Hindi Online Test Privacy Policy | About Us | Contact

नया हरियाणा

गुरूवार, 25 अप्रैल 2019

पहला पन्‍ना English सर्वे लोकप्रिय हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप

जानिए क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति!

देश और विदेश में जानिए किस नाम से मनाई जाती है मक्रर संक्रांति

 Makar Sankranti2018, naya haryana, नया हरियाणा

14 जनवरी 2018



नया हरियाणा

हिंदू पंचाग के अनुसार माना जाता है कि जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब संक्रांति होती है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार पर्व और त्योहार चंद्र पंचांग यानी चंद्रमा की गति और उसकी कलाओं पर आधारित है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को ही संक्रांति कहते हैं। एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति के बीच का समय ही सौर मास है। एक जगह से दूसरी जगह जाने अथवा एक-दूसरे का मिलना ही संक्रांति होती है. हालांकि कुल 12 सूर्य संक्रांति हैं, लेकिन इनमें से मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति प्रमुख हैं।  तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं।

क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति?
सूर्यदेव जब धनु राशि से मकर पर पहुंचते हैं तो मकर संक्रांति मनाई जाती है। सूर्य के धनु राशि से मकर राशि पर जाने का महत्व इसलिए अधिक है क्यों कि इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाता है। उत्तरायण देवताओं का दिन माना जाता है। 
हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार पर्व और त्योहार चंद्र पंचांग यानी चंद्रमा की गति और उसकी कलाओं पर आधारित है। इस पंचांग में तिथि बढ़ती और कम होती रहती है, इसी कारण से अंग्रेजी कैलेण्डर की तिथियों से मेल नहीं खाती है। यहां मकर संक्रांति हमेशा एक अपवाद रहती है और हर वर्ष 14 जनवरी को मनाई जाती है। मकर संक्रांति पर्व का निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है, इसी कारण से संक्रांत का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाता है।

हिंदू पंचाग के अनुसार माना जाता है कि जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है तब संक्रांति होती है। संक्रांति का नाम उस अनुसार होता है जिस राशि में सूर्य का प्रवेश हो रहा होता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करने के कारण इसे मकर संक्रांति कहा जाता है। संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की तरफ जाता है और इसी समय खरमास का अंत होता है। खरमास को अशुभ काल माना जाता है, इसके समाप्त होते ही शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है। महाभारत पुराण के अनुसार भीष्म पितामाह ने भी अपनी मृत्यु के लिए मकर संक्रांति का दिन चुना था।
देश के विभिन्नर राज्योंु में इस पर्व को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हालांकि प्रत्ये क राज्ये में इसे मनाने का तरीका जुदा भले ही हो, लेकिन सब जगह सूर्य की उपासना जरूर की जाती है। लगभग 80 साल पहले उन दिनों के पंचांगों के अनुसार मकर संक्रांति 12 या 13 जनवरी को मनाई जाती थी, लेकिन अब विषुवतों के अग्रगमन के चलते इसे 13 या 14 जनवरी को मनाया जाता है। इस साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाया जायेगा।
यह भारतवर्ष तथा नेपाल के सभी प्रान्तों में अलग-अलग नाम व भाँति-भाँति के रीति-रिवाजों द्वारा भक्ति एवं उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है।

विभिन्न नाम भारत में
मकर संक्रान्ति : छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, और जम्मू
ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल : तमिलनाडु
उत्तरायण : गुजरात, उत्तराखण्ड
माघी : हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब
भोगाली बिहु : असम
शिशुर सेंक्रात : कश्मीर घाटी
खिचड़ी : उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार
पौष संक्रान्ति : पश्चिम बंगाल
मकर संक्रमण : कर्नाटक
विभिन्न नाम भारत के बाहर
बांग्लादेश : Shakrain/ पौष संक्रान्ति
नेपाल : माघे सङ्क्रान्ति या 'माघी सङ्क्रान्ति' 'खिचड़ी सङ्क्रान्ति'
थाईलैण्ड : สงกรานต์ सोङ्गकरन
लाओस : पि मा लाओ
म्यांमार : थिङ्यान
कम्बोडिया : मोहा संगक्रान
श्री लंका : पोंगल, उझवर तिरुनल
नेपाल में मकर-संक्रान्ति
नेपाल के सभी प्रान्तों में अलग-अलग नाम व भाँति-भाँति के रीति-रिवाजों द्वारा भक्ति एवं उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिये भगवान को धन्यवाद देकर अपनी अनुकम्पा को सदैव लोगों पर बनाये रखने का आशीर्वाद माँगते हैं। इसलिए मकर संक्रान्ति के त्यौहार को फसलों एवं किसानों के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है।

नेपाल में मकर संक्रान्ति को माघे-संक्रान्ति, सूर्योत्तरायण और थारू समुदाय में माघी कहा जाता है। इस दिन नेपाल सरकार सार्वजनिक छुट्टी देती है। थारू समुदाय का यह सबसे प्रमुख त्यैाहार है। नेपाल के बाकी समुदाय भी तीर्थस्थल में स्नान करके दान-धर्मादि करते हैं और तिल, घी, शर्करा और कन्दमूल खाकर धूमधाम से मनाते हैं। वे नदियों के संगम पर लाखों की संख्या में नहाने के लिये जाते हैं। तीर्थस्थलों में रूरूधाम (देवघाट) व त्रिवेणी मेला सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।
 


बाकी समाचार