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नया हरियाणा

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

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भारतीय राजनीति के आकाश में चमकते हृदय कवि अटल बिहारी वाजपेयी

लोकतंत्र एक ऐसी जगह है जहां दो मूर्ख मिलकर एक ताकतवर इंसान को हरा देते हैं।

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25 दिसंबर 2017

नया हरियाणा

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 25 दिसंबर 2017 को 93 साल के हो गए हैं। उनका जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था।

इन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज - जो अब लक्ष्मीबाई कॉलेज कहलाता है - में तथा कानपुर उ. प्र. के डी. ए. वी. कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की और राजनीति विज्ञान में एम. ए.की उपाधि प्राप्त की. सन् 1993 मे कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा दर्शन शास्त्र में पी.एच डी की मानद उपाधि से सम्मानित किए गए.

भारतीय स्वातंत्र्य-आंदोलन में सक्रिय योगदान कर 1942 में जेल गए. वाजपेयी जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय सदस्य और सन् 1951 में गठित राजनैतिक दल ‘भारतीय जनसंघ’ के संस्थापक सदस्य थे. सन् 1966-67 सरकारी प्रत्याभूतियों की समिति के अघ्यक्ष, सन् 1967 से 70 तक लोक लेखा समिति के अघ्यक्ष रहे. सन् 1968 से 73 तक वे भारतीय जनसंघ के अघ्यक्ष थे. सन् 1975-77 के दौरान आपातकाल में बंदी रहे. 1977 से 79 तक भारत के विदेश  मंत्री, सन् 1977 से 80 तक जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य, सन् 1980-86 भाजपा अघ्यक्ष, सन् 1980-84 , 1986 तथा 1993-96 के दौरान भाजपा संसदीय दल के नेता रहे. सन् 1957 में दूसरी लोकसभा के लिए प्रथम बार निर्वाचित हुए. तब से 2004 में 14वीं लोकसभा हेतु हुए संसदीय आम चुनाव तक ये  उत्तर प्रदेश  में लखनऊ से प्रत्याशी  होकर निर्वाचित होते रहे. सन् 1962-67 और 1986-91 के दौरान आप राज्य सभा के सम्मानित सदस्य थे और सन् 1988 से 89 तक सार्वजनिक प्रयोजन समिति के सदस्य. ये  सन् 1988-90 में संसद् की सदन समिति तथा व्यापारिक परामर्श समिति के सदस्य रहे. सन् 1990-91 में याचिका समिति के अघ्यक्ष बने और सन् 1993 से 1996 तक तथा 1997 -98 में विदेश नीति समिति के अघ्यक्ष रहे. सन् 1993-96 और 1996-97 में  लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे.

सन् 1999 में लोक सभा में भाजपा संसदीय दल के नेता और सन् 2004 में भाजपा और एनडीए संसदीय दल के अघ्यक्ष रहे.

उनका व्यक्तित्व और उनकी बातें ऐसी थी कि ना सिर्फ समर्थक, बल्कि उनके विरोधी भी तालियां बजाए बिना नहीं रहते थे।

 ‘सुनने तो सब आते हो पर वोट नहीं देते हो’ अटल बिहारी वाजपेयी अपनी सुनने वालों के बीच आसानी से यह कह देते थे. वो जानते थे कि उनकी वाणी का सम्मोहन अद्भुत है. 60-70 के दशक में जब भारतीय जनसंघ एक सीमित राजनीतिक शक्ति थी, वाजपेयी की वाणी का ओज बरकरार था. उनके भाषण को सुनना ही एक प्रयोजन होता था. वोट भले ही न दें पर वाजपेयी को सुनना ही एक आनंद है.

आप अपने दोस्त बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं।

2. छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

3. लोकतंत्र एक ऐसी जगह है जहां दो मूर्ख मिलकर एक ताकतवर इंसान को हरा देते हैं।
4. इतिहास में हुई भूल के लिए आज किसी से बदला लेने का समय नहीं है, लेकिन उस भूल को ठीक करने का सवाल है।

5. बाधाएं आती है आएं, घिरें प्रलय की घोर घटाएं, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं, निज हाथों से हंसते–हंसते, आग लगा कर जलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।

6. हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ।

7. शत–शत आघातों को सहकर जीवित हिंदुस्थान हमारा जग के मस्तक पर रोली सा शोभित हिंदुस्थान हमारा।

8. मैं हमेशा से ही वादे लेकर नहीं आया, इरादे लेकर आया हूं।

9. मेरे पास ना दादा की दौलत है और ना बाप की। मेरे पास मेरी मां का आशिर्वाद है।

10. अगर हमारा देश शक्तिशाली है तो किसी को भी हमारे देश पर आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं होगी। 


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