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नया हरियाणा

शनिवार, 17 अगस्त 2019

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जींद उपचुनाव में बाहरी कार्यकर्ताओं के भरोसे हैं 'मरोडिया नेता'

आशंका यही जताई जा रही है कि पूर्व सीएम के खोदे गए गड्डों में घिर कर न रह जाए रणदीप सुरजेवाला?

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12 जनवरी 2019



नया हरियाणा

जींद उपचुनाव में रणदीप सुरजेवाला को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। क्योंकि जींद जिले में कांग्रेस लगभग साफ हो चुकी है और इस साफ करने में पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा का सबसे बड़ा योगदान रहा है। गौरतलब है कि 2005 में जब कांग्रेस को विशाल बहुमत मिला था। उस समय जींद जिले की 5 सीटों पर कांग्रेस ने परचम लहराया था। जब की हुड्डा की भेदभाव भरी नीतियों और मांगेराम गुप्ता के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। उसकी कीमत रणदीप सुरजेवाला को चुकानी पड़ेगी। क्योंकि स्थानीय कार्यकर्ताओं का अभाव हार का बड़ा कारण बन सकता है। कांग्रेस का पूर्व प्रत्याशी प्रमोद सहवाग भी अंदरूनी तौर पर डैमेज कर सकता है।
जिसकी झलक मांगेराम गुप्ता ने एक टीवी चैनल के सवालों के जवाब में साफ कहा कि मैं अपने अपमान को कैसे भूल सकता हूं। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि रणदीप सुरजेवाला ने यहां से चुनाव लड़कर गलती की है। अब इस गलती की कितनी कीमत रणदीप सुरजेवाला चुकाएगा यह आने वाला समय बताएगा। अपनी कार्यशैली की वजह से भूपेंद्र हुड्डा ने 2009 के चुनाव में जींद की पांचों सीटें गवा दी थी। वीरेंद्र सिंह से अपनी व्यक्तिगत खुंदको के चलते, उन्होंने जींद की उपेक्षा की विकास कार्य नहीं किए। 

2014 में भी जींद जिले में कांग्रेस जीरो हो गई थी। चुनाव से पहले मांगेराम गुप्ता ने कांग्रेस को छोड़ दिया। हुड्डा शासन में संगठन खत्म कर दिया गया। अपना जनाधार और हाईकमान पर पकड़ ढीली पड़ते देख बाद में अंशुल सिंगला को शामिल करके हुड्डा ने थोड़ा जीवित करने की कोशिश जरूर की।

 ऐसे में रणदीप सुरजेवाला को जींद में कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं का अभाव साफ खल रहा है। जिसके कारण अब उसे नरवाना और कैथल से अपने कार्यकर्ताओं को लेकर आना पड़ रहा है। शून्य से चुनाव की तैयारी करनी पड़ रही है। अशोक तंवर को छोड़कर बाकी नेता फोटो सेशन करवाकर अपने अपने गंतव्य को निकल गए। हालांकि तंवर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं और उनकी नाराजगी को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। 

रणदीप सुरजेवाला को लेकर गांव के वोटरों में भी नकारात्मक किस्म का भाव स्पष्ट दिख रहा है। गांव में इन्हें 'मरोडिया नेता' के रूप में जाना जाता है। बल्कि कहा यहां तक जाता है कि मरोडिया का मरोडिया बेटा है। यह जनता की नाराजगी व्यक्त करने का तरीका होता है। जिसकी अक्सर राजनीति के विश्लेषक अनदेखी कर देते हैं। जबकि ये जनभावनाओं का जीता जागता रूप होते हैं। लोगों का  कहना है कि कि जब इनके पास विभिन्न मंत्रालय थे, इन्होंने जींद के लिए कोई विकास कार्य नहीं किया। अब हमें यह कहकर बहकाने की कोशिश कर रहे हैं कि मैं सीएम की कुर्सी जींद में लेकर आऊंगा।

 दूसरी तरफ बीजेपी अपने पार्टी कैडर होने की वजह से जहां लगभग 20,000 से शुरुआत करेगी। वहीं जेजेपी भी अपनी मजबूत पकड़ के कारण गांव से लगभग 15000 से शुरुआत कर रही है। जबकि रणदीप सुरजेवाला को करीब 5000 के आसपास से शुरुआत करनी पड़ रही है। आंकड़ों में जो अंतर दिख रहा है यह अंतर आने वाले दिनों में घटता है और बढ़ता हुआ साफ दिखेगा। वर्तमान समय में रणदीप की मुश्किलें साफ दिख रही हैं। हंसी मजाक में कही गयी बात कि कांटा निकल गया, सचमुच सच न हो जाये। आशंका यही जताई जा रही है कि पूर्व सीएम के खोदे गए गड्डों में घिर कर न रह जाए रणदीप सुरजेवाला?


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