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नया हरियाणा

गुरूवार, 27 जून 2019

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पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर देवीलाल का कर दिया था एक जनाब ने जीना हराम

चौधरी देवीलाल ने 1971 में आदमपुर से भजनलाल और तोशाम से चौधरी बंसीलाल के खिलाफ चुनाव लड़ा और दोनों जगह से चुनाव हारे।

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29 दिसंबर 2018



नया हरियाणा

चौधरी देवीलाल दो भाई थे। बड़े भाई थे चौधरी साहिबराम और छोटे देवीलाल। पहला चुनाव चौधरी साहिबराम ने ब्रिटिश काउंसिल का लड़ा और जीते। देवीलाल ने स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर लड़ाई लड़ी 1952 में देवीलाल सिरसा से विधायक का चुनाव लड़े और जीते। उसके बाद लगातार जीतते रहे।

1971 में दो सीटों पर लड़ा था देवीलाल ने चुनाव 
संघर्ष का एक दौर ऐसा आया कि चौधरी देवीलाल ने 1971 में आदमपुर से भजनलाल और तोशाम से चौधरी बंसीलाल के खिलाफ चुनाव लड़ा और दोनों जगह से चुनाव हारे। हौसला थोड़ा कम हुआ लेकिन 1971 में रोड़ी विधानसभा में उपचुनाव हुआ फिर लड़े और फिर जीते। उसके बाद इमरजेंसी में जेल गए।

1977 में पहना मुख्यमंत्री का ताज 
ताऊ देवीलाल ने 1977 में मुख्यमंत्री का ताज पहना। जब 1977 में हरियाणा में जब दूसरी गैर-कांग्रेसी सरकार बनी तो लोगों में उसी तरह का उत्साह था। जैसा उत्साह और उत्सव आजादी के दौरान मनाया गया था। भारतीय राजनीति के इतिहास में 7 की संख्या के महत्व पर बात करते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि कैसे संयोग हो जाता है। सन 1947, 1967, 1977 व 1987 में भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ आए। हरियाणा के लोगों ने कानून व्यवस्था की परवाह न करते हुए भारी संख्या में चंडीगढ़ की ओर रुख किया। जहां नई सरकार ने शपथ ग्रहण करनी थी।

जिस दिन चौधरी देवीलाल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेनी थी। उस दिन हरियाणा के देहाती बस ट्रेन, ट्रक, ट्रैक्टर उनको जो भी साधन मिला, उसमें चढ़कर वह चंडीगढ़ की ओर रवाना हो गए। चारों ओर से जनसैलाब उमड़ने से चंडीगढ़ मेले में तब्दील हो गया। चारों और हरियाणवी पहनावा और बोली सुनाई दे रही थी। आम जनता को लग रहा था कि उसकी सरकार पहली बार बनी है। दूसरी तरफ राज्यपाल का अधिकारिक घर रामलीला मैदान में बदल गया था।

चौधरी देवी लाल के मंत्रीमंडल में चौधरी भजन लाल, डॉ मंगल सेन, कर्नल राम सिंह, बलवंत राय तायल, सुषमा स्वराज आदि ऐसे भी थे जो उनकी पसंद नहीं थे। जनता पार्टी के विधायकों की संख्या बहुत अधिक थी। मंत्रिमंडल में शामिल करके सबको खुश नहीं किया जा सकता था। शपथ समारोह में कुछ असंतुष्ट थे। इनमें पहले मंत्री रह चुके संत हरद्वारी लाल भी थे। जिनको अपनी शिक्षा का घमंड भी था और यह मानते थे कि चौधरी देवीलाल या किसी और में उनके जैसी योग्यता नहीं है। चौ. हरद्वारी लाल ने अपने मित्र व विधानसभा अध्यक्ष ब्रिगेडियर रणसिंह मान तथा राज्यपाल सरदार हरचरण सिंह बराड़ को विश्वास में लेकर मुख्यमंत्री देवीलाल को सदन में नीचा दिखाने की कोशिश की। 

हरद्वारी लाल की योजना के अनुसार राज्यपाल ने चौधरी देवी लाल को बुलाकर समझाया कि उसे 'मलाईदार पद' देकर उसका त्याग पत्र ले लिया जाए. चौधरी हरद्वारी लाल के स्थान पर विधानसभा का सदस्य बनने के इच्छुक चौधरी उदय सिंह दलाल ने भी चौधरी हरद्वारी लाल को महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय का कुलपति बनाने के लिए चौधरी देवीलाल को राजी करने में भूमिका अदा की. चौधरी हरद्वारी लाल को कुलपति के रूप में मुंह मांगा पद मिल गया. चौधरी हरद्वारी लाल के सदन की सदस्यता छोड़ने से चौधरी देवीलाल को राहत की सांस मिली.

असल में चौधरी हरिद्वारी लाल तभी से अपने को अपमानित महसूस कर रहे थे. जब उनको जनता पार्टी का टिकट देने से इनकार कर दिया. जबकि आपातकाल के दौरान पूरे 19 महीने में जेल में रहे और उनको अपने साथ के अन्य राजनीतिक कैदियों से ज्यादा सताया गया था. रोहतक जिले के बादली हलके से जनता पार्टी के उम्मीदवार चौधरी उदय सिंह दलाल को हराकर आजाद उम्मीदवार के रूप में विधानसभा का चुनाव जीत गए थे. चौधरी हरिद्वारी लाल को सदन में महत्वपूर्ण पद न देना जले पर नमक छिड़कना था. उनका व्यक्तित्व को देखते हुए यह स्वभाविक ही था कि सत्ता में टुकड़ा प्राप्त करने के लिए व सत्तासीन लोगों से झगड़ते क्योंकि सत्ताधारी पार्टी के विधायकों की संख्या बहुत अधिक थी. इसलिए आजाद विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल करने का कोई तुक नहीं था. चौधरी हरिद्वारी लाल के लिए सदन का सदस्य होना ही काफी नहीं था. इसलिए उन्होंने मनचाहे विश्वविद्यालय का कुलपति बनना बेहतर समझा.

1982 में ऐसा जादू चलाया कि 90 में से 85 सीटों पर भाजपा और अकाली दल के सहयोग से जीत हासिल की। 1987 में न्याय युद्ध की शुरुआत की। बुढ़ापा पेंशन जैसे एतिहासिक फैसले लागू किए। बाद में अन्य राज्यों को इस पेंशन के फैसले का अनुसरण करना पड़ा।

1989 में बने उपप्रधानमंत्री
1989 में चौधरी देवीलाल केंद्र की राजनीति में चले गए। उप प्रधानमंत्री बनने के साथ ही रणजीत सिंह और ओम प्रकाश चौटाला में विरासत की जंग शुरू हो गई। ऐसे में देवीलाल ने कड़ा निर्णय लिया और ओम प्रकाश चौटाला के हाथ में पार्टी की बागडोर सौंपी। उनका मानना था कि ओम प्रकाश चौटाला एक कुशल प्रशासक होंगे और पार्टी को आगे बढ़ाएंगे।


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