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अटल बिहारी वाजपेयी की एक खूबसूरत प्रेम कहानी

ये भारतीय राजनीति की सबसे खूबसूरत प्रेम कहानी है

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25 दिसंबर 2017

नया हरियाणा

जिंदगी एक खूबसूरत यात्रा होती है. खूबसूरत मोड़ों के साथ. क्या पता किस मोड़ का कौन सा खूबसूरत लम्हा आपकी जिंदगी बदल दे. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी में जब वो लम्हा आकर गुजरा तो वो उदास हुए, उन्हें लगा कि सबकुछ खत्म हो गया. लेकिन बाद में यही लम्हा उनकी जिंदगी की खूबसूरत प्रेम कहानी बन गई. जाने माने पत्रकार कुलदीप नैयर ने लिखा," ये देश के राजनीतिक हलके में घटी सबसे महान प्रेम कहानी थी."
कहानी की शुरुआत 40 के दशक में होती है, जब अटल ग्वालियर के एक कॉलेज में पढ़ रहे थे. वह भी उनके साथ पढ़ रही थीं. दौर ऐसा था कि बातें केवल आंखों ही आंखों में होती थीं या मूक जुबान बहुत प्रेम के संकेत देती थी. ज्यादा बात करने के अवसर नहीं थे. ऐसा लगता था कि प्रेम बहुत शिद्दत से एक पगडंडी तैयार करता जा रहा था. आखिरकार अटल ने इस राह पर कदम बढ़ाने की हिम्मत की. उन्होंने लवलेटर लिखा. जवाब ही नहीं आया. वह बहुत निराश हुए. उन्हें क्या मालूम था कि ये लवलेटर करीब एक-डेढ़ दशक बाद उनकी जिंदगी में हमेशा के लिए बदलने वाला है.
हालांकि, दोनों ने अपने रिश्ते को कभी कोई नाम नहीं दिया. लेकिन कुलदीप नैयर के अनुसार ये खूबसूरत प्रेम कहानी थी. अटल बिहारी वाजपेयी और राजकुमारी कौल के बीच चला वो रिश्ता खूबसूरत रिश्ते में बुनता चला गया. राजकुमारी कौल को दिल्ली के राजनीतिक हलकों में लोग मिसेज कौल के नाम से जानते थे. हर किसी को मालूम था कि वो अटलजी के लिए सबसे प्रिय हैं. मई 2014 में जब मिसेज कौल का निधन हुआ तो अखबारों में पहली बार उनके बारे में खबरें छपीं, इसे थोड़ा विस्तार से पहले पेज पर छापा इंडियन एक्सप्रेस ने. जिसे पढ़कर पाठकों ने जाना कि वह अटल जी की जीवन की डोर थीं, उनके घर की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य और उनकी सबसे घनिष्ठ भी. पत्रकार कुलदीप नैयर ने टेलीग्राफ में लिखा, 'संकोची मिसेज कौल अटल की सबकुछ थीं, जिस तरह उन्होंने उनकी सेवा की, वह शायद कोई कर पाए. वह हमेशा उनके साथ रहीं, जब तक उनका हार्ट अटैक से निधन नहीं हो गया.'

वाजपेयी जी और मैं दोस्त हैं
दक्षिण भारत के पत्रकार गिरीश निकम ने एक इंटरव्यू में अटल और श्रीमती कौल को लेकर अनुभव बताए. वह तब से अटल के संपर्क में थे, जब वो प्रधानमंत्री नहीं बने थे. उनका कहना था कि वह जब अटलजी के निवास पर फोन करते थे तब फोन मिसेज कौल उठाया करती थीं. एक बार जब उनकी उनसे बात हुई तो उन्होंने परिचय कुछ यूं दिया, "मैं मिसेज कौल, राजकुमारी कौल हूं. वाजपेयीजी और मैं लंबे समय से दोस्त रहे हैं. 40 से अधिक सालों से." उन्होंने ये भी बताया कि किस तरह सालों से वाजपेयी जी उनके और उनके पति प्रोफेसर कौल के साथ रहते आए हैं.
एक बार संकोची मिसेज कौल ने एक महिला मैगजीन को 80 के दशक के मध्य में एक इंटरव्यू दिया. जब इंटरव्यू लेने वाले ने उनसे अटल और उनके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में कभी अपने पति को कोई स्पष्टीकरण देने की जरूरत ही नहीं पड़ी. उन्होंने कहा कि उनके और पति के रिश्ते समझबूझ के स्तर पर काफी मजबूत हैं.

अटल ने तब लव लेटर लिखा
अटलजी पर लिखी गई किताब "अटल बिहारी वाजपेयीः ए मैन ऑफ आल सीजंस" के लेखक और पत्रकार किंशुक नाग ने लिखा किस तरह पब्लिश रिलेशन प्रोफेशनल सुनीता बुद्धिराजा के मिसेज कौल से अच्छे रिश्ते थे. उनके हवाले उन्होंने लिखा एक दिन मिसेज कौल कुछ उदास थीं, तब उन्होंने सुनीता से अटल के साथ रिश्तों के बारे में बताया. दोनों एक ही समय ग्वालियर के एक ही कॉलेज में पढ़े थे. ये 40 के दशक के बीच की बात थी. वो ऐसे दिन थे जब लड़के और लड़कियों की दोस्ती को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था. इसलिए आमतौर पर प्यार होने पर भी लोग भावनाओं का इजहार नहीं कर पाते थे. इसके बाद भी युवा अटल ने लाइब्रेरी में एक किताब के अंदर राजकुमारी के लिए एक लेटर रखा.लेकिन उन्हें उस पत्र का कोई जवाब नहीं मिला. वास्तव में राजकुमारी ने जवाब दिया था. जवाब किताब के अंदर ही रखकर अटल के लिए दिया गया था लेकिन वह उन तक नहीं पहुंच सका. इस बीच राजकुमारी के सरकारी अधिकारी पिता उनकी शादी एक युवा कॉलेज टीचर ब्रिज नारायण कौल से कर देते हैं.

वह अटल को जीवनसाथी बनाना चाहती थीं
किताब में राजकुमारी कौल के एक परिवारिक करीबी के हवाले से कहा गया कि वास्तव में वह अटल से शादी करना चाहती थीं, लेकिन घर में इसका जबरदस्त विरोध हुआ. हालांकि अटल ब्राह्मण थे लेकिन कौल अपने को कहीं बेहतर कुल का मानते थे. मिसेज कौल की सगाई के लिए जब परिवार ग्वालियर से दिल्ली आया, उन दिनों यहां 1947 में बंटवारे के दौरान दंगा मचा हुआ था. इसके बाद शादी ग्वालियर में हुई. पति बहुत बढ़िया शख्स थे.

दोनों फिर मिले
अटल ने प्रणय प्रस्ताव के बाद कभी शादी नहीं की. उन्होंने सियासी दुनिया में कदम रखा. आगे बढ़ते चले गए. वो दोनों एक -डेढ़ दशक बाद फिर तब मिले जब अटल सांसद हो गए. राजकुमारी दिल्ली आ गईं. उनके पति दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में फिलॉस्फी के प्रोफेसर थे. बाद में वह इसी कॉलेज के हास्टल के वार्डन बन गए. बाद में अटल उनके साथ रहने आ गए थे.
उस हॉस्टल में रहने वाले छात्र याद करते हैं कि वह कड़े वार्डन थे. हर शाम हॉस्टल जरूर आते थे. ये 60 के दशक की बात है. उन दिनों अटल प्रोफेसर कौल के घर काफी आने लगे थे. हॉस्टल के कई छात्र जब वार्डन के घर आते थे तो उन्हें वहां देखा करते थे. अटल छात्रों से खूब बातें करते थे. मिसेज कौल भी उस बातचीत का हिस्सा बनती थीं. साथ ही छात्रों को मिठाई वगैरह खिलाती थीं.

कौल परिवार अटल के लुटियंस जोन के बंगले में रहने लगा
उस कालेज में पढ़कर बाद में आईएएस बनने वाले और बड़े पदों पर रहने वाले एक आईएएस कहते हैं कि उन दिनों में हमें अंदाज नहीं था कि, अटल और राजकुमारी की दोस्ती है. बाद में कई सालों बाद हमने उन्हें लेकर बातें सुनीं. उन दिनों जनसंघ का दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ पर काफी दबदबा था. ये आईएएस जब बाद में अटल के मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद लुटियंस जोन में उनसे मिलने उनके घर गए तो प्रोफेसर कौल, मिसेज कौल और उनकी दोनों बेटियों को वहां देखा. दरअसल अटल बाद में कौल के कालेज निवास में रहने आ गए थे.

आरोप लगे थे कि अटल के एक महिला से संबंध हैं
1968 में दीन दयाल उपाध्याय के अचानक निधन के बाद जनसंघ के अध्यक्ष के पद के लिए अटल के नाम पर विचार किया गया. तब पार्टी में उनके मजबूत प्रतिद्वंद्वी बलराज मधोक थे. मधोक ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संरसंघ चालक एम एस गोलवरकर के साथ लाबिंग शुरू की, जिनका जनसंघ पर जबरदस्त प्रभाव था. अन्य बातों के अलावा मधोक ने अटल की अनैतिक जीवनशैली पर आरोप लगाए. उन्होंने ये भी कहा कि ऐसी शिकायतें हैं कि एक महिला उनके पास आती है. ये मिसेज कौल की इशारा था, क्योंकि अटल को अक्सर ड्रॉप करने उनके घर आती थीं. अटल के घर पर जनसंघ के और भी नेता रहते थे. हालांकि इन शिकायतों पर कुछ नहीं हुआ क्योंकि गोलवरकर ने उन्हें खारिज कर दिया.

अटल की गैरपरंपरागत जीवनशैली और उनका कौल परिवार के साथ ठहरने की बात दिल्ली के राजनीतिक हलकों में कही जाने लगी. हालांकि प्रेस ने कभी इसे बड़ा इश्यू नहीं बनाया और इसलिए अटल की व्यक्तिगत जिंदगी जांच के घेरे में नहीं आई. जिस दिन मिसेज कौल का निधन हुआ, उस दिन इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा, दोनों यानि अटल और मिसेज कौल ने अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया और दोनों ने इस पर हमेशा चुप्पी भी साधे रखी. इसे कभी हवा भी नहीं दी.

मिसेज कौल का महत्व हर कोई मानता था
मिसेज कौल के निधन पर प्रेस के एक वर्ग ने उन्हें अटल का पारिवारिक सदस्य कहा. अटल के घर से मिली रिलीज में उन्हें ऐसा ही बताया गया था. क्योंकि अटल खुद अल्जाइमर रोग से ग्रस्त हो चुके थे. लिहाजा इस रिलीज को ड्रॉफ्ट करने में उनका कोई योगदान नहीं था. हकीकत में वह अटल के जीवन का सबकुछ थीं. वह उन्हें भावनात्मक संबल देती थीं. राजनीतिक सर्किल भी मिसेज कौल के महत्व को हमेशा मानता आया है. उनका निधन जब हुआ, तब 2014 के आमचुनाव के अभियान जोरों पर था लेकिन तब भी मिसेज कौल के अंतिम संस्कार में लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज मौजूद रहे. सोनिया भी अटल के निवास पर पहुंचीं, यहां तक कि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उनके अंतिम संस्कार में पहुंचे. मिसेज कौल के पिता सिंधिया रियासत में ही अफसर थे.

वह अटल की दत्तक पुत्री की मां थीं
मिसेज कौल के निधन पर ओबिचूएरी लिखते हुए अटल के पूर्व सहायक सुधींद्र कुलकर्णी ने उन्हें यानि राजकुमारी कौल को अटल की दत्तक पुत्री नमिता की मां बताया. वास्तविकता ये है कि जब अटल ने कौल के साथ रहना शुरू किया तो उन्होंने परिवार की दोनों बेटियों नमिता और नम्रता को एडॉप्ट किया. सुधींद्र अटल के प्रधानमंत्री बनने के कई साल पहले से उनसे मिलते थे. मिसेज कौल के घर जाते रहते थे. वह उन्हें दयालु महिला बताते थे, जिनका चेहरा तो मातृत्व लिए हुए था ही साथ ही दिल भी वैसा ही था.

शिष्ट महिला
कुलदीप नैयर ने टेलीग्राफ में लिखा, आजादी के बाद जितने भी प्रधानमंत्री हुए, उनके घर में रहने वालों में आंटी सबसे शिष्ट और लोप्रोफाइल में रहने वाली महिला थीं, उनके बारे में वही लोग जानते थे, जो अटल जी की प्राइवेट लाइफ के बारे में जानते थे. उनके निधन के साथ ही भारतीय राजनीति की सबसे महान स्टोरी का अंत हो गया.अटल जब प्रधानमंत्री बने तो कई महत्वपूर्ण पोजिशंस पर उन्हें रखवाने में मिसेज कौल ने अहम भूमिका निभाई,
अटल की बेटी शादी कैसे हुई
अटल की दत्तक पुत्री नमिता का रोमांस रंजन भट्टाचार्य से 80 के दशक में परवान चढ़ा, वैसे उनकी मुलाकात 1977 में यूनिवर्सिटी के दिनों में हो चुकी थी. रंजन ओबराय होटल में काम करते थे जबकि नमिता दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज में पढ़ाई करने के बाद मौर्या होटल में काम करने लगी थीं. जब रंजन घर आने लगे तो शुरू में अटल उनसे दूरी बनाकर रखते थे लेकिन बाद में उन्होंने अटल का दिल जीत लिया और दोनों की शादी हो गई. शादी के बाद वह भी साथ रहने आ गए. वह अटल को बापजी कहते थे. जल्दी ही वह उनके बहुत करीब भी आ गए. जल्दी ही रंजन ने नौकरी छोड़ दी और खुद उद्यमी बन गए. उन्होंने मनाली में होटल बनवाया. उसके बाद कई व्यावसाय शुरू किए. कई शहरों में कार्लसन और चाणक्य होटलों के साथ संयुक्त उपक्रम शुरू किया. जब अटल की सरकार महज 13 दिनों तक चली थी, तब भी उन्होंने उसमें रंजन को ऑफिसर आन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) नियुक्त किया. हालांकि जब अटल दोबारा पांच साल के प्रधानमंत्री बने तो रंजन को कोई आधिकारिक पोजिशन तो नहीं मिली लेकिन उनका प्रभाव राजनीतिक और कारोबारी सर्किल में बहुत ज्यादा था. वह प्रधानमंत्री हाउस में ही रहते थे.

मिसेज कौल की दूसरी बेटी
मिसेज कौल की दूसरी बेटी नम्रता डॉक्टर बनीं और न्यूयार्क चली गई. वह वहीं रहती हैं. उनके पिता ब्रिज नारायण कौल ने अपने आखिरी दिन उसी के साथ गुजारे. वह वहां बेहतर ट्रीटमेंट के सिलसिले में गए थे. ये अटल के प्रधानमंत्री बनने से पहले की बात है. नैयर ने लिखा है कि बेशक जब अटल प्रधानमंत्री बने तो आधिकारिक कार्यक्रमों और विदेशी दौरों में मिसेज कौल का नाम प्रोटोकाल में नहीं होता था और वह कभी प्रधानमंत्री अटल के साथ विदेश दौरों में भी नहीं गईं लेकिन उनकी मौजूदगी हर ट्रिप में महसूस होती थी.
 

साभार- नेटवर्क18

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