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नया हरियाणा

सोमवार , 26 अक्टूबर 2020

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बांगर की चौधर विकास की चौधर कब बनेगी

साल 1966 में हरियाणा के पहले 7 जिलों में जींद भी एक जिला बना था. जो केवल राजनीति व रैलियों का ही गढ़ बन कर रह गया.

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25 जनवरी 2019



नया हरियाणा

जींद उपचुनाव में आज हर राजनीतिक दल जींद के विकास को लेकर बड़े-बड़े वादे कर रहा है, पुरानी सरकारों पर विकास न कर पाने के आरोप गढ़ रहा है. लेकिन यदि जींद के सियासी इतिहास में झांक कर देखा जाए तो रियासत के दौर से ही जींद पिछड़ेपन की अपनी दास्तां बयां करता नजर आता है. 18 वीं शताब्दी में 1763 रियासत जींद के पहले राजा गणपत सिंह ने संगरूर से बदलकर जींद को रियासत की राजधानी बनाने के साथ यहां पक्की ईंटों का किला बनवाया था. किंतु बाद के राजाओं ने केवल आराम घर बनवाने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखा. सरस्वती नदी, तीर्थों का संगम जींद महाभारत का दक्षिणी द्वार कहलाता है. यहां पर पांडवों की सेना ने अपने पड़ाव डाले थे और यहीं से युद्ध की शुरुआत भी की थी. एकता और सियासत की हमेशा यहां चर्चा होती रही है. बावजूद इसके जींद अपना पिछड़ापन दूर नहीं कर सका.
साल 1966 में हरियाणा के पहले 7 जिलों में जींद भी एक जिला बना था. जो केवल राजनीति व रैलियों का ही गढ़ बन कर रह गया. बांगर की इस धरा पर चौधरी दलसिंह, चौधरी देवीलाल, चौधरी बंसीलाल के अलावा चौधरी बिरेंदर सिंह, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और ओम प्रकाश चौटाला जैसे सभी दिग्गजों ने जींद की भूमि से अपनी राजनीतिक भूमि तो तैयार की लेकिन जींद को उसके पिछड़ेपन से दूर नहीं कर पाए. आज इसी पिछड़ेपन को विकास की चादर उड़ाने की बात करते नजर आ रहे सभी नेता जींद उपचुनाव में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करते दिखाई दे रहें हैं.
जिले से न्याय युद्ध की शुरुआत करके चौधरी देवीलाल भारत के उपप्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए तो नरवाना से विधायक बनने पर ओम प्रकाश चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री बने. गांव कंडेला से पदयात्रा शुरू करने वाले सांसद भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी मुख्यमंत्री बने. भाजपा सरकार में केंद्रीय इस्पात मंत्री बीरेंद्र सिंह इस क्षेत्र का हमेशा प्रतिनिधित्व करते रहे. लेकिन विकास को लेकर राजनीति का कद कभी नहीं बढ़ा. काफी संख्या में प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री देने वाला जींद जिला अन्य जिलों से लगातार पिछड़ता ही रहा है. लोगों के अनुसार प्रदेश के 22 जिलों में नूंह के बाद कई क्षेत्रों के पिछड़ेपन में जींद दूसरे नंबर पर है. परंतु रैलियों और राजनीतिक चर्चाओं, सड़कों व रेलवे लाइन पर जाम लगाने में नम्बर वन रहा है.
साल 2014 में पूर्ण बहुमत से बनी भाजपा सरकार भी 'अच्छे दिन आएंगे' के चुनावी वादे के साथ सत्ता पर आसीन तो हुई लेकिन कुछ खास बदलाव नहीं कर सकी. 
सभी पार्टियां विकास-विकास की रट लगाती नजर आती हैं जैसे मुर्गा अब केवल सुबह ही नहीं दोपहर-शाम और रात को भी कूकडू-कू करता सुनाई देता है उसी तरह ये पार्टी नेता भी विकास-विकास की बांग देते सुनाई पड़ते हैं. जींद की बड़ी समस्याएं तो किसी को पता ही नहीं है या सभी देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. जींद में पीने के पानी में सीवर का पानी मिक्स होकर आना, गलियों में सीवर का पानी भरा होना, गलियों में रात को अंधेरा होना, सड़कों का बुरा हाल, सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की कमी, प्रतियोगी परीक्षाओं के बेहतर कोचिंग सेंटरों की कमी, मनोरंजन व पाठकों की कमी, सार्वजनिक शौचालयों की कमी, अंधेरा होते ही सरकारी बसों के आवागमन की कमी, सड़कों पर डस्ट पोलूशन, वाहन पार्किंग की स्थाई व्यवस्था नहीं, सुरक्षा व ट्रैफिक व्यवस्था में काफी पीछे, सड़कों पर डेरा जमाए आवारा पशु, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी, थोड़ी सी बरसात होते ही पूरा शहर जलमग्न आदि कुछ समस्याएँ है जिससे बाहर से आए समर्थक नेताओं के साथ मीडिया भी रूबरू हो रहा है. देश व प्रदेश के मीडिया संवाददाता शहर व गांव की गलियों में अपने पांव को सीवर के पानी व कीचड़ की गंदगी से बचाते हुए वोटरों से उनके विचार जानने की कोशिश करते हैं. तो वोटरों का जवाब होता है कि सच्चाई लिखो व दिखाओ. महिलाएं गलियों में आपस में यही चर्चा करती सुनाई पड़ रहीं हैं कि 21वीं सदी में अच्छे दिन कब आएंगे.


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