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थैँक्स भंसाली, जिद पाले रखिए ताकि समाज कबीलों में तब्दील होने से बचा रहे

पद्मावत फिल्म पर वाद-विवाद के बीच मनोज ठाकुर ने फिल्म पर विश्लेषण किया है.

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30 जनवरी 2018

मनोज ठाकुर

पद्मावत क्या विरोध करने वालों ने देखी है? नहीं? तो एक बार देखिए। सीने पर हाथ रख कर सोचिए। अपने बारे में।अपने विरोध के बारे में। क्या गलत है इस फिल्म में। विवेक लगाए। राजपूत समुदाय पर इतनी अच्छी फिल्म मैंने तो कम से कम आज तक नहीं देखी। मैं तो हिंदी फिल्मों के ठाकुर को मुझकों राणा जी माफ करना टाइप गुंडे ठाकुर की छवि में ही देखता आया हूं। इस बार राजपूत समुदाय के बारे मे कुछ अच्छा दिखाया। फिर भी विरोध है। किस बात का विरोध है। क्या विरोध है। भेड़चाल इसे ही कहते हैं। विरोध करने वाले भेड़चाल में फंस गए। चरवाहे उन्हें हांक ले गए। वे हंकते रहे। वाह क्या खूब। फिर गर्व करते हो अपने विवेक पर। सोचिए आप कहा जा रहे हैं। दुनिया हंस रही होगी आप पर। कम से कम जो फिल्म देखकर आया वह तो यहीं सोच रहा होगा। सोचना भी चाहिए।

है क्या इस फिल्म में जिस पर विरोध हो

आखिर इस फिल्म में ऐसा है क्या? जिसका विरोध हो। क्या एक महिला का अपने पति को खिलजी की कैद से छुड़ाना। यह आपको रास नहीं आ रहा। क्यों? क्या आप अपनी बेटियों को बहादुर नहीं मानते? मैं देख रहा था करनाल में इस फिल्म के विरोधप्रदर्शन के लिए राजपूत समुदाय की कुछ लड़कियां भी आई थी। उनके हाथों में तलवार थी। मैं खुश था। कम से कम इसी बहाने यह लड़कियां घर की देहरी को लांघ कर बाहर तो आई। तलवार तो उठाई। फिर जब विरोध करने वाली राजपूत समुदाय की लड़कियां तलवार उठा सकती है, हम ऐसा क्यों सोच रहे एक रानी अपने पति को बचाने के लिए दुश्मन के किले में जाने का सहास नहीं कर सकती।

विरोध को खिलजी के वंशजों को करना चाहिए

भंसाली ने इस फिल्म में खिलजी की तो ऐसी की तैसी करके रख दी। उसे दरिंदा दिखाया, बलात्कारी दिखाया। कोई कितना भी बड़ा वहशी दरिंदा हो, कम से कम अपनी शादी के जश्न में बलात्कार नहीं करता। भंसाली ने यह दिखाया। जो गलत है। एपिक और फिक्शन में जब आप घालमेल करते हैं तो ऐसी गलती हो जाती है। इधर भंसाली बाबू तो राजपूत समुदाय से डरे हुए लग रहे थे। पूरी फिल्म में उनका यह डर पर्दे पर साफ नजर आ रहा था।

तकनीक तौर पर फिल्म खास नहीं है

मैंने बाहुबली फिल्में बार बारदेखी। हर बार मुझे इसमें नया देखने को मिला। लेकिन भंसाली ऐसा कुछ नहीं कर पाए कि मैं यह फिल्म दोबारा देखने जाउं। कैमरे, कहानी और किरदार के खाके में फिल्म फिट नहीं बैठ रही। पहला फिल्म का पहला हॉफ तो इतना बारिंग है कि यदि इस फिल्म का इतना विरोध न होता तो मैं बाहर ही आ जाता। यहीं देखने के लिए कुर्सी पर चिपका रहा कि पता तो चले भंसाली ने क्या गुस्ताखी कर दी। फाइट सीन बहुत ही बेकार है। लड़ाई जैसा कुछ लगा ही नहीं। फिल्म के श़ुरुआत में खिलजी जब मंगोलो को हराता है तो सिर्फ धूल का गुब्बार नजर आता है। यह गलत है। बाहुबली में जिस तरह से उस जंगली राजा ने बाहुबली और उसके भाई को ललकारा वह मजेदार था। यहां ऐसाकुछ नहीं था। भंसाली की पद्मावत एडिटिंग अच्छी नहीं है। रणवीर ने अपने किरदार को बखूबी निभाया। शहीद ने निराश किया। पद्मावत के किरदार के साथ दीपिका जमी नहीं। बाहुबली टू की देवसेना मुझे लगता है अच्छे से निभा सकती थी। मुझे लगता है बाहुबली ने एक लाइन खींची है, जिसे भंसाली पार करना तो दूर उस लाइन तक पहुंच भी नहीं पाए। माइली का निर्देशन इस फिल्म में होता तो शायद बात बन जाती। मेरा तो यह भी मानना है कि बाहुबली के अभिनेता ही यदि इस फिल्म में होते तो संभव है यह फिल्म मिल पत्थर साबित होती। अफसोस ऐसा हो न सका। वीएफएक्स ने इस फिल्म को संवारने की बजाय खराब किया है।

आप फिल्म देखिए, क्योंकि आप इसके विरोधी है

आपने विरोध कर गलत किया। आपका विरोध सही नहीं है। आप इस फिल्म को देखिए, सोचिए। आपने क्या गलत किया। यदि आप खुद को बहुत परंपरावादी और सर्वश्रेष्ठ मानते हैं तो फिल्म देखिए और यदि कर सकते हैं तो भंसाली से माफी मांग ले।

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