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बुधवार, 22 मई 2019

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संस्कारों का गुरुकुल थे मित्रसेन आर्य : हरिओम पंवार

उन्होंने कहा कि मित्रसेन आर्य ऐसा गुरूकुल जहां सफल मानव जीवन के सारे तत्व अपनी सारी खूबियों के साथ मौजूद थे।

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18 दिसंबर 2018



हरिओम पंवार, प्रसिद्ध ओज के कवि

चौधरी मित्रसेन जी, जिन्हें मैं हमेशा पिताश्री कहता था, के बारे में कुछ लिखने और बोलने का धर्मसंकट यह है कि आखिर उनके जीवन के किन-किन पहलुओं पर बात की जाए। यह धर्मसंकट इसलिए कि उनके जीवन का हर पहलू देश और समाज कोनई दिशा प्रदान करने वाला रहा है। चेहरे पर छाई रहने वाली स्थाई शांति, हंसमुख स्वभाव, जीवन के लिए हमेशा आशा भरी बातें और देश-समाज में मूल्यों, संस्कारों और सिद्धांतों की स्थापना के लिए जीवन पर्यंत प्रयासरत रहने वाले मित्रसेन जी को एकपंक्ति में संस्कारों का गुरुकुल कहें तो अतिशियोक्ति नहीं होगी। पिताश्री चलते फिरते गुरुकुल थे। ऐसा गुरूकुल जहां सफल मानव जीवन के सारे तत्व अपनी सारी खूबियों के साथ मौजूद थे। ऐसा गुरुकुल जिसने जीवनपर्यंत देश-समाज में मूल्य औरसंस्कार बांटे। मुझे नहीं पता कि मेरे प्रति वे स्नेह से इतने लबालब क्यों थे? 

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मेरा उनसे परिचय बहुत बाद में हुआ। लेकिन परिचय की शुरुआत में ही जब मैं उनके घर पर उनसे पहली बार मिला तो यह जान कर हतप्रभ रह गया कि मेरे गीतों की तमाम सीडी न केवल उनके पास मौजूद हैं, बल्कि उन्हें मेरी कई सीडियां वितरितभी की हैं। यह सारा कुछ केवल इसलिए कि लोग देशप्रेम भरी कविताओं के माध्यम से देश से प्रेम कर सकें। उनसे मैंने एक पिता का प्यार पाया और जब-जब उनसे मिला हमेशा कुछ न कुछ सीखा। इसलिए एक पथप्रदर्शक पिता की कमी महसूस होतीहै।
एक समाजसेवी के तौर पर उनका व्यक्तिव्य किसी को सहज ही आकर्षित करने के लिए काफी था। समाज सेवा खास कर गरीबों के लिए कुछ करने की उनकी ललक तो हतप्रभ करने वाली थी। चाहे गरीब कन्याओं के विवाह का मामला हो यागरीबों को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का, वे जीवन पर्यंत इस दिशा में कार्य करते रहे। सेवा का कोई अवसर उन्होंने नहीं गवाया। मुझे याद आता है कि आस्था चैनल पर उन्होंने गरीबों की मदद के लिए मेरे द्वारा बनाई संस्था वाणी फाउंडेशन की ओरसे समाजसेवी को प्रतिवर्ष 31 हजार रुपये के पुरस्कार की घोषणा सुनी तो मुझे तत्काल बुला कर कहा कि यह राशि उनकी ओर से होगी, लेकिन इसमें उनका नाम कहीं नहीं होगा। जाहिर है कि वे नाम के लिए समाजसेवा नहीं करते थे, बल्कि समाजसेवा को मानवधर्म का अहम हिस्सा मानते थे।
मेरी उनसे हरिद्वार स्थित बाबा रामदेव के आश्रम में ज्यादातर मुलाकात होती थी। कई बार मैं उनके साथ उड़ीसा भी गया, जहां उन्होंने गरीब आदिवासी इलाकों में शिक्षा के प्रसार के लिए जीवन पर्यंत कार्य किया। मैँने उन्हें कभी नाराज होते नहींदेखा। संस्कारों के प्रति इतना सजग कि जब भी मैं उनसे मिलने उनके घर जाता तो वे परिवार के बच्चों को बुला कर मेरा परिचय कराने के साथ-साथ पैर छूकर आशीर्वाद लेने को कहते। जब मैं कहता कि बच्चे मेरे परिचित नहीं हैं, ऐसे में क्या पैर छुलानाउचित है तो वे कहते कि संस्कार की शुरुआत बचपन से ही दी जानी चाहिए। अभी से बच्चे ऐसा करेंगे तो इनमें बड़ों के प्रति सम्मान भाव पैदा होगा। यही तो हमारी सभ्यता संस्कृति है। ऐसे अनेक प्रसंग हैं जिसने मुझे पिताश्री के सामने निरुत्तर किया है। 
वर्तमान मूल्यविहीन, सिद्धांतहीन जीवन के दौर में पिताश्री की विरासत को बचाए रखना देश समाज के लिए बेहद जरूरी है। हम बेहतर कार्य कर पिताश्री जैसे व्यक्तित्वों के आदर्श जीवन से सीख ले ही देश और समाज को नई ऊंचाइयां प्रदान करसकते हैं। 


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