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नया हरियाणा

बुधवार, 13 नवंबर 2019

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जेजेपी में उपाध्यक्ष रामकुमार गौतम को लेकर सोशल मीडिया पर क्यों मचा है बवाल

रामकुमार गौतम पर आरोप है कि उन्होंने जाटों का आरक्षण रद्द करवाने में भूमिका निभाई थी.

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2 जनवरी 2019



नया हरियाणा

पूर्व विधायक रहे रामकुमार गौतम को पार्टी ने संगठन में महत्वपूर्ण पद देते हुए उन्हें जननायक जनता पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया है। नारनौंद वासी पंडित रामकुमार गौतम भाजपा की टिकट पर चुनाव जीत कर विधायक बने थे। करीब चार दशकों से राजनीति में सक्रिय रामकुमार गौतम भाजपा के विधायक दल के नेता तथा भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे हैं। रामकुमार गौतम को दुष्यंत चौटाला ने अपनी पार्टी में उपाध्यक्ष पर विराजमान किया है.

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया 

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कौन है रामकुमार गौतम

भजन लाल के खासमखास और जिन्होंने पहली बार जाट आरक्षण को 1991 में खत्म करवाया था. भारत भूषण शर्मा और रामकुमार गौतम ने सर्वोच्च न्यायलय में इस आरक्षण का रद्द करवाया था.

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भाजपा को क्यों छोड़ा था रामकुमार गौतम ने

भाजपा का इनेलो से जब गठबंधन हुआ तो रामकुमार गौतम ने यह कहते हुए भाजपा का साथ छोड़ दिया था कि चौटाला परिवार तो राक्षसों का परिवार है. आज उसी राक्षसी परिवार के पोते की पार्टी में शामिल हो गया.

भ्रष्टाचार का मामले में भी आया है नाम

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुडा के तत्कालीन मुख्य प्रशासक डीपीएस नागल, हुडा के तत्कालीन मुख्य वित्तीय नियंत्रक एससी कांसल व हुडा के तत्कालीन उप अधीक्षक बीबी तनेजा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। मुख्यमंत्री हुडा का पदेन अध्यक्ष होता है। उस समय हुड्डा मुख्यमंत्री थे। 14 औद्योगिक प्लॉट कानूनों को ताक पर रखकर अपने चहेतों को दिए गए। इन प्लॉटों को लेने वालों में से एक रामकुमार गौतम का रिश्तेदार भी शामिल है।

जाट आरक्षण की मांग का इतिहास

जाट आरक्षण की मांग आजादी के बाद से उठनी शुरू हो गई थी। हांलाकि जाट की जगह किसानों और गांव में रहने वालों के नाम पर आरक्षण की मांग की थी। साल 1949 में चौधरी चरण सिंह ने सबसे पहले यह मांग कि थी कि गांव में रहने वाले लोगों को 50 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। इसके बाद पिछड़े जातियों को आरक्षण देने की मांग पर संविधान की धारा 340 के तहत 20 जनवरी 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त हुआ, जिसमें 20 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सरकार को दी लेकिन आर्थिक आधार की बात के चलते यह रिपोर्ट सिरे नहंी चढ सकी। इस रिपोर्ट में कालेलकर ने सभी राज्यों में रहने वाले जाटों को शुद्र लिखा है अर्थात रिपोर्ट के आधार पर जाट आरक्षण के अधिकारी रहे थे। कालेलकर रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। जनता पार्टी के शासन काल में एक जनवरी 1979 बिंदेश्वर प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में पिछडों को आरक्षण देने के लिए मंडल कमीश्न नियुक्त किया गया। 31 दिसंबर 1980 में बिंदेश्वर प्रसाद ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी। लेकिन यह भी सिरे नहंी चढ़ सकी। 13 अगस्त 1990 को जब देश के तात्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने इसे लागू करने की घोषणा की। मंडल कमिशन की रिपोर्ट में पेज नंबर 294 पर स्पष्ट कहा कि जाट भी अन्य कृषक जाति अहिर, कुर्मी, गुर्जर व सैनियों की तरह सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टी से पिछड़े हुए है और ये आरक्षण के अधिकारी है। लेकिन उस समय भूलवश कुछ जाट नेताओं ने अहम के चलते अपने को पिछड़ा कहलाना उचित नहीं समझा व अपने इस संवैधानिक अधिक पर बल नहीं दिया। लेकिन कुछ समय के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल ने गुरनाम आयोग की स्थापना की। जिसमें अपनी रिपोर्ट में पांच फरवरी 1991 को जाट, जाट सिक्ख, त्याबी, बिश्रोई रोड, राजपूत, गुर्जर, सैनी व मेव जातियों को हरियाणा में पिछड़ा घोषित कर दिया। मुख्यमंत्री हुक्म सिंह इसे लागू भी कर दिया गया।

लेकिन मई 1991 में भजन लाल सरकार आई और एक षड्यंत्र के तहत भारत भूषण शर्मा और रामकुमार गौतम ने सर्वोच्च न्यायलय में इस आरक्षण का रद्द करने की अर्जी लगा दी।

जिसके तहत सात फरवरी 1994 को इसको रद्द कर दिया गया। दूसरी ओर वर्ष 2000 में डॉ. साहब सिंह वर्मा के मुख्यमंत्री रहते दिल्ली में 10 मार्च 2000 को उत्तर प्रदेश में, 24 जनवरी 2002 को मध्यप्रदेश में, 10 सितबंर 1993 को गुजरात में, छह नवबंर 2000 को बिहार में, 12 नवंबर 2002 को हिमाचल प्रदेश में, 22 मार्च 2010 को उत्तराखंड में व 27 अक्टूबर 1999 को लंबे सघर्ष के बाद राजस्थान के जाटों को पिछड़े वर्ग में आरक्षण मिल गया था।

 


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