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नया हरियाणा

सोमवार , 18 जून 2018

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राजा नाहर सिंह : आजादी की लड़ाई के वीर यौद्धा

9 जनवरी को वीर यौद्धा नाहर सिंह का 160वां शहादत दिवस मनाया जाएगा.

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4 जनवरी 2018

नया हरियाणा

आजादी की लड़ाई के वीर यौद्धा राजा नाहर सिंह तेवतिया ने 1857 की क्रांति में महत्तवपूर्ण भूमिका थी। राजा नाहर सिंह अग्रणी क्रांतिकारियों में थे, जिन्होंने बहादुरशाह जफर को दिल्ली का शासक स्थापित करने तथा राजधानी की सुरक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दी थी।

हरियाणा राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग के फ़रीदाबाद ज़िले में एक शहर और तहसील का नाम बल्लभगढ़ है। 1739 ई. में यहां पर जाट रियासत थी जिसकी स्थापना बलराम सिंह ने की थी। 1753 ई. में मुगलों ने बलराम सिंह को मरवा दिया। उसके बाद उनके मित्र और भरतपुर के राजा सूरज मल  ने उनके पुत्रों को फिर बल्लभगढ़ की गद्दी दिलवाई। बाद में जब अफ़ग़ानिस्तान से अहमद शाह अब्दाली ने हमला किया तो बल्लभगढ़ ने उसका सख़्त विरोध किया, लेकिन 3 मार्च 1747 को हराया गया। और भी आगे चलकर बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह (1823-1858) ने 1857 की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और उसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विद्रोह कुचलने के बाद सन् 1858 में फांसी दी।
9 जनवरी को लालकिले पर दी गई थी फांसी
आजादी की लड़ाई में बल्लभगढ़ के सदर-ए-रियासत राजा नाहरसिंह का बलिदान स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। नाहरसिंह के शौर्य और वीरता से अंग्रेजी हुकूमत का हर हुकमरान थर्राता था। इसी शौर्य के बल पर राजा नाहरसिंह को अंग्रेजी हुकमरानों ने नाहरखां के नाम से नवाजा था। संधि के बहाने राजा को दिल्ली बुलाकर अंग्रेजों ने उनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाया और उन्हें 9 जनवरी 1858 को दिल्ली के लालकिले पर फांसी दे दी। राजा नाहरसिंह की सल्तनत को आज भी उनकी बहादुरी और शहादत पर नाज है। 
इस बार उनका 160वां बलिदान दिवस मनाया जाएगा
वर्तमान में पलवल जिले के अलावलपुर गांव में चरणदास के घर जन्मे राजा बलराम उर्फ बल्लू का जन्म हुआ। राजा बल्लू के नाम पर ही शहर का नाम बल्लभगढ़ पड़ा था। राजा बलराम की सातवीं पीढ़ी में 6 अप्रैल 1821 को जन्मे राजा नाहरसिंह रियासत के अंतिम शासक थे। राजा नाहरसिंह का 16 वर्ष की उम्र में ही कपूरथला घराने की राजकुमारी किशन कौर से विवाह संपन्न हुआ था। पिता की मौत के बाद 18 वर्ष की उम्र में ही नाहरसिंह को 20 जनवरी 1839 में सत्ता की बागडोर संभालनी पड़ी। राजगद्दी पर आसीन होने के बाद नाहरसिंह ने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी थी। छोटी उम्र में ही सैन्य शक्ति बढ़ाने के बाद राजा नाहरसिंह ने अपनी रियासत में अंग्रेजों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने का फरमान जारी कर दिया था। राजा नाहरसिंह के इस फरमान से अंग्रेजी शासक घबरा गए। सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लेकर राजा ने अंग्रेजी शासकों को अपनी बहादुरी का लोहा मनवा दिया। 
नाहर सिंह महल और रानी की छतरी
शहर में मौजूद राजा नाहरसिंह महल और जीटी रोड के निकट बनी रानी की छतरी आज भी उनके शौर्य की गाथा गा रहा है। अपने वास्तुकला के लिये प्रसिद्ध राजा नाहरसिंह पैलेस 18वीं सदी का प्राचीन महल है। इसे जाट नाहरसिंह के उत्तराधिकारियों द्वारा स्थापित किया गया था। इस सुन्दर महल का निर्माण कार्य 1850 में पूरा हुआ था। इसे बल्लभगढ़ किला महल के नाम से भी जाना जाता है और दक्षिण दिल्ली से 15 किमी की दूरी पर स्थित है। राजा नाहरसिंह ने स्वतन्त्रता संग्राम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। महल के मण्डप और आँगन सुन्दर हैं। झुकी हुई मेहराबें और सुन्दर रूप से सजे कमरे इतिहास के पन्ने में वापस ले जाते हैं। अब यह एक विरासत सम्पत्ति है। इस महल के चारों ओर कई शहरी केन्द्र हैं। यह राजसी महल भारी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है।
नाहर सिंह के बचपन का नाम नर सिंह था इनके ऊपर शिकार करते वक्त एक शेर ने हमला कर दिया था।तब नर सिंह और इनके अंगरक्षक हरचन्द गुर्जर ने शेर से टक्कर ली पर हरचन्द की मृत्यु हो गयी फिर नर सिंह ने शेर को मार गिराया।उस समय ये मात्र 16 साल के ही थे।तब इनका नाम नर सिंह से नाहर सिंह हुआ।
1857 की क्रांति में योगदान
देश की आजादी के लिए अनगिनत वीरों ने अपने जीवन का बलिदान दिया है। भारतीय इतिहास में जिन शहीदों का नाम अंकित है, उनमें बल्लभगढ़ रियासत के आजादी के मतवाले शहीद राजा नाहर सिंह का नाम हरियाणा के इतिहास में सदा अमर रहेगा। प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम जिसे 1857 की महान क्रांति के नाम से जाना जाता है। 1857 की क्रांति की योजना शुरू हुई उन्होंने गुड़गांव रेवाड़ी ग्वालियर फरुखनगर के राजाओं को एक झंडे तले लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 18 मार्च 1857 को मथुरा में राजाओं की एक गुप्त मीटिंग हुई जिसमें नाहर सिंह को शिरमौर बनाया गया और इस मीटिंग के आयोजक व अध्यक्ष वही थे।इस मीटींग में #तात्या टोपे भी शामिल थे।और बहादुर शाह जफर ने उन्हें दिल्ली के पश्चिमी हिस्से को चाक चौबंद रखने के लिए कहा। क्रांति की तारीख 31 मई रखी गई थी ताकि सब तक खबर पहुंचाकर पुरे देश में एक साथ क्रांति की जाये।मगर क्रांति पहले ही शुरू हो गई।जिससे अचानक से सब गड़बड़ा गया।मंगल पांडे शहीद हो गए। इस तरह वीर क्रांतिकारियों ने दिल्ली को अंग्रेजो के कब्जे से छुड़ा लिया व बहादुर शाह जफर को दिल्ली का बादशाह बना दिया गया। दिल्ली 132 दिन तक आजाद रही। नाहर सिंह ने पश्चिमी सीमा की सुरक्षा की और अंग्रेजो को वहां से नही घुसने दिया।इसलिए अंग्रेज उन्हें आयरन गेट ऑफ़ दिल्ली कहने लगे। राजा नाहरसिंह की बहादुरी से तिलमिलाए अंग्रेजों ने उन्हें संधि के लिए दिल्ली बुलवा लिया। इस दौरान राजा को बंदी बनाकर उनके ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। इसमें उन्हें दोषी करार देते हुए 9 जनवरी 1858 में राजा नाहरसिंह को दिल्ली के चांदनी चौक में फांसी की सजा दी गई। 


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