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नया हरियाणा

रविवार, 21 अप्रैल 2019

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करनाल विधानसभा का इतिहास, कभी नहीं जीत पाई इनेलो

करनाल को कर्ण की नगरी कहा जाता है। महाभारत के मुख्य पात्र कर्ण का जन्मस्थान कहा जाता है। 

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16 जनवरी 2019



नया हरियाणा

करनाल को कर्ण की नगरी कहा जाता है। महाभारत के मुख्य पात्र कर्ण का जन्मस्थान कहा जाता है। करनाल में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई), गेहूं अनुसंधान निदेशालय (डीडब्ल्यूआर), केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई), पशु आनुवंशिक संसाधन राष्ट्रीय ब्यूरो (एनबीएजीआर), और भरतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) सहित कई विश्व स्तर के विकास एवं अनुसंधान संस्थान हैं।

कर्ण झील कर्ण झील का नाम महान योद्धा और महाभारत में दाता के नाम से प्रसिद्ध कर्ण पर रखा गया, यह करनाल के मुख्य शहर से सिर्फ 13-15 मिनट की दूरी पर है। संयोग से, शहर खुद भी कर्ण के नाम पर है। शास्त्रों के अनुसार प्रसिद्ध योद्धा कर्ण उन दिनों इसी झील में नहाते थे, जिसे आज कर्ण ताल या तालाब कहा जाता है। यहीं पर कर्ण ने इसी ताल में नहाने के बाद अपना प्रसिद्ध सुरक्षात्‍मक कवच भगवान इंद्र को दान कर दिया था, जो अर्जुन के पिता थे और अर्जुन शक्ति के मामले में उनका प्रतिद्वंद्वी एवं कट्टर दुश्‍मन था। कर्ण झील एक पर्यटक स्थल है और सिर्फ करनाल जिले में ही नहीं बल्कि पूरे हरियाणा में प्रसिद्ध। एक विशेष पर्यटन विशेषता है कि यह ग्रैंड ट्रंक रोड के राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 1 के किनारे पर स्थित है और आसानी से कारों और पर्यटकों की वॉल्‍वो बसों का ध्‍यान आकर्षित करता है। बाबर की मस्जिद बाबर, भारत के पहले मुगल सम्राट ने कई सारी मस्जिदें बनवायी थीं करनाल स्थित इस मस्जिद में मुगल शैली की कुशल वास्‍तुकला एवं स्‍थानीय प्रभाव साफ झलकता है। मस्जिद का निर्माण 1527 में शुरू किया था और 1528 में पूरा किया गया। मस्जिद इब्राहिम लोधी पर अपनी जीत का जश्न मनाने और निर्णायक भारतीय साम्राज्य पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए बाबर द्वारा बनवायी गई थी। एक विशाल क्षेत्र पर स्थित बड़ी मस्जिद, साथ ही एक बगीचा था, लेकिन यह समय के साथ गायब हो गया है। मस्जिद के मुख्य प्रार्थना हॉल 53.75x16.5 मीटर के हैं और एक उच्च गुंबद ऊपर से हैं। यहां एक गहरा कुआं भी है, जिसमें ठंडा और मीठा पानी उपलब्ध रहता है। मस्जिद में एक पत्‍थर है, जिस पर फारसी भाषा में लिखा है कि इसे एक वास्तुकार मीर बाकी ने बनवाया था। मस्जिद करनाल के शहर के दिल में स्थित है।

सामान्य परिचय

हरियाणा में स्थित करनाल इस नाम के जिले का मुख्यालय शहर है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग 1 पर चण्डीगढ़ से 126 कि॰मी॰ की दूरी पर यमुना नदी के किनारे स्थित है। घरौंड़ा, नीलोखेड़ी, असन्ध, इन्द्री और तरावड़ी इसके मुख्य दर्शनीय स्‍थल हैं। करनाल में अनेक फैक्ट्रियां हैं। इन फैक्ट्रियों में वनस्पति तेल, इत्र और शराब तैयार की जाती है। इसके अलावा यह अपने अनाज, कपास और नमक के बाजार के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। यहां पर मुख्यत: धान की खेती की जाती है। यह धान उच्च गुणवत्ता वाला होता है और इसका निर्यात विदेशों में किया जाता है। इसकी उत्तर-पश्चिम दिशा में कुरूक्षेत्र, पश्चिम में जीन्द व कैथल, दक्षिण में पानीपत और पूर्व में उत्तर प्रदेश स्थित है। पर्यटक यहां पर अनेक पर्यटक स्थलों की यात्रा कर सकते हैं। इनमें कलन्दर शाह गुम्बद, छावनी चर्च और सीता माई मन्दिर आदि प्रमुख हैं। यह सभी बहुत खूबसूरत हैं और पर्यटकों को बहुत पसंद आते हैं। करनाल के एक छोटे से गाँव मदनपुर का एक लडका जिसका नाम कमल कशयप है वह अपनी तीर्व बूद्धि के लिए पूरे हरियाणा में मशहूर है। 

विधानसभा का राजनीतिक इतिहास

हरियाणा की 10 लोकसभा सीटों में से करनाल एक लोकसभा सीट है। करनाल लोकसभा सीट पर चुनाव लड़े उम्मीदवार जातीय समीकरणों में उलझ गए हैं। कुल 12 चुनाव में करनाल सीट कांग्रेस ने नौ बार और भाजपा ने तीन बार जीती। जिसके अंतर्गत 9 विधानसभा सीटें भी हैं- करनाल, असंध, नीलोखेड़ी, इंद्री, घरौंडा, इसराना, समालखा और पानीपत ग्रामीण व शहरी सीट.

करनाल विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने 1987 और 1996 में जीत हासिल की थी. इससे पहले जनसंघ के उम्मीदवार भी 1967 और 1972 में जीते थे. लेकिन विधानसभा सीट करनाल 2014 में भाजपा उम्मीदवार मनोहर लाल खट्टर की जीत वोट प्रतिशत के हिसाब से पूरे हरियाणा में सबसे बड़ी जीत रही. उनके मुकाबले चुनाव में उतरे हर उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई.
मनोहर लाल खट्टर नाम की भावी मुख्यमंत्री की निगाह गुड़गांव, फरीदाबाद, रोहतक, पंचकूला आदि शहरी सीटों पर भी थी. लेकिन आखिरकार उन्होंने अपनी मर्जी से करनाल की टिकट ली. मनोहर लाल ने आरएसएस और भाजपा संगठन में खूब काम किया था. लेकिन हरियाणा भाजपा में जमीनी स्तर पर वे कम ही सक्रिय रहे थे. भाजपा में उन्होंने लंबे समय तक हरियाणा के संगठन महामंत्री का पद भी संभाला था. करनाल की टिकट मिलते ही उन्होंने यही पर डेरा डाल लिया. आरएसएस स्वयंसेवक वाले जीवन की तरह यहां भी उन्होंने खूब मेहनत की और एक दमदार जीत हासिल की. मनोहर लाल ने 58.78% वोट हासिल किए. जो कि दूसरे नंबर के उम्मीदवार से 45.64% ज्यादा था. जीत का यह अंतर प्रतिशत के हिसाब से प्रदेश में सबसे बड़ा अंतर था. वोटों की संख्या के हिसाब से गुड़गांव से भाजपा के उमेश अग्रवाल की जीत सबसे बड़ी थी. लेकिन वोट प्रतिशत के हिसाब से बड़ी जीत में वह दूसरे नंबर पर थे.

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मनोहर लाल खट्टर ने 1977 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता ली थी और 1980 में वे संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए थे. बिना शादी किए और घर-बार त्यागकर मनोहर लाल ने संघ में 14 साल तक विभिन्न जिम्मेदारियों के साथ काम किया और 1994 में भाजपा में आए. साल 2000 के बाद में हरियाणा भाजपा के संगठन महामंत्री बन गए और आखिरकार 2014 लोकसभा चुनाव में उन्हें पार्टी ने हरियाणा की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया. हरियाणा के राजनीतिक गलियारों में इसके बाद ही लोग उन्हें कुछ हद तक जानने लगे थे. लोकसभा चुनाव में उनकी शानदार जीत के बाद विधानसभा चुनाव आते-आते मनोहर लाल हरियाणा के मामले में और ज्यादा दिलचस्पी व दखल देने लगे थे. धीरे-धीरे उनका नाम पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों में मजबूती के साथ लिया जाने लगा. अपनी पसंद से करनाल की टिकट और वहाँ से रिकॉर्ड तोड़ जीत ने उनकी मजबूती के एहसास को औरज्यादा बढ़ा दिया था. विधानसभा चुनाव में उनकी रिकॉर्ड वोट प्रतिशत से जीत ही मुख्य वजह थी जो शुरुआत में यह प्रचार था कि भाजपा की सरकार बनने पर मनोहर लाल सूबे के मुख्यमंत्री बनेंगे.
सना सीट पर पिछले दो चुनावों में सुमिता सिंह कांग्रेस का चुनाव लड़ती आई थी. 2005 व 2009 में वह दोनों बार जीती थी. 2005 में सुमिता सिंह करीब 35% अंक वोटों के अंतर से जीती थी, जो 2009 में घटकर 4% से भी कम रह गया था. करनाल सीट पर अपनी लोकप्रियता में आई इस जबरदस्त गिरावट को भाँप कर सुमिता सिंह ने 2014 चुनाव से पहले ही सीट बदलने का फैसला कर लिया. सुमिता सिंह चुनाव लड़ने असंध सीट पर चली गई और करनाल की टिकट सुरेंद्र सिंह नरवाल को दे दी गई. नरवाल कई साल करनाल जिले के कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे और उनके परिवार का लिबर्टी कंपनी के डिस्ट्रीब्यूशन का बड़ा नेटवर्क है. अपना पहला चुनाव लड़ने उतरे सुरेंद्र नरवाल को मनोहर लाल के मुकाबले मामूली समर्थन मिला और वह 9.12% वोट मिले पाए. उन्होंने खट्टर को बाहरी बताकर 'अपना करनाल, अपना नरवाल' नारा चलाने की कोशिश की, लेकिन कोई असर नहीं हुआ. इस सीट पर कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार सुमिता सिंह को 2009 में 35.45% वोट मिले थे.
इनेलो के लिए करनाल कमजोर सीट रही है और इनेलो या इसके पुराने स्वरूपों को कभी इस शहरी सीट पर जीत नहीं मिली. यहां तक कि इस पार्टी का उम्मीदवार यहां कभी दूसरे स्थान पर भी नहीं आ पाया. इनेलो ने 2014 में यहां की टिकट मनोज वाधवा को दी थी. वाधवा ने 12.60% वोट लिए. जबकि 2009 में पार्टी को यहां से 3.88% वोट मिले थे. इस मायने में यह इनेलो के लिए संतोषजनक प्रदर्शन वाला चुनाव रहा. क्योंकि उनके वोट पहले के मुकाबले 3 गुना बढ़ गए, हालांकि जमानत फिर भी नहीं बची.

2014 का विधानसभा चुनाव

पूर्वविधायक जयप्रकाश गुप्ता ने करनाल विधानसभा सीट ने आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का एलान किया है।  उनके मैदान में उतरते ही अन्य उम्मीदवारों की चिताएं बढ़ गई हैं। राजनीति के जानकारों का मानना है कि गुप्ता प्रतिद्वंद्वियों का गणित बिगाड़ सकते हैं। इस बात को इसलिए भी खारिज नहीं किया जा सकता कि पिछले विधानसभा चुनाव में जेपी गुप्ता छोटे से अंतर से चुनाव हार गए थे। भास्कर से बातचीत में जेपी गुप्ता ने बताया कि कांग्रेस ने बताया कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर अशोक तंवर एवं मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने टिकट का ऑफर दिया था और करनाल सीट से चुनाव लड़ने के लिए कहा था लेकिन मैने कर दिया। उन्होंने बीजेपी के लोगों द्वारा भी संपर्क साधने की बात कही। बताया कि खट्टर से पहले उनके पास चुनाव लड़ने का आफर आया था लेकिन कुछ वजहों से उन्होंने बीजेपी को भी कर दिया और आजाद कंडीडेट के तौर पर अब मैदान में हैं। इतने ऑफर मिलने के बाद आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला क्यूं? इस बारे में जेपी गुप्ता कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट जनादेश नहीं मिलने वाला इस कंडीशन में आजाद उम्मीदवारों की भूमिका सरकार बनाने में अहम होगी। बकौल जेपी यदि ऐसी स्थिति आती है तो वह करनाल के विकास के लिए सरकार से ज्यादा से ज्यादा काम करा सकेंगे। 

करनाल से पहले मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल

करनाल सीट के एक पुराने खिलाड़ी है जय प्रकाश गुप्ता. जो 1987 से यहां चुनाव लड़ते आ रहे हैं. 2014 को मिलाकर कुल 7 चुनाव लड़ चुके जयप्रकाश गुप्ता ने दो बार जीत हासिल की, जबकि 5 बार भी दूसरे स्थान पर रहे. कभी भी हार-जीत की दौड़ से बाहर न जाने वाले जयप्रकाश ने मनोहर लाल को भी थोड़ी बहुत टक्कर दी और 13.33% वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे. जय प्रकाश 2014 में निर्दलीय चुनाव में उतरे थे. 2000 और 2005 का चुनाव भी उन्होंने आजाद उम्मीदवार के तौर पर ही लड़ा था. जबकि 2009 में उनके पास हजका की टिकट थी. 2000 से पहले के सभी चुनाव में वे कांग्रेस के उम्मीदवार थे. 10 साल विधायक रही सुमिता सिंह का करनाल का चुनावी मैदान छोड़कर चले जाना कुछ हद तक भाजपा के लिए फायदा का सौदा अवश्य रहा. लेकिन इस सीट पर मनोहर लाल की दमदार जीत की असली वजह तो देश में मोदी लहर और मनोहरलाल के मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना ही रही.

2018 के मेयर चुनावों में भी बीजेपी ने जीत का परचम लहराया

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