ढूंढ पाया है. सरकार के पास बहाने होते हैं और विपक्ष के पास उसे घेरने का यह हथियार मात्र बनकर रह गया है. भारत के युवाओं को यह समझना होगा कि सरकारी नौकरियों के भरोसे न रहकर स्व-रोजगार पर केंद्रित होना होगा, वरना सरकार और विपक्ष दोनों उनकी भावनाओं का दोहन करते हुए हर बार अपनी सरकार बनाकर भूल जाया करेंगे. आखिर बेरोजगारी जैसी जटिल समस्या का क्या समाधान हो सकता है?

मध्यकाल के पूर्व के उद्धरण तो याद नहीं हैं,लेकिन उसके बाद यानी आज के लगभग 500 साल पूर्व गोस्वामी तुलसीदास जी ने जो कहा था ,उसे मैं आपके सामने रख रहा हूँ।वो काल मुगलों का था। -
"खेती न किसानी को, भिखारी को न भीख बनी
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी
जीविका विहीन लोग ,सिद्धमान सोच वश
कहें एक एकन से कहाँ जाईं का करीं."


मुग़ल काल में ये नारा प्रचलित था कि अगर आपको फ़ारसी पता है तो आप दरबारी यानी ब्यूरोक्रेट हो सकते हैं।लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी थे तब जो फ़ारसी पढ़ के भी बेरोजगार थे ।तभी तो ये वाक्य प्रशिद्ध था उन दिनों -
"पढ़े फ़ारसी बेचे तेल
ये देखो कुदरत का खेल."


अंग्रेजों के समय में भी हालात वैसे ही थे जैसे मुगलों के काल में या आज के समय में . 19 सदी के आखिर में भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी की ये मुकरी बड़ी चर्चित हुई थी -
"तीन बुलावें, तेरह आवें
निज निज विपदा रोइ सुनावें
ऑंखें फूटीं, भरा न पेट
को सखी साजन
नहीं ग्रेजुएट."
अर्थात तब भी हालात वही थे।
लब्बो लुआब ये है कि हालात वही हैं, जब हम गुलाम थे तब भी और जब हम आजाद हैं तब भी।
न जाने क्यूँ आज अब्राहम लिंकन के गेटिसबर्ग स्पीच में 1865 में दिए गए लोकतंत्र की परिभाषा को फिर से दोहराने का मन कर रहा है -
जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए ..मतलब है क्या कोई इस विश्वप्रसिद्ध परिभाषा का .....??
अब "वो सुबह कभी तो आएगी " का इन्तजार तो किया जा सकता है।तब तक भारतेन्दु जी की इन पंक्तियों का आनंद ले सकते हैं जो उन्होंने अंग्रेजों के टाइम में लिखा था-
"आवहुँ सब मिली रोवहुं भाई
हा हा भारत दुर्दशा देखि न जाइ."


बाकी समाचार