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मंगलवार, 21 मई 2019

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जीरो फिल्म : अति संवेदनशील दर्शकों के लिए मानव व्यवहार की जटिलताओं को समझने का एक अवसर

फिल्म देखते हुए हमें यह एहसास होता है कि हमारे जीवन में भी ऐसे शख्स मौजूद हैं जिनसे हम प्यार और नफरत एक साथ कर रहे होते हैं.

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22 दिसंबर 2018



कवि एवं फिल्म समीक्षक डॉ. अजित

जीरो का आविष्कार भारत में हुआ था और यह तथ्य हमेशा हम भारतीयों के लिए गर्व का विज्ञापन कराता रहता है. जीरो वैसे तो एक अंक है जो किसी अंक के आगे या पीछे लगने पर उसका मूल्य बदल देता है. मगर आप कल्पना कीजिए अगर किसी के जीवन के साथ जीरो लग जाए तो उसके जीवन का अर्थ और ध्वनि दोनों बदल जातें हैं.

शाहरुख खान की फिल्म ‘जीरो’ हमारे मन के गणित को अस्त-व्यस्त करने में पर्याप्त समर्थ है. फिल्म देखतें हुए जीरो को आगे या पीछे लगाने की दुविधा कोई भी संवेदनशील दर्शक महसूस कर सकता है. फिल्म का नायक बउवा सिंह एक बौना इंसान है और फिल्म की नायिका आफिया एक डिसेबल्ड पर्सन है. बउवा सिंह समाज की ‘परसेप्शन डिसेबिलिटी’ का शिकार है तो आफिया सफल वैज्ञानिक होने के बावजूद उसकी दुनिया व्हील चेयर तक सीमित है.

बउवा सिंह की लड़ाई दोतरफा है एक लड़ाई वो खुद से लड़ रहा होता है और एक लड़ाई उसकी बाहर चल रही होती है. आफिया इस मामलें में थोड़ी-सी सम्पन्न है. उसके अन्दर ‘सेल्फ रिजेक्शन’ नही है, क्योंकि वह एक कामयाब अन्तरिक्ष वैज्ञानिक है उसकी सीमाएं शारीरिक अधिक हैं, मानसिक रूप से वह मजबूत है. आफिया का किरदार उस सामाजिक मान्यता की पुष्टि करता है जिसके अनुसार यदि कोई डिसेबल्ड व्यक्ति सफल हो जाए तो वह समाज में अपने स्तर पर सर्वाईव कर जाता है.

जीरो फिल्म मूलत: बउवा सिंह के व्यक्तित्व की जटिलता को समझने का एक अवसर देती है, मगर फिल्म के दौरान उसके व्यक्तित्व में प्राय: दर्शक हास्य तलाश रहे होते है, यही बात सोसाइटी की 'पॉपुलर थिंकिंग' को बताने में सक्षम है.

यह बात निर्विवाद रूप से सच है कि समाज हमेशा ताकतवर को आदर्श के रूप में देखता है. ऐसे में जो किसी किस्म की शारीरिक हीनता या डिसेबिलिटी से पीड़ित होते हैं वो हमेशा समाज में हाशिए की जिंदगी जीते हैं. जीरो फिल्म का नायक बउवा सिंह केवल आर्थिक रूप से सम्पन्न है, बाकि बौना होने के कारण वो हर किस्म का सोशल और फैमली रिजेक्शन झेलता है.

मनोवैज्ञानिक रूप से लम्बे समय से सोशल और पर्सनल रिजेक्शन झेलने के कारण आप खुद ही खुद को भी रिजेक्ट करने लगतें है. इसका अलावा लम्बे समय से जब आप रिजेक्शन झेलतें हैं तो हमेशा उस रिजेक्शन को खारिज करके उससे बाहर आने की कोशिश करतें हैं. और ऐसी कोशिशें एक बड़े लक्ष्य या लगभग असम्भाव्य सपने का पीछा करने की होती है कि सामाजिक रूप से रिजेक्शन झेल रहा व्यक्ति खुद की महत्ता सिद्ध कर सके.

जीरो का बउवा सिंह भी अपनी ऐसी ही द्वंदात्मक महत्वकांक्षा का पीछा करता हुआ नजर आता है. बउवा सिंह ने बौने का किरदार निभाया है जो खुद को कोयल कहता है. कोयल कहने का आशय है उसने यह मान लिया होता है कि वह ‘गुड फॉर नथिंग’ है. फ़िल्म के पहले हाफ में बउवा सिंह खुद से भाग रहा होता है, इसलिए दर्शकों को उसमें हास्य और मनोरंजन नजर आता है. मगर इंटरवल के बाद बउवा सिंह की सारी कोशिशें खुद को स्वीकार करने की होती है.

बतौर मनुष्य यह लड़ाई बेहद जटिल होती है. जब आप खुद को समाज की दृष्टि में एक विदूषक जैसा बना लेते हैं, मगर अंतरमन से यह चाहते हैं कि कोई तो हो जो आपको गंभीरता से लें. बउवा सिंह का किरदार फिल्म में बहुत अच्छा गढ़ा गया .है उसे उसकी स्वाभाविकता में दिखाया गया है.

एक लोकप्रिय कहावत है कि दो असफल लोग मिलकर कभी एक सफल काम नहीं कर सकते हैं. बउवा सिंह के जीवन में जब पहली दफा प्यार घटित होता है वो आफिया के द्वारा घटित होता है. बउवा सिंह का अवचेतन यह बात स्वीकार ही नहीं कर पाता है कि कोई उससे प्यार भी कर सकता है, जबकि आफिया का प्यार एकदम सच्चा था. दोनों एक दूसरे के जीवन की रिक्तताएं भरने की कोशिश कर रहें थे, मगर बउवा सिंह का मानसिक धरातल सबसे बड़ी बाधा बनता है.

बहुधा मनुष्य खुद के सच से भागकर खुद को एक अज्ञात के आकर्षण में बाँधने की कोशिश करता है, क्योंकि उसे लगता है कि जो अप्राप्य है उसको हासिल करके वो अपना खोया हुआ आत्म गौरव प्राप्त कर सकता है. ऐसी ही सारी कोशिशें बउवा सिंह की फिल्म जीरो में नजर आती हैं.

बहुसंख्यक सिनेप्रेमियों को जीरो फिल्म का इंटरवल से बाद का पार्ट खराब लगा मगर मुझे निजी तौर पर वो जरूरी लगा है. हाँ उसमें कुछ अतिशय नाटकीयता जरुर है मगर मैं फिल्म के पहले हाफ में बउवा सिंह के किरदार से इस कदर जुड़ गया था कि मुझे नाटकीयता में भी विरेचन के साधन नजर आने लगे थे.

बउवा सिंह और आरफा को मिलाने के लिए दिल से दुआएं निकलती है जबकि यह जानते हुए कि बउवा सिंह पलायनवादी रहा है. मनोविज्ञान की दृष्टि से पलायन कभी भी किसी मनुष्य का ऐच्छिक चुनाव नही होता है उसके पीछे वो तमाम वजहें होती है जो बतौर मनुष्य आपके अस्तित्त्व को लगातार खारिज करती हैं.

दैहिक हीनता और शारीरिक अक्षमता झेलते मनुष्य का मनोविज्ञान समझने के लिए जीरो एक जरुरी फिल्म हैं. जीरो फिल्म में औसत चेतना के दर्शकों के लिए हास्य है, बुद्धिवादी दर्शकों के लिए नाटकीयता से चिढ़ है और अति संवेदनशील दर्शकों के लिए मानव व्यवहार की जटिलताओं को समझने का एक अवसर है.

अंत में अभिनय की बात करूं तो मेरा ऑब्जरवेशन यही है कि बउवा सिंह के किरदार में शाहरुख खान ने और आफिया के किरदार में अनुष्का शर्मा ने बहुत शानदार काम किया है.

जीरो को देखते समय आप इस अंक के मनोविज्ञान को महसूस कर पातें हैं जो कि आपके खुद के मन के किसी कोने में अपने स्थान बदलने के लिए उत्सुक नजर आता है. मेरे ख्याल से यही बात फिल्म के निर्देशक और एक्टर्स की सबसे बड़ी सफलता है. जीरो फिल्म में प्यार, दोस्ती व पलायन जैसे भावनात्मक तत्त्व मौजूद हैं. फिल्म देखते हुए हमें यह एहसास होता है कि हमारे जीवन में भी ऐसे शख्स मौजूद हैं जिनसे हम प्यार और नफरत एक साथ कर रहे होते हैं.


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