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शहीद-ए-आजम उधम सिंह : गोलियों का बदला गोलियों से लिया

उन्होंने अपना नाम – राम मोहम्मद सिंह आजाद बताया था। जो इस बात का प्रतीक था कि यह बदला सभी भारतीयों की तरफ से लिया गया है।

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26 दिसंबर 2017

डॉ. नवीन रमण

13 मार्च 1940 की उस शाम लंदन का कैक्सटन हॉल लोगों से खचाखच भरा हुआ था। मौका था ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की एक बैठक का। हॉल में बैठे कई भारतीयों में एक ऐसा भी था जिसके ओवरकोट में एक मोटी किताब थी। यह किताब एक खास मकसद के साथ यहां लाई गई थी। इसके भीतर के पन्नों को चतुराई से काटकर इसमें एक रिवॉल्वर रख दिया गया था। यह मौका था गोलियों का जवाब गोलियों से देने का। दरअसल गोलीकांड का बीज एक दूसरे गोलीकांड से पड़ा था। यह गोलीकांड 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुआ था। इस दिन अंग्रेज जनरल रेजिनाल्ड एडवार्ड हैरी डायर के हुक्म पर इस बाग में इकट्ठा हुए हजारों लोगों पर गोलियों की बारिश कर दी गई थी।
इस मामले में लंदन में केस चला
4 जून 1940 को दोषी करार दिए गए और 31जुलाई 1940 को फांसी की सजा दी गई. वहां पर कोर्ट में जब उनसे उनका नाम पूछा गया तब उन्होंने अपना नाम – राम मोहम्मद सिंह आजाद बताया था। जो इस बात का प्रतीक था कि यह बदला सभी भारतीयों की तरफ से लिया गया है।
संगरूर जिले के सुनाम गांव में कम्बोज परिवार में 26 दिसंबर1899 को उधम सिंह का जन्म हुआ था। बचपन में ही माता-पिता दोनों चल बसे. बड़े भाई के साथ अनाथालय में रहे। वहां दोनों के नाम बदल दिए गए. शेर सिंह से उधम सिंह और मुक्ता सिंह से साधु सिंह हो गए। 1917 में इनके बड़े भाई की भी मौत हो गई। उसके बाद से इन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना जीवन समपर्ण कर दिया।
1919 के बाद क्रांतिकारी जीवन जीया. विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर काम किया. जैसे    गदर पार्टी, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन, भारतीय श्रमिक संघ आदि. ग़दर पार्टी पराधीन भारत को अंग्रेज़ों से स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से बना एक संगठन था। इसे अमेरिका और कनाडा के भारतीयों ने 25 जून1913 में बनाया था। इसे प्रशान्त तट का हिन्दी संघ (Hindi Association of the Pacific Coast) भी कहा जाता था। यह पार्टी "हिन्दुस्तान ग़दर" नाम का पत्र भी निकालती थी जो उर्दू और पंजाबी में छपता था। इस संगठन ने भारत को अनेक महान क्रांतिकारी दिए। ग़दर पार्टी के महान नेताओं सोहन सिंह भाकना, करतार सिंह सराभा, लाला हरदयाल आदि ने जो कार्य किये, उसने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को उत्प्रेरित किया। पहले महायुद्ध के छिड़ते ही जब भारत के अन्य दल अंग्रेज़ों को सहयोग दे रहे थे गदरियों ने अंग्रेजी राज के विरूध्द जंग घोषित कर दी। उनका मानना था-
सुरा सो पहचानिये, जो लडे दीन के हेत।
पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कभूं न छाडे खेत॥
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन भारतीय स्वतन्त्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश राज को समाप्त करने के उद्देश्य को लेकर गठित एक क्रान्तिकारी संगठन था।। 1928 तक इसे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के रूप में जाना जाता था। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की स्थापना अक्टूबर 1924 में भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, योगेश चन्द्र चटर्जी, चंद्रशेखर आजाद और शचींद्रनाथ सान्याल आदि ने कानपुर में की थी।। पार्टी का उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति को व्यवस्थित करके औपनिवेशिक शासन समाप्त करने और संघीय गणराज्य संयुक्त राज्य भारत की स्थापना करना था।
दूसरी तरफ उधम सिंह भगत सिंह से बहुत प्रभावित थे। दोनों दोस्त भी थे। एक चिट्ठी में उन्होंने भगत सिंह का जिक्र अपने प्यारे दोस्त की तरह किया है। भगत सिंह से उनकी पहली मुलाकात लाहौर जेल में हुई थी। इन दोनों क्रांतिकारियों की कहानी में बहुत दिलचस्प समानताएं दिखती हैं। दोनों का ताल्लुक पंजाब से था। दोनों ही नास्तिक थे। दोनों हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार थे। दोनों की जिंदगी की दिशा तय करने में जलियांवाला बाग कांड की बड़ी भूमिका रही। दोनों को लगभग एक जैसे मामले में सजा हुई। भगत सिंह की तरह उधम सिंह ने भी फांसी से पहले कोई धार्मिक ग्रंथ पढ़ने से इनकार कर दिया था।
इतिहास के पन्नों में जिक्र मिलता है कि उधम सिंह भी उस दिन जलियांवाला बाग में थे। उन्होंने तभी ठान लिया था कि इस नरसंहार का बदला लेना है। मिलते-जुलते नाम के कारण बहुत से लोग मानते हैं कि उधम सिंह ने जनरल डायर को मारा। लेकिन ऐसा नहीं था। इस गोलीकांड को अंजाम देने वाले जनरल डायर की 1927 में ही लकवे और कई दूसरी बीमारियों की वजह से मौत हो चुकी थी। यही वजह है कि इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि ड्वायर की हत्या के पीछे उधम सिंह का मकसद जलियांवाला बाग का बदला लेना नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार को एक कड़ा संदेश देना और भारत में क्रांति भड़काना था।


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