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रविवार, 21 अक्टूबर 2018

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जाति के जंजाल में फंसी राजस्थान की राजनीति

युवा बेरोजगारी और किसान कर्ज से जूझ रहे हैं.राजस्थान के प्रत्येक किसान पर औसतन 50 हजार का कर्जा है.

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2 जनवरी 2018

नितिन लहकोड़िया नादान

युवा बेरोजगारी और किसान कर्ज से जूझ रहे हैं.राजस्थान के प्रत्येक किसान पर औसतन 50 हजार का कर्जा है.राजस्थान के 65% गाँवो में किसान की आय 3000 हजार से भी कम है. राजस्थान के गाँवो में लगभग 2 करोड़ लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं. राजस्थान में रीट की परीक्षा के लिए12 लाख से  ज्यादा आवेदन आये हैं. राजस्थान के किसान और युवा ही परेशान हैं. दिन-ब-दिन बढ़ती बेरोजगारी पूरे भारत की समस्या बनती जा रही है.
एक अनुमान के मुताबिक हर साल 20000 हजार से ज्यादा लडकियां स्कूली शिक्षा पूरी करके कॉलेज न होने के कारण पढाई छोड देती हैं. हर साल लगभग 50 हजार  बच्चे कई कारणों से पढाई बीच में ही छोड देते हैं. इनमें सबसे ज्यादा पिछड़े और दलित आते हैं, लेकिन पिछड़े और दलित नेताओ को एक दूसरे को गाली देने से ही फुरसत नही हैं.
राजस्थान पुलिस के कास्टेंबल के लिए 10 लाख से ज्यादा आवेदन आ चुके हैं.  गुर्जर समाज  आरक्षण के लिए अपमे ही नेताओं का शिकार हो रहा है. 70 से ज्यादा गुर्जर युवा आरक्षण की लड़ाई में हताहत हो चुके है  और नेता अल्टीमेटम दे रहे हैं. कमोबेश यही हालत विपक्ष और सरकार ने हरियाणा में जाटों के साथ की हुई है.
कई किसान बैंक का कर्ज का ना चुके पाने के कारण आत्महत्या कर चुके हैं. किसान को न फसल का दाम मिल रहा है और न जमीन का मुआवजा. सत्ता पक्ष भाषण की और विपक्ष मुद्दाविहीन  राजनीति कर रहा है.
अभी कुछ दिनों पहले चिकित्सकों के साथ सरकार ने तानाशाही की थी, जिसकी वजह से चिकित्सकों ने हड़लात कर दी. उसका खामियाजा बेचारी जनता ने सैकडों मौतों से चुकाया. युवा वर्ग को पक्ष-विपक्ष दोनों ने खिलौना बना दिया है. युवा वर्ग बेरोजगारी से तंग आकर अपराध और आत्महत्या की तरफ बढ रहा है.
जनता को जमीनी औऱ मूलभूत  मुद्दों से भटकाकर जाति और धर्म के मुद्दे पकडाकर राजस्थान की जनता को बेकफूफ बनाया जा रहा है. राजस्थान की राजनीति जनहित के मुद्दे से दूर जा चुकी है.
राजस्थान की गर्मी हर किसी को सहन नहीं होती है. राजस्थान को पार्टियों ने खुला चारागाह समझ रखा है. हर राजनैतिक दल बिना किसी रूकावट के चारागाह में विचरण कर रहा है. राजस्थान में जाट, गुर्जर, मीणा, राजपूत आदि आजकल सोशल मीडिया पर अपनी-अपनी जाति के लिए सामबंध (लांबिग) कर रहे हैं.
राजस्थान में जाट समुदाय की आबादी 18% के लगभग है. जाट समुदाय को दोनों राजनैतिक पार्टियों ने खूब ठगा है. राजस्थान में 1998 में कांग्रेस ने मारवाड की धरा पर दाव खेलकर उस समय उत्तर भारत के किसान नेताओं में अपनी पहचान रखने वाले परसराम मदेरणा  के नाम से चुनाव लडा. जाट समुदाय ने चुनावों में कांग्रेस की झोली भर दी. जाट समुदाय बहुत खुश था कि उनको उनका हक मिल जायेगा. उस समय जिस किसी के घर कांग्रेस का झण्डा नहीं मिलता था. उसे लोग हिकारत की नजरों से देखते थे. कांग्रेस ने परसराम  को दरकिनार करके अशोक गहलोत को सूबे की कमान सौंप दी. अशोक गहलोत माली समुदाय से आते हैं जिनकी आबादी बहुत कम हैं. जाट समुदाय ठगा महसूस कर रहा था. इसी का फायदा बीजेपी ने 2003 में वंसुधरा राजे को आगे करके उठाया.
वंसुधरा  ने रैलियों में सोशल समीकरण का ऐसा जाल बिछाया की कांग्रेस को न उगलते बना, न निगलते बना. वंसुधरा रैलियों में जाट की बहु, राजपूत की बेटी, गुर्जर की समधन से खूब वोट लूटे. और इस तरह वंसुधरा राजे अपना शासनकाल पूरा कर गयी.
2008 में सत्ता बदल गयी. दिग्गज नेता शीशराम ओला  को दरकिनार करके गहलोत जी फिर से सीएम बने. 2013 में वसुधरा राजे सीएम बनी. 2013 में बीजेपी के जीतने के कई कारण थे?
2012 में हमारे गाँव से 12 लड़के थर्ड ग्रेड टीचर, 5 लड़के सैंकड ग्रेड टीचर, 4 लड़के 
लेक्चरर हुए थे. एक गाँव में एक साथ इतनी सरकारी नौकरी तो पूरे राजस्थान का अनुपात देखें तो कांग्रेस  सरकार ने 2008 - 2013 के कार्यकाल मेंखूब नौकरियां दी थी. हर कोई कह रहा था कि सरकार दौबारा कांग्रेस की  ही बनेगी. चुनावों में एक नयी नवेली पार्टी राजपा मैदान में आ गयी जिसको मीणा जाति का पूर्ण समर्थन था. मीणाओ ने अपने गाँवो में अन्य पार्टीयो के ऐजेन्ट भी राजपा के अलावा बूथ पर खड़े नहीं होने दिये. गुर्जर का बड़ा धड़ा आरक्षण का पाने के लिए खुल्म - खुल्ला कांग्रेस के साथ हो गया. अब बचे जाट?
जाट वोट कांग्रेस और बीजेपी में बँट गया. वोट काटो पार्टी बसपा बीजेपी की बी टीम बनकर राजस्थान में दलितों के बोट ले गयी. कांग्रेस का वोट बैंक ही नहीं बचा. राजपा पार्टी 40 से ज्यादा सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही थी. बसपा ने सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को किया था. कांग्रेस का राजस्थान में परम्परागत वोट बैंक
बसपा + राजपा ले गयी.
बीजेपी को बैठे-बिठाये ही जीत का सेंहरा मिल गया. यही हाल अब भी हो सकता है. कांग्रेस को सरकार बनानी है तो वोट काटू पार्टियों को रोकना होगा नहीं तो बीजेपी फिर से सरकार बना जायेगी. राजस्थान के जातीय समीकरण बेहद अलग हैं. यहां एक्शन का रिएक्शन बहुत जल्दी होता है. बाकि 2013 में बीजेपी की सरकार बसपा + राजपा ने ही बनबायी थी. दोनों पार्टियो ने जाटों को भावनात्मक रूप से खूब भड़का कर अपना उल्लू सीधा कर लिया था. अब चुनावी साल शुरू हो चुका है.
राजस्थान में बीजेपी - कांग्रेस के खिलाफ वाले नेताओं को एक मंच पर लाने के लिए विधायक हनुमान बैनीवाल ने सबसे पहले तीसरे मोर्च का नारा दिया था. मीणा जाति के सबसे बड़े धड़े के नेता किराड़ीलाल मीणा और पिछली सरकार में मंत्री रहे और ब्राह्मण जाति को अपने साथ लेने की कोशिश करने वाले घनश्याम तिवाड़ी इन तीनों के कई बार अलग-अलग मंचों से दोनो पार्टियों को किनारे करने की बात कर चुके हैं.
हनुमान बैनीवाल जिस तरह से भीड़ इकट्ठी कर रहा है, उससे दोनों पार्टियों का तो पता नहीं लेकिन दोनों पार्टियों के जाट नेताओं की आँखो की किरकिरी बन चुके हैं, लेकिन अब देखना होगा कि ये भीड़ वोटों में तब्दील होती हैं या नही. बीजेपी, कांग्रेस, बसपा और आप पार्टी ने राजस्थान के चुनावों की तैयारिया शुरू कर दी हैं. बीजेपी में वंसुधरा राजे पूर्वी राजस्थान के बड़े नेता को अपने पाले में लाने का प्रयास कर रही है, तो नहीं कांग्रेस राजपूत-जाट-गुर्जर का समीकरण बिठाकर सत्ता पर बैठने का नाकाम प्रयास कर रही है.
मीणा और गुर्जर नेताओं के भाषणों में आकर एक-दूसरे की खून के प्यासे बने हुए हैं. जाट और राजपूत को लड़ाकर राजनैतिक उल्लू सीधा किया जा रहा है. जाति-धर्म-क्षेत्रवाद की राजनीति की जा रही है. किसानों के नेता को किसानों से सरोकार नहीं है.
जाट नेताओं को जाटों से कोई मतलब है. मीणा नेताओं को मीणाओं का हित और अहित से फर्क नहीं पड़ रहा है. राजपूत नेताओं का भी यही हाल है. सब नेताओं को एक दूसरे की जाति को गाली देकर कुर्सी पाने का लक्ष्य है. किसानों और युवाओं को बरगलाया जा रहा है. जाति और धर्म के नेता शराब, शबाब और कबाब में अपने जमीर को बेच रहे हैं. हर जाति और धर्म के लोगों को लग रहा है कि यही नेता हमारा भगवान है.
मै तो हमेशा कहता हूं नेता की कोई जाति और धर्म व जमीर नहीं होता है. नेता का जमीर,धर्म और जाति सभी कुछ कुर्सी ही है. यही नेता का अंतिम लक्ष्य है.
 

* नितिन लहकोड़िया 'नादान' राजस्थान की राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं और वहां की राजनीति में पल-पल बदलते समीकरणों को समझते हैं और विश्लेषित करते रहते हैं.


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