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नया हरियाणा

गुरूवार, 23 मई 2019

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जानिए रोहतक लोकसभा से कौन हरा सकता है दीपेंद्र हुड्डा को

2019 का लोकसभा चुनाव दीपेंद्र के लिए मुश्किल चुनाव होने वाला है।

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30 दिसंबर 2018



नया हरियाणा

हरियाणा के लोक सभा में 10 सीटों में से 2014 में बीजेपी को 7 सीटें मिली थी। बाकी की 3 सीटों में दो इनेलो की व एक कांग्रेस के हिस्से आई थी। कांग्रेस के हिस्से में रोहतक लोकसभा की सीट आई थी। जिसमें दीपेंद्र सिंह हुड्डा विजई हुए थे। हिसार से कुलदीप बिश्नोई को हरा कर दुष्यंत चौटाला सांसद बने थे। सिरसा से भी  इनेलो के प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी। बीजेपी की रणनीति के अनुसार अबकी बार वह रोहतक लोकसभा सीट को किसी भी हालत में कांग्रेस से छीनना चाहती है। इसी सिलसिले में वह रोहतक लोकसभा सीट से कई नामों पर विचार कर रही है। जिनमें प्रमुख रूप से क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग का नाम भी राजनीतिक गलियारों में सुनने को मिलता है। ई के बाद रिटायर आर्मी चीफ सुहाग का नाम लिया जाता है। अब  इसी सिलसिले में कई ओर नाम चलने लगा है। जिनमें से करनाल के पूर्व सांसद अरविंद शर्मा का नाम भी रोहतक लोक सभा सीट्स से लड़ने वालों में जुड़ गया। कारण यह बताया जा रहा है कि करनाल लोकसभा सीट से वित्त मंत्री अरुण जेटली चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे में अरविन्द शर्मा को रोहतक से टिकट मिल सकती है। अरविन्द शर्मा और दीपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच मुकाबला टक्कर का रहेगा या एकतरफा रहेगा यह तो समय ही बता पाएगा। परंतु अरविन्द शर्मा को कमजोर कैंडिडेट किसी तरह नहीं माना जा सकता। ऐसे में रोहतक शहर से कांग्रेस और खासकर भूपेंद्र हुड्डा की पकड़ पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है। इसी कमजोरी के कारण रोहतक नगर निगम के चुनाव में हुड्डा समर्थित प्रत्याशी 15000 से ज्यादा वोटों से हार गया। ऐसे में दीपेंद्र की मुश्किलें बढ़ना लाजमी है क्योंकि रोहतक शहर ही जीत का असली मूल मंत्र था। जो अब खत्म होता हुआ प्रतीत हो रहा है।

 अगर पिता पुत्र ने इन पहलुओं पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो हार का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी तरफ दुष्यंत चौटाला के प्रत्याशी भी दीपेंद्र की ही वोट काटने का काम करेंगे। क्योंकि कांग्रेस व हुड्डा के में खेमे से कार्यकर्ताओं का विश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगा है। जिसके कारण उनका रुझान युवा नेता दुष्यंत चौटाला की तरफ साफ दिखने लगा है। खासकर झज्जर और रोहतक में। इसलिए युवा सांसद दीपेंद्र हुड्डा को गंभीरता के साथ 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ना पड़ेगा। पिछले चुनाव की तुलना में यह चुनाव ज्यादा मुश्किल होने वाला है। भले ही 2014 में बीजेपी में मोदी की लहर हो परंतु दीपेंद्र  की जनता के साथ संवाद की गति सहज एवं लोकप्रिय थी। जिसमें हरियाणा में उनके पिता के मुख्यमंत्री होने का बड़ा योगदान था। जो अब 4 साल से नहीं है। ऐसे में जनसंवाद पहले की तुलना में काफी कम हो गया है और कार्यकर्ताओं के काम राज में न होने के कारण पूरे नहीं हो पा रहे हैं। दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं की महत्वकांक्षा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही
 हैं। यह पहलू भी भविष्य में परेशानी पैदा कर सकता है।

रोहतक में हुए दंगों में जो आगजनी व लूटपाट हुई थी उसकी कीमत युवा सांसद दीपेंद्र को चुकानी पड़ सकती है। हालांकि दीपेंद्र अपने सौम्य स्वभाव के लिए काफी लोकप्रिय हैं, परन्तु हिंसा की आंच सौम्यता पर भारी पड़ सकती है।

नगर निगम चुनावों में हुड्डा समर्थित प्रत्याशी के हारने के बाद दीपेंद्र की हार का डर कार्यकर्ताओं में साफ दिखने लगा है।


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