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नया हरियाणा

बुधवार, 16 जनवरी 2019

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नेता के घोषणा पत्र में भाई-भतीजावाद की जगह साला-सालीवाद लिखना पड़ा महंगा

घोषणा-पत्र का सबसे पहला पॉइंट पढ़ कर उनकी घरवाली ने भी उन्हे वोट नहीं दिया.

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4 जनवरी 2019

प्रदीप नील

मेरी जान खतरे में है क्योंकि मेरी वज़ह से पहली बार मैदान में उतरा एक नया नेता चुनाव हार गया और अब वह मुझे मारना चाहता है. गलती सचमुच ही मेरी थी , जो उसके लिए नीचे दिया गया चुनाव घोषणा-पत्र बना बैठा.
(1) मैं किसी प्रकार के "साला-सालीवाद" में विश्वास नहीं करता. 
( इस बिंदु पर नेता जी ने मुझे समझाया था कि सही शब्द तो 'भाई-भतीजावाद ' है। मैंने हंसते हुए कह दिया था " आप ही बताएं आपको भाई ज्यादा प्यारा या साला ?" इस बात पर वह शरमा गए थे और मैंने साला-सालीवाद लिखा रहने दिया )
(2) बिजली,पानी तथा टैक्स-चोर मुझे यह सोचकर तो बिल्कुल वोट न दें कि मेरे जीतने के बाद उनके पौ-बारह हो जायेंगे.
(यह पढ़ कर नेता जी को पसीना आ गया , बोले -- फिर मुझे वोट देगा कौन ? मैंने तसल्ली दे दी थी कि सिर्फ नेताओं को चोर बताने वाले लाखों ईमानदार लोग आपका साथ देंगे। और वह मान गए )
(3) नकली या मिलावटी घी,दूध तथा शराब बनाने वाले मुझे वोट देकर शर्मिंदा न हों.चुनाव जीता तो उन्हे भी अंदर जाना ही होगा. 
( उन्होंने फिर ऐतराज़ किया कि फिर पार्टी-फंड के लिए चंदा कहां से आएगा। मैंने सवाल पूछा - आपको चंदा चाहिए या वोट ? देर से आई लेकिन बात उन्हें समझ आ गई और यह पॉइंट भी घोषणा-पत्र में चला गया। )
(4) सबसे बडी बात पर मतदाता गौर करें कि मुझे वोट देने से से पहले अपनी आत्मा में झांक कर देखें कि मुझे वोट क्यों देना चाहते हैं?
( यह बात उन्हें समझाने में बहुत समय लगा मुझे। वह जानना चाहते थे वोटर की अंतर्रात्मा क्या होती है ? मैंने समझाया कि देसी का पव्वा पीकर या पैसे ले कर वोटर की आत्मा सो जाती है। आप ये दोनों चीजें देंगे नहीं तो वह अपनी आत्मा की आवाज़ पर वोट आपको ही देगा। वह मान गए )
5 . मैं जात-पात या धर्म-भेद की राजनीति में विश्वास नहीं करता। 
( इस बात पर उन्हें बहुत डर लगा , बोले - कोई एक तो लालच बचा रहने दो कि लोग मुझे वोट दें। मैंने कहा - चिंता क्यों करते हैं , आप ? सोशल -मीडिया पर इतना ज्ञान बंट रहा है , इतने बाबे-बाबियां रोज उपदेश देते हैं , इतने गीत गूंज रहे हैं देश में। अब तो हर आदमी खुद को विश्व-नागरिक समझने लगा है। सब वोट आपको ही मिलेंगे। 
तो अब तक आप समझ ही गए होंगे कि बाकी और बातें जो मैंने लिखी,क्या रही होंगी?
लगभग वही बातें जो मजबूत लोकतंत्र के लिए ज़रूरी होती हैं. इसके बाद मैं यह सोचकर मज़े से सो गया कि मेरा पट्ठा जीतेगा और मुझे लाख दो लाख रूपए का इनाम तो पक्का ही देगा.
लेकिन , उसके पक्ष में सिर्फ दो वोट आए और उन दो में से एक भी पता नहीं कौन डाल गया.? नेता जी को चुनाव हारने का दुख नहीं है,दुख सिर्फ इस बात का है कि घोषणा-पत्र का सबसे पहला पॉइंट पढ़ कर उनकी घरवाली ने भी उन्हे वोट नहीं दिया. अब नेता जी चार लोगों से यही कहते घूम रहे हैं "मैंने साला-सालीवाद का नाम न लिया होता तो मैं चुनाव ज़रूर जीत जाता. घोषणा-पत्र का नंबर एक पढकर मेरी घरवाली तक ने वोट नहीं दिया और बाकी लोगों ने यह सोचकर वोट नहीं दिए कि जो अपनी घरवाली तक का वोट नहीं ले सकता उसे हम वोट क्यों दें?“,
यहां तक भी वह बेचारा मुझे माफ करने को तैयार है लेकिन मुश्किल यह है कि उसका बसा बसाया परिवार उजडने वाला है क्योंकि उसकी घरवाली चार दिन से यही पूछ रही है,”राम औतार एक वोट तो मान लिया तूने डाला होगा,लेकिन बताता क्यों नहीं कि दूसरा वोट कौन चुडैल डाल गई.?“


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